ramcharitmanas

नरेंद्र मोदी की लहर क्यों हवा हो गई?

Updated: मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015 (17:21 IST)
दिल्ली विधानसभा चुनावों के कई संदेश हैं और इनका सबसे बड़ा संदेश है कि इस बार मोदी का कोई मैजिक नहीं चला और ना ही वे कोई लहर पैदा करने में कामयाब हो सके। आप को अभू‍तपूर्व जीत दिलाने में मध्यम वर्ग की निर्णायक भूमिका रही है जो कि अब तक मोदी का समर्थक माना जाता रहा है। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में भाजपा का चिड़चिड़ापन भी सामने आया क्योंकि पार्टी को उम्मीद नहीं थी कि आप इतनी बड़ी चुनौती साबित होगी। लोकसभा चुनाव के बाद चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में मोदी ने चुनावी सफलता दिलाई थी और पार्टी को उम्मीद थी कि वे दिल्ली में भी आप को ठिकाने लगा देंगे। यह आकलन गलत समझ पर आधारित था।
भाजपा यह मान बैठी थी कि 2014 के लोकसभा चुनावों में इसने सातों सीटें जीत ली हैं लेकिन पार्टी यह भूल गई कि भविष्य में आप कितना बड़ा खतरा हो सकती है? विदित हो कि लोकसभा चुनावों में समूचे उत्तर भारत में मोदी लहर थी लेकिन उस दौर में भी आप ने आश्चर्यजनक रूप से 2014 में तीन फीसदी वोट शेयर बढ़ाया था। जिस दौर में आप ने तीन फीसदी वोट शेयर बढ़ाया वह कई अर्थों में आश्चर्यजनक था। इस समय पर भाजपा ने वर्ग, जाति की दीवारों से पार जाकर वोट हासिल किए थे। तब मध्यम वर्ग को खुश करने के लिए मोदी के गुड गवर्नेंस का नारा ही काफी था।
 
वर्ष 2013 के चुनावों में आप ने निचले और कमजोर तबकों में अपनी पैठ बना ली थी और मध्यम वर्ग के भी मत हासिल किए थे लेकिन तब भी ये मत इतने अधिक नहीं थे कि यह सरकार बनाने की हालत में आ पाती, लेकिन 2014 में इसने जो 3 फीसदी मतों की बढ़ोतरी दर्ज की, उसे अंत तक बनाए रखा। वर्ष 2013 में आप और भाजपा ने जहां समान रूप से 12-12 फीसदी वोट हासिल किए थे लेकिन लोकसभा चुनावों में आप ने 56 फीसदी वोट हासिल किए थे जबकि भाजपा को मात्र 2 फीसदी वोट हासिल हुए थे। 
 
उम्मीद की जा रही थी कि इस बार भी ऐसा ही होगा लेकिन असली बात तो यह है कि भाजपा और मोदी ने मध्यम और उच्चतर वर्गों का विश्वास खोया जो कि इसके भरोसेमंद मतदाता वर्ग थे। भले ही, एक्जिट पोल्स में कहा गया था कि आप, कांग्रेस और बसपा के मतों को पाने में सफल होगी, लेकिन अंतत: आप को जो सफलता मिली है, उसके बल पर ही पार्टी 67 सीटें जीतने में सफल हुई और भाजपा को केवल तीन सीटें से संतोष करना पड़ा। डॉ. हर्षवर्धन की कृष्णा नगर सीट पर किरण बेदी की हार यह बताने के लिए काफी है, आप को किस तरह समाज के सभी वर्गों और लोगों का समर्थन हासिल हुआ है।
 
यह कहना गलत ना होगा कि मोदी और भाजपा ने न केवल शहरी मध्यम वर्ग का भरोसा खोया। संघ परिवार के नेताओं की लव‍ जिहाद, घरवापसी, एएमयू को लेकर विवाद महिलाओं को लेकर भाजपा सांसदों के मूर्खतापूर्ण बयानों ने लोगों को नाराज कर दिया। दिल्ली का मध्यम वर्ग मोदी के सुशासन और विकास की बातों से प्रभावित था लेकिन जब राजधानी के बवाना, नांगलोई, नंदनगरी और ओखला में साम्प्रदायिक तनाव फैलने की घटनाएं हुईं, दो महीने में पांच चर्चों पर हमले किए गए और इन बातों ने भाजपा के उन नेताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जो कि हिंसा और सामाजिक विद्वेष बढ़ाने के बयान देते रहे।
 
हालांकि मोदी, समय-समय पर महात्मा गांधी का नाम लेते रहे लेकिन भाजपा, संघ परिवार से जुड़े कुछ लोग नाथूराम गोडसे की मूर्ति लगवाने की कोशिश करते रहे जोलोगों को पसंद नहीं आया। इस तरह की घटनाओं के कुछ अन्य परिणाम भी सामने आए। पार्टी की ओर से मोदी जो सकारात्मक हैडलाइंस पैदा कर रहे थे, उनका असर समाप्त हो गया। संघ से जुड़े कट्‍टरपंथियों पर मोदी का मौन मध्यम वर्ग को अच्छा नहीं लगा। लोग चाहते थे कि वे इन पर अंकुश लगाएं लेकिन मोदी की चुप्पी को लोगों ने लापरवाही, हठधर्मिता का उदाहरण समझा। पच्चीस दिसंबर को सुशासन दिवस मनाने की मोदी की समझ को खारिज कर दिया।
 
