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दशहरा 2026: अपराजिता जयंती, पूजा का महत्व और कथा

Updated: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 (15:55 IST)
वर्ष 2026 में विजयदशमी (दशहरा) का महापर्व मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को पूरे देश में श्रद्धा, उत्साह और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक रूप में मनाया जाएगा। इस दिन शस्त्र/आयुध पूजा, अपराजिता देवी पूजन और शाम के समय रावण दहन का विशेष विधान है। इस दिन अपराजिता देवी का पूजन करने का खास महत्व है। प्रभु श्रीराम ने रावण का वध करने के पहले अपराजिता देवी की पूजा की थी। 
 

दशहरा एवं मुख्य पूजा के शुभ मुहूर्त (20 अक्टूबर 2026)

दशमी तिथि प्रारंभ: 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:50 बजे से
दशमी तिथि समाप्त: 21 अक्टूबर 2026 को दोपहर 02:11 बजे तक
 

आयुध पूजा का शुभ मुहूर्त:

विजया मुहूर्त (विशेष पूजा का समय): दोपहर 01:59 से 02:45 के बीच।
अपराजिता देवी पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01:14 से 03:30 के बीच।
रावण दहन मुहूर्त: शाम 05:47 बजे से रात्र‍ि 8:21 तक।
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अपराजिता देवी की पूजा का महत्व: 

मां अपराजिता की पूजा सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त करने और शत्रुओं के शमन के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अपराजिता पूजा को विजयादशमी का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। अपराजिता आश्विन शुक्ल दशमी को पहले अपराजिता का पूजन किया जाता है। अपराजिता का अर्थ है 'जो कभी पराजित न हो'। यह देवी शक्ति की संहारकारी और रौद्र शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। शस्त्र पूजा से पहले अपराजिता देवी की पूजा करते हैं। यह देवी हमें युद्ध सहित अन्य कई क्षेत्रों में विजय दिलाती है। इसीलिए दशमी के दिन देवी अपराजिता की पूजा होती है। जब देवी दुर्गा ने नव दुर्गाओं के रूप में दानवों का संपूर्ण विनाश किया, तो वह अपनी मूल शक्ति, आदिशक्ति अपराजिता के रूप में हिमालय में अंतर्ध्यान हो गईं। इसके बाद श्रीराम ने उनकी आराधना की तो देवी ने उन्हें विजयी होने का वरदान दिया।

अपराजिता देवी की पूजा विधि: 

 

अपराजिता देवी की कथा:

माँ अपराजिता (जिन्हें विजयादेवी भी कहा जाता है) की कथा मुख्य रूप से विजयादशमी (दशहरे) के पर्व से जुड़ी हुई है। हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, माँ अपराजिता शक्ति का वह रूप हैं जिन्हें कभी पराजित नहीं किया जा सकता। कहते हैं कि महिषासुर का वध करने के बाद मां कात्यायिनी के इस स्वरूप को ही अपराजिता कहा जाता है। देवताओं को विजय दिलाने और स्वयं कभी पराजित न होने के कारण देवताओं ने माँ के इस रूप को 'अपराजिता' (जिसे कोई जीत न सके) कहकर पूजने का संकल्प लिया।
 
उत्पत्ति और स्वरूप: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी अपराजिता की रचना स्वयं भगवान विष्णु द्वारा हुई है। इन्हें साक्षात रौद्र शक्ति और तमोगुण स्वरूपा माना गया है। इनके तीन नेत्र चमकते सूर्य के समान और केश नीले मेघ के समान बिजली जैसे हैं। यह त्रिशूल, शंख और पान-पात्र धारण करती हैं तथा व्याघ्रचर्म (बाघ की खाल) पहनती हैं।

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