1. सामयिक
  2. विचार-मंथन
  3. विचार-मंथन
  4. Indian emperor
Written By अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

ये 25 'महामानव' जिन्होंने बनाया भारत को

यह भारत वर्ष अफगानिस्तान के हिन्दुकुश पर्वतमाला से अरुणाचल की पर्वत माला और कश्मीर की हिमाल की चोटियों से कन्याकुमारी तक फैला था। दूसरी और यह हिन्दूकुश से अरब सागर तक और अरुणाचल से बर्मा तक फैला था। इसके अंतर्गत वर्तमान के अफगानिस्तान बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, बर्मा, श्रीलंका, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि देश आते थे। इसके प्रमाण आज भी मौजूद हैं। भारत के शासन का केंद्र हर काल में अलग-अलग रहा है, कभी पुरुषपुर (पेशावर), तो कभी हस्तिनापुर (मेरठ), तो कभी इंद्रप्रस्थ (दिल्ली), कभी मथुरा तो कभी विजय नगरम रहा।
इस भरत खंड में कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर, अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण आदि रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए थे।
 
बाद में भारत में कृष्ण के काल में ये जनपद रहे:- अंग, अवंति, अश्मक, कंबोज, काशी, कुरु, कोशल, गांधार, चेदि, पंचाल, मगध, मत्स्य, मल्ल, वज्जि, वत्स और शूरसेन। हर काल में ये जनपद बदलते रहे। लेकिन जिस व्यक्ति ने उक्त संपूर्ण जनपदों पर राज किया वही चक्रवर्ती सम्राट कहलाया।
 
मूल रूप से प्राचीन भारत में अयोध्या कुल, यदु कुल, पौरव कुल और कुरुवंश का शासन था लेकिन इनके अलावा दिवोदास (काशी), दुर्दम (हैहय), कैकय (आनव), गाधी (कान्यकुब्ज), अर्जुन (हैहय), विश्वामित्र (कान्यकुब्ज), तालजङ्घ (हैहय), प्रचेतस् (द्रुह्यु), सुचेतस् (द्रुह्यु), सुदेव (काशी), दिवोदास द्वितीय और बलि (आनव) का भी राज्य शासन रहा।
 
उक्त सब राज्य और राजाओं से पहले देव और दैत्य के राजा होते थे, जिसमें इंद्र और राजा बलि का नाम प्रसिद्ध है। तिब्बत और उसके आसपास के क्षेत्र को इंद्रलोक कहते थे, जहां नंदन कानन वन और खंडववन था। राजा बलि ने अरब को अपना निवास स्थान बनाया था।
 
 
 
 
क्रमश: हुए शक्तिशाली राजा : स्वायंभुव मनु, प्रियव्रत, राजा बलि, अग्नीन्ध्र, ऋषभ, वैवस्वत मनु, भरत ध्रुवसंधि (भागिरथ के पूर्वज), यायाति, राजा हरिशचंद्र, कार्तवीर अर्जुन, राजा सुदास, राजा राम, लव और कुश, शकुंतला के पुत्र भरत, भरत पुत्र शांतनु, भीष्म, धृतराष्ट्र और धृराष्ट्र के बाद राजा युधिष्ठिर का भारत देश पर राज्य कायम हुआ। 
 
इन्द्रप्रस्थ, अयोध्या, हस्तिनापुर, मथुरा के प्रभाव का ह्रास होने पर भारत 16 जनपदों में बंट गया। इसमें जो जनपद शक्तिशाली होता वहीं अन्य जनपदों को अपने तरीके से संचालित करता था। धीरे-धीरे पाटलीपुत्र, तक्षशिला, वैशाली गांधार और विजयनगर जैसे साम्राज्यों का उदय हुआ। माना जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद जन्मेजय के बाद 17 राजाओं ने राज किया। कुछ इतिहाकार अनुसार जन्मेजय की 29वीं पीढ़ी में राजा उदयन हुए।
 
