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धन त्रयोदशी 2021 : 2 नवंबर आज यमराज के लिए भी करें पूजन, कथा और 3 बहुत सरल उपाय खास Dhanteras के लिए

Updated: मंगलवार, 2 नवंबर 2021 (14:25 IST)
dhanteras 2021/  2 नवंबर धनतेरस पर सबसे पहले घर के प्रमुख द्वार की देहरी पर कोई भी अन्न (साबूत गेहूं या चावल आदि) की ढेरी बनाकर/बिछाकर रखें।फिर उस पर एक अखंड दीपक रखें। मान्यता है कि इस प्रकार दीपदान करने से यम देवता के पाश और नरक से मुक्ति मिलती है।
 
यदि आप पूरा उपक्रम ना करें तो इनमें से कोई एक अवश्य करें। पढ़ें यमराज पूजन के 3 तरीके : 
 
* घर के मुख्य द्वार पर यम के लिए आटे का दीपक बनाकर अनाज की ढेरी पर रखें।
 
* रात को दक्षिण दिशा में घर की स्त्रियां बड़े दीपक में तेल डालकर चार बत्तियां जलाएं।
 
* एक दीपक घर के मंदिर में जलाकर जल, रोली, चावल, गुड़, फूल, नैवेद्य आदि सहित यम का पूजन करें।
 
यमराज का मंत्र 
 
'मृत्युना दंडपाशाभ्याम्‌ कालेन श्यामया सह। 
त्रयोदश्यां दीपदानात्‌ सूर्यजः प्रयतां मम। 
 
धनतेरस पर यमराज को दीपदान देने की पौराणिक कथा
 
धन तेरस पर यमराज जो दीपदान किया जाता है या कहें कि उनके निमित्त घर के चारों ओर दीप जलाकर उनकी पूजा की जाती है। आखिर धनतेरस पर यमराज की पूजा क्यों की जाती है? इसके पीछे दो कथाएं प्रचलित हैं।
 
1.पहली कथा : इस कथा के अनुसार एक बार यमदूत एक राजा को उठाकर नरक ले आए। नरक में राजा ने यमदूत से कहा कि मुझे नरक क्यों लाए हो? मैंने तो कोई पाप नहीं किया है। इस पर यमदूत ने कहा कि एक बार एक भूखे विप्र को आपने अपने द्वार से भूखा ही लौटा दिया था। इसीलिए नरक लाए हैं। राजा ने कहा कि कहा कि नरक में जाने से पहले मुझे एक वर्ष का समय दो। यमदूत ने यमराज की सलाह पर एक वर्ष का समय दे दिया।
 
राजा पुन: जीवित हो गया और फिर वह ऋषि-मुनियों के पास गया और उसने उन्हें अपनी सारी कहानी बता दी। तब ऋषियों के कहने पर राजा ने कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को खुद ने व्रत रखा और ब्राह्मणों को एकत्रित कर उन्हें भरपेट भोजन कराया। वर्षभर बाद यमदूत राजा को फिर लेने आए और इस बार वे नरक ले जाने के बजाए, विष्णु लोक ले गए। तभी से इस दिन यमराज की पूजा की जाती है और उनके नाम का दीपक लगाया जाता है।
2.दूसरी कथा : दूसरी कथा के अनुसार हिम नाम के एक राजा का पुत्र हुआ तो ज्योतिषियों ने बताया कि यह अपने विवाह के चौथे दिन मर जाएगा। राजा इस बात से चिंतित हो गया। पुत्र बड़ा हुआ तो विवाह तो करना ही था। उसका विवाह कर दिया गया। विवाह का जब चौथा दिन आया तो सभी को राजकुमार की मृत्यु का भय सताने लगा लेकिन उसकी पत्नी निश्‍चिंत होकर महालक्ष्मी की पूजा करने लगी, क्योंकि वह महालक्ष्मी की भक्त थी। पत्नी ने उस दिन घर के अंदर और बाहर चारों ओर दीये जलाए और भजन करने लगी।
 
उस दिन सर्प के रूप में यमराज ने घर में प्रवेश किया ताकि राजकुमार को डंस कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाए। लेकिन दीपों की रोशनी से सर्प की आंखें चौंधियां गई और उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था की किधर जाएं। ऐसे में वह राजकुमार की पत्नी के पास पहुंच गया जहां वह महालक्ष्मी की आरती गा रही थी। सर्प भी उस मधुर आवाज और घंटी की धुन में मगन हो गया। सुबह होने के सर्प के भेष में आए यमराज को खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि मृत्यु का समय टल चुका था। इससे राजकुमार अपनी पत्नी के कारण दीर्घायु हुए और तभी से इस दिन यमराज के लिए दीप जलाने की प्रथा प्रचलन में आ गई।
 
दीपदान : धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त जिस घर में दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती है। धनतेरस की शाम को मुख्य द्वार पर 13 और घर के अंदर भी 13 दीप जलाने होते हैं। लेकिन यम के नाम का दीपक परिवार के सभी सदस्यों के घर आने और खाने-पीने के बाद सोते समय जलाया जाता है। इस दीप को जलाने के लिए पुराने दीपक का उपयोग किया जाता है जिसमें सरसों का तेल डाला जाता है। यह दीपक घर से बाहर दक्षिण की ओर मुख कर नाली या कूड़े के ढेर के पास रख दिया जाता है। इसके बाद जल चढ़ा कर दीपदान करते समय यह मंत्र बोला जाता है-
 
मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यज: प्रीतयामिति।।
 
कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दीया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे लेकर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दीये को नहीं देखते हैं। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घूमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।

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