कान का दर्द कुछ कहता है

WD|
यह एक ऐसा प्रतिरोधी संक्रमण है जिसे यदि शीघ्र ही उपचारित न किया जाए तो यह कान की तमाम संरचनाओं से होता हुआ हमारी खोपड़ी तक फैल सकता है जिसके कारण न केवल चेहरे का पक्षाघात बल्कि खोपड़ी की इंद्रियाँ भी पक्षाघात की शिकार हो सकती हैं। यदि ऐसा हो तो शल्य चिकित्सा से भी हमेशा बचना चाहिए क्योंकि उससे स्थिति बिगड़ सकती है। जब मस्तिष्क में किसी प्रकार का ट्यूमर या अवांछित वृद्धि बढ़ जाती है और अपने साथ मस्तिष्क की बाहरी परत को भी शामिल कर लेती है तो भी रोगी को बहुत तेज सिरदर्द और कान में दर्द होता है। भीतरी कान में संक्रमण के पुराने, कान बहने वाले रोगियों यानी 'सपरेटिव ओटिटीस मीडिया' के रोगियों को कान बहने पर आमतौर पर दर्द नहीं होता है। उन्हें केवल बहुत ज्यादा खराब अवस्था में होने पर ही कान में दर्द हो सकता है। कान के अंदर या उसके चारों ओर सिरदर्द के लगातार बने रहने पर भी यह महसूस होता रहता है कि संक्रमण पूरे कान की बनावट में फैल चुका है। इसके उपचार के लिए हमें तुरंत शल्य-चिकित्सा और कान विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए। ऐसी भी कुछ स्थितियाँ हो सकती हैं जब हमारा कान जरूरत से ज्यादा सुनना चाहता हो, तो कान में दर्द हो सकता है।

यदि कोई व्यक्ति कान में दर्द की शिकायत करता है और सघन परीक्षण के बाद भी कोई कारण नहीं पता चलता है तो इस स्थिति को 'रिफर्ड ओटेल्जिया' कहा जाता है। यह एक आम समस्या है। इसका एक और उदाहरण यह है कि जब 'डायफ्राम' की बढ़ोतरी से पीड़ित व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसे दाएँ कंधे के ऊपर दर्द है। वास्तविकता यह है कि जब एक रोगी की एक विशेष स्नायु वाहिका दो अंगों या स्थानों पर जुड़ी होती है और जब दर्द की लहरें एक स्थान से मस्तिष्क को भेजी जाती हैं तो मस्तिष्क उसे दूसरे स्थान से आती लहरें समझ लेता है जबकि दर्द का कारण निचले जबड़े की पिछली दाढ़ है। परंतु जब वह स्नायु तंत्र के रास्ते से मस्तिष्क तक पहुँचती है तो मस्तिष्क इस पीड़ा का कारण कान को समझ लेता है। इसलिए रोगी समझता है कि उसे कान में दर्द है, जबकि इसका कारण दाँतों में छिपा होता है।

कान अपने स्नायु तंत्रों का प्रयोग ऊपरी और निचले दाँतों, मसूडों, गालों, जीभ, मुँह, टांसिल, साधारण सर्जरी, नाक, नाक के साथ खुलने वाले हिस्से (साइन्यूसिस वासोफेरिंक्स), लेरिंक्स (वायस बाक्स), लैरिंगोफेरिंक्स (खाना निगलते समय), सेलीवेरी ग्लैंड्स (थूक बनाने की प्रक्रिया), जबड़े के जोड़, गर्दन और रीढ़ की हड्डी और गले के कुछ अन्य भागों के साथ ही करता है। इन हिस्सों में किसी प्रकार की उत्तेजना, जोड़ों का दर्द या कोई भी नई बीमारी होने पर स्नायु तंत्रों के द्वारा वे लहरें मस्तिष्क को भेजी जाती हैं और मस्तिष्क इन्हें कान में दर्द के समान ही समझता है। इसीलिए टांसिल के ऑपरेशन के बाद या दाँत निकलवाने के बाद, गले का कैंसर होने की स्थिति में गले में दूसरे प्रकार के विकार होने, जोड़ों के दर्द या पीठ दर्द की व्यवस्था में भी रोगी कान के दर्द की शिकायत करते हैं।
चेहरे की मांसपेशियों में झिल्ली आना भी एक अन्य कारण है जब कान में दर्द हो सकता है। जब वह दोनों तरफ से मुँह न चला रहा हो, जिसका कारण दाँतों का बंद रहना, या जब जोड़ों के दर्द हो, ऐसे में एक विशेष तरफ चबाने से कान में दर्द हो सकता है। उदाहरण के लिए एक साधारण स्टेपीडेक्टोमी ऑपरेशन यानी कान की तीनों हड्डियों में से एक की सर्जरी के बाद रोगी अक्सर दाहिनी ओर से चबाना बंद कर सकता है, जिससे सिर के दाहिनी ओर की मांसपेशियों में ऐंठन आ जाती है और कान में दर्द शुरू हो सकता है।
कई बार लोग शिकायत करते हैं कि उनके गले में एक तरफ दर्द है और उसके साथ ही दूसरी ओर के कान में भी दर्द है। यह दर्द लहरों की तरह उठता है और कुछ चबाने या पीने से भी हो सकता है। इसका कारण जीभ का एक ओर होना होता है। साइलोकेन के घोल से बनी बेहोशी की साधारण दवा के स्प्रे से ही कानों और गले दोनों के दर्द को रोका जा सकता है। लेकिन जब बाहरी इलाज से फायदा न हो तो ऑपरेशन के पश्चात उस स्नायु को बाहर निकलवा देना चाहिए। लेकिन जब मस्तिष्क से आता दर्द ही गले और कान में दर्द का कारण हो तो ऑपरेशन के बाद उस जगह को भी निकलवा देना चाहिए। इस अवस्था को स्नायु का दर्द और स्टाइलॉइड यानी सिर का दर्द कहते हैं।


सम्बंधित जानकारी


और भी पढ़ें :