मगध (पाटलीपुत्र) पर वृहद्रथ के वीर पराक्रमी पुत्र और कृष्ण के दुश्मनों में से एक जरासंध का शासन था जिसके संबंध यवनों से घनिष्ठ थे। जरासंध के इतिहास के अंतिम शासक निपुंजय की हत्या उनके मंत्री सुनिक ने की और उसका पुत्र प्रद्योत मगध के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
 
प्रद्योत वंश के 5 शासकों के अंत के 138 वर्ष पश्चात ईसा से 642 वर्ष पूर्व शिशुनाग मगध के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। उसके बाद महापद्म ने मगध की बागडोर संभाली और नंद वंश की स्थापना की। महापद्म, जिन्हें महापद्मपति या उग्रसेन भी कहा जाता है, समाज के शूद्र वर्ग के थे। 
 
महापद्म ने अपने पूर्ववर्ती शिशुनाग राजाओं से मगध की बागडोर और सुव्यवस्थित विस्तार की नीति भी जानी। पुराणों में उन्हें सभी क्षत्रियों का संहारक बतलाया गया है। महापद्म ने उत्तरी, पूर्वी और मध्यभारत स्थित इक्ष्वाकु, पांचाल, काशी, हैहय, कलिंग, अश्मक, कौरव, मैथिल, शूरसेन और वितिहोत्र जैसे शासकों को हराया।
 
महापद्म के वंश की समाप्ति के बाद मगध पर नंद वंशों का राज कायम हुआ। पुराणों में नंद वंश का उल्लेख मिलता है, जिसमें सुकल्प (सहल्प, सुमाल्य) का जिक्र है, जबकि बौद्ध महाबोधिवंश में आठ नंद राजाओं के नामों का उल्लेख है। इस सूची में अंतिम शासक धनानंद का उल्लेखनीय है। यह धनानंद सिकंदर महान का शक्तिशाली समकालीन बताया गया है।
 
1. उग्रसेन, 2. पंडुक, 3. पंडुगति, 4. भूतपाल, 5. राष्ट्रपाल, 6. गोविषाणक, 7. दशसिद्धक, 8. कैवर्त, और 9. धन। इसका उल्लेख स्वतंत्र अभिलेखों में भी प्राप्त होता है, जो नंद वंश द्वारा गोदावरी घाटी- आंध्रप्रदेश, कलिंग- उड़ीसा तथा कर्नाटक के कुछ भाग पर कब्जा करने की ओर संकेत करते हैं। 
 
मगध के राजनीतिक उत्थान की शुरुआत ईसा पूर्व 528 से शुरू हुई, जब बिम्बिसार ने सत्ता संभाली। बिम्बिसार के बाद अजातशत्रु ने बिम्बिसार के कार्यों को आगे बढ़ाया। गौतम बुद्ध के समय में मगध में बिंबिसार और तत्पश्चात उसके पुत्र अजातशत्रु का राज था।
 
अजातशत्रु ने विज्यों (वृज्जिसंघ) से युद्ध कर पाटलीग्राम में एक दुर्ग बनाया। बाद में अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने गंगा और शोन के तट पर मगध की नई राजधानी पाटलीपुत्र नामक नगर की स्थापना की। पा‍टलीपुत्र के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए नंद वंश के प्रथम शासक महापद्म नंद ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और मगध साम्राज्य के अंतिम नंद धनानंद ने उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता संभाली। बस इसी अंतिम धनानंद के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए चाणक्य ने शपथ ली थी। हालांकि धनानंद का नाम कुछ और था लेकिन वह 'धनानंद' नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हुआ।
 
तमिल भाषा की एक कविता और कथासरित्सागर अनुसार नंद की '99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं' का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर उसमें अपना सारा खजाना गाड़ दिया था।
 