अपने मंत्रियों, सांसदों पर मोदी का नियंत्रण, पार्टी को लेकर अमित शाह के फैसले और किरण बेदी को पैरा़शूट उम्मीदवार बनाने का फैसला मतदाताओं की इच्छाओं के खिलाफ रहा। मोदी का अमेरिकी राष्ट्रपति को बराक कहना, दस लाख रुपए का सूट पहनना अहंकार की निशानी समझे गए। बाद में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने केजरीवाल को बदनसीब, नक्सलवादी, अराजकतावादी और 49 दिनों की सरकार को एक महाआपदा बताने से मतदाता खुश नहीं हुए। भाजपा ने केजरीवाल और आप पर भ्रष्टाचार के जितने आरोप लगाए, इनसे भी लोगों को लगा कि भाजपा उन्हें बुद्धिहीन समझती है।   
 
देश के अन्य शहरों की तुलना में दिल्ली का मध्यम वर्ग अलग है। यहां के इस वर्ग में वे नौकरशाह भी शामिल हैं जो अपने अधिकारों में कटौती की जाना पसंद नहीं करते हैं। शहर की सत्ता की ग्रिड में साझीदारी करने वाले मतदाता भी शहर में हैं तो यह ऐसा शहर है जो एक ऐसा मीडिया हब रखता है ‍जो अपनी सरकार की गहन छानबीन करता है। इसके मध्यम और उच्च वर्ग के लोग ऐसे हैं जो अपना विरोध दर्ज करने के लिए सड़क पर आ जाते हैं। साथ ही, यह ऐसा भी शहर है जहां भाजपा लगातार पांच बार राज्य का चुनाव जीतने में असफल साबित हुई है।
 
कोई भी पार्टी भारत के दूरदराज इलाकों की राजनीति को दिल्ली में नहीं दोहरा सकती। दिल्ली में भाजपा चुनाव हारी है क्योंकि उसके सामने केजरीवाल थे जो कि जगह-जगह पर, समय-समय पर 2013 की सरकार छोड़ने की गलती के लिए माफी मांगते रहे, वे गरीबों, मध्यम वर्ग और उच्च वर्गों के लिए अपना एजेंडा दोहराते रहे। यहां यह कहना गलत ना होगा कि दिल्ली आपको दंडित करती है लेकिन इसके साथ ही आपकी गलतियों को भी माफ करती है। अंतत: दिल्ली ने केजरीवाल को माफ कर ही दिया है और ताज उनके सिर पर रख दिया ताकि वे पांच साल तक निर्विघ्न सरकार चला सकें। 
Show comments

iPhone 18 Pro Max लॉन्च से पहले सस्ता हुआ iPhone 17 Pro Max, मिल रहा है धमाकेदार डिस्काउंट

निशु आजाद मामला : स्वतंत्र भारद्वाज को बुलंद शहर से हिरासत में लिया, CJP ने दिया था 72 घंटे का अल्टीमेटम, क्या है पूरा मामला

Kia Sorento : भारत में लॉन्च हुई नई प्रीमियम SUV, कीमत ₹27.99 लाख से शुरू; हाइब्रिड और डीजल इंजन के साथ मिलेगी AWD की सुविधा

BLA : बलूचिस्‍तान बना पाकिस्‍तानी सेना का कब्रिस्‍तान, बीएलए ने मचाई तबाही, मुनीर के 25 सैनिकों को किया ढेर

विजय के 'पीएम दांव' पर सियासत गर्माई : DMK और कांग्रेस का तंज, क्या 2029 में विजय बनेंगे प्रधानमंत्री?

सभी देखें

गृहमंत्री शाह ने ली दिल्‍ली इमारत हादसे की जानकारी, 4 लोगों की हुई मौत, अब तक 11 का हुआ रेस्‍क्‍यू, बिल्डिंग मालिक के खिलाफ FIR दर्ज

सागर नकली शराब मामला: सीएम डॉ. मोहन यादव ने दिए थे सख्त निर्देश, 3 अधिकारी निलंबित, 1 मुख्यालय अटैच

दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत ढही, मलबे में कई लोगों के दबे होने की आशंका, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी

UN के World Map Proposal पर भारत का बड़ा दांव, तिलमिला उठेगा पाकिस्तान

लखनऊ में खिलाड़ियों की चोट का होगा हाईटेक इलाज, 7.17 करोड़ से बन रहा स्पोर्ट्स साइंस एंड इंजरी मैनेजमेंट सेंटर