पुनश्च महानंद के पुत्र महापद्म ने नंद-वंश की नींव डाली। इसके बाद सुमाल्य आदि आठ नंदों ने शासन किया। महानंद के बाद नवनंदों ने राज्य किया। धनानंद नंद वंश का अंतिम राजा था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अर्जुन के समकालीन जरासंध के पुत्र सहदेव से लेकर शिशुनाग वंश से पहले के जरासंध वंश के 22 राजा मगध के सिंहासन पर बैठ चुके हैं। उनके बाद 12 शिशुनाग वंश के बैठे जिनमें छठे और सातवें राजाओं के समकालीन उदयन थे।
 
फिर से पढ़ें : कुरुओं का अंतिम राजा निचक्षु  और नंद वंश : 1300 ईसा पूर्व तक भारत में 16 महाजनपदों थे- कुरु, पंचाल, शूरसेन, वत्स, कोशल, मल्ल, काशी, अंग, मगध, वृज्जि, चे‍दि, मत्स्य, अश्मक, अवंति, गांधार और कंबोज। अधिकांशतः महाजनपदों पर राजा का ही शासन रहता था, परंतु गण और संघ नाम से प्रसिद्ध राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था। इस समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था। लेकिन इनमें से सबसे शक्तिशाली शासक मगथ, कुरु, पांचाल, शूरसेन और अवंति के थे। उनमें भी मगथ का शासन सबसे शक्तिशालली था।
 
महाभारत के बाद धीरे-धीरे धर्म का केंद्र तक्षशिला (पेशावर) से हटकर मगध के पाटलीपुत्र में आ गया। गर्ग संहिता में महाभारत के बाद के इतिहास का उल्लेख मिलता है। महाभारत युद्ध के पश्चात पंचाल पर पाण्डवों के वंशज तथा बाद में नाग राजाओं का अधिकार रहा। पुराणों में महाभारत युद्ध से लेकर नंदवंश के राजाओं तक 27 राजाओं का उल्लेख मिलता है।
 
इस काल में भरत, कुरु, द्रुहु, त्रित्सु और तुर्वस जैसे राजवंश राजनीति के पटल से गायब हो रहे थे और काशी, कोशल, वज्जि, विदेह, मगध और अंग जैसे राज्यों का उदय हो रहा था। इस काल में आर्यों का मुख्य केंद्र 'मध्यप्रदेश' था जिसका प्रसार सरस्वती से लेकर गंगा दोआब तक था। यही पर कुरु एवं पांचाल जैसे विशाल राज्य भी थे। पुरु और भरत कबीला मिलकर 'कुरु' तथा 'तुर्वश' और 'क्रिवि' कबीला मिलकर 'पंचाल' (पांचाल) कहलाए।
 
निचक्षु : महाभारत के बाद कुरु वंश का अंतिम राजा निचक्षु था। पुराणों के अनुसार हस्तिनापुर नरेश निचक्षु ने, जो परीक्षित का वंशज (युधिष्ठिर से 7वीं पीढ़ी में) था, हस्तिनापुर के गंगा द्वारा बहा दिए जाने पर अपनी राजधानी वत्स देश की कौशांबी नगरी को बनाया। इसी वंश की 26वीं पीढ़ी में बुद्ध के समय में कौशांबी का राजा उदयन था। निचक्षु और कुरुओं के कुरुक्षेत्र से निकलने का उल्लेख शांख्यान श्रौतसूत्र में भी है।

जन्मेजय के बाद क्रमश: शतानीक, अश्वमेधदत्त, धिसीमकृष्ण, निचक्षु, उष्ण, चित्ररथ, शुचिद्रथ, वृष्णिमत सुषेण, नुनीथ, रुच, नृचक्षुस्, सुखीबल, परिप्लव, सुनय, मेधाविन, नृपंजय, ध्रुव, मधु, तिग्म्ज्योती, बृहद्रथ और वसुदान राजा हुए जिनकी राजधानी पहले हस्तिनापुर थी तथा बाद में समय अनुसार बदलती रही। बुद्धकाल में शत्निक और उदयन हुए। उदयन के बाद अहेनर, निरमित्र (खान्दपनी) और क्षेमक हुए।
 
नंद वंश में नंद वंश उग्रसेन (424-404), पण्डुक (404-294), पण्डुगति (394-384), भूतपाल (384-372), राष्ट्रपाल (372-360), देवानंद (360-348), यज्ञभंग (348-342), मौर्यानंद (342-336), महानंद (336-324)। इससे पूर्व ब्रहाद्रथ का वंश मगध पर स्थापित था।
 
अयोध्या कुल के मनु की 94 पीढ़ी में बृहद्रथ राजा हुए। उनके वंश के राजा क्रमश: सोमाधि, श्रुतश्रव, अयुतायु, निरमित्र, सुकृत्त, बृहत्कर्मन्, सेनाजित, विभु, शुचि, क्षेम, सुव्रत, निवृति, त्रिनेत्र, महासेन, सुमति, अचल, सुनेत्र, सत्यजित, वीरजित और अरिञ्जय हुए। इन्होंने मगध पर क्षेमधर्म (639-603 ईपू) से पूर्व राज किया था।
 
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सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य : सम्राट चन्द्रगुप्त महान थे। उन्हें चन्द्रगुप्त महान कहा जाता है। सिकंदर के काल में हुए चन्द्रगुप्त ने सिकंदर के सेनापति सेल्युकस को दो बार बंधक बनाकर छोड़ दिया था। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु चाणक्य थे। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस की पुत्री हेलन से विवाह किया था। चन्द्रगुप्त की एक भारतीय पत्नी दुर्धरा थी जिससे बिंदुसार का जन्म हुआ।
 
चन्द्रगुप्त ने अपने पुत्र बिंदुसार को गद्दी सौंप दी थीं। बिंदुसार के समय में चाणक्य उनके प्रधानमंत्री थे। इतिहास में बिंदुसार को 'पिता का पुत्र और पुत्र का पिता' कहा जाता है, क्योंकि वे चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र और राजा अशोक महान के पिता थे।
 
चाणक्य और पौरस की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य मगध के सिंहासन पर बैठे और चन्द्रगुप्त ने यूनानियों के अधिकार से पंजाब को मुक्त करा लिया। चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबंध बड़ा व्यवस्थित था। इसका परिचय यूनानी राजदूत मेगस्थनीज के विवरण और कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' से मिलता है।
 
चन्द्रगुप्त महान के प्रारंभिक जीवन के बारे में जानकारी हमें जैन और बौद्ध ग्रंथों से प्राप्त होती है। विशाखदत्त के नाटक 'मुद्राराक्षस' में चन्द्रगुप्त को नंदपुत्र न कहकर मौर्यपुत्र कहा गया है। चन्द्रगुप्त मुरा नाम की भील महिला के पुत्र थे। यह महिला धनानंद के राज्य में नर्तकी थी जिससे राजाज्ञा से राज्य छोड़कर जाने का आदेश दिया गया था और वह महिला जंगल में रहकर जैसे-तैसे अपने दिन गुजार रही थी।
 
चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र था। 16 महाजनपदों में बंटे भारत में उसका जनपद सबसे शक्तिशाली था। चन्द्रगुप्त से पूर्व मगध पर क्रूर धनानंद का शासन था, जो बिम्बिसार और अजातशत्रु का वंशज था।
 
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सम्राट अशोक : अशोक महान प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश के राजा थे। अशोक के दादा का नाम चन्द्रगुप्त मौर्य था और पिता का नाम बिंदुसार था। बिंदुसार की मृत्यु 272 ईसा पूर्व हुई थी जिसके बाद अशोक राजगद्दी पर बैठे।
अशोक महान के समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक था। बस वह कलिंग के राजा को अपने अधिन नहीं कर पाया था। कलिंग युद्ध के बाद अशोक महान गौतम बुद्ध की शरण में चले गए थे। महात्मा बुद्ध की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया, जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल लुम्बिनी में मायादेवी मंदिर के पास अशोक स्तम्भ के रूप में देखा जा सकता है।
 
सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। अशोक के काल में बौद्ध धर्म की जड़ें मिस्र, सऊदी अरब, इराक, यूनान से लेकर श्रीलंका और बर्मा, थाईलैंड, चीन आदि क्षेत्र में गहरी जम गई थीं।
 
भगवान बुद्ध का धर्म भारत के सभी प्राचीन धर्मों का नवीनतम और अंतिम संस्करण है। बुद्ध दुनिया के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने धर्म को एक सुव्यवस्था दी और समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाकर समाज को धार्मिक आधार पर एक करने का कार्य किया।
 
बौद्ध धर्म को प्रचारित और प्रसारित करने में भिक्षुओं से ज्यादा योगदान सम्राट अशोक का था। चंद्रगुप्त मौर्य ने जहां चाणक्य के सान्निध्य में सनातन हिन्दू धर्म को संगठित कर राजधर्म लागू किया था वहीं उसके पोते सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म अपना लिया।
 
बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अशोक ने राजपाट नहीं छोड़ा बल्कि एक बौद्ध सम्राट के रूप में लगभग 20 वर्ष तक शासन किया। उसने अपने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। उसने दुनिया के हर कोने में बौद्ध स्तूप बनवाए या बनवाने में मदद की और इस तरह भारत में संपूर्ण रूप से बौद्ध साम्राज्य की स्थापना की गई। हालांकि अशोक से पहले छोटे-मोटे राजा थे जिन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर अपने-अपने राज्य में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया था।
 
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सम्राट पुष्यमित्र शुंग (लगभग 185 ई. पू.) : पुष्यमित्र शुंग मौर्य वंश को पराजित करने वाला तथा शुंग वंश का प्रवर्तक था। वह जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय था। अत्यधिक हिंसा के बाद भारत की सनातन भूमि बौद्ध भिक्षुओं व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी, जिसका संचालन अफगानिस्तान के बामियान और मगथ से होता था। मौर्य वंश का नौवां सम्राट वृहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा, तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, कश्मीर, पंजाब और लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था। इसके अलावा भूटान, चीन, बर्मा, थाईलैंड आदि अनेक दूसरे राष्ट्र भी बौद्ध धर्म के झंडे तले आ चुके थे, लेकिन वृहद्रथ का शासन सिंधु के इस पार तक सिमटकर रह गया था।
 
भारत में बस नाममात्र के ही राजा थे, जो हिन्दू राजा कहलाते थे। उनमें भी ज्यादातर दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और राजस्थान के राजा थे। उत्तरी अफगानिस्तान बौद्धों का गढ़ और राजधानी बन चुका था।
 
जब भारत के मगथ में नौवां बौद्ध शासक वृहद्रथ राज कर रहा था, तब ग्रीक राजा मीनेंडर अपने सहयोगी डेमेट्रियस (दिमित्र) के साथ युद्ध करता हुआ सिंधु नदी के पास तक पहुंच चुका था। सिंधु के पार उसने भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाई। इस मीनेंडर या मिनिंदर को बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा जाता है। किंवदंति के अनुसार उसने सीमावर्ती इलाके के कुछ बौद्ध भिक्षुओं को अपने साथ मिला लिया। उसने कहा कि अदि आप भारत विजय में मेरा साथ देंगे तो मैं विजय के पश्चात बौद्ध धर्म अंगीकार कर लूंगा। हालांकि 'मिलन्दपन्हो' में मिलिन्द एवं बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य सम्पन्न वाद-विवाद के परिणामस्वरूप मिलिन्द ने बगैर किसी शर्तों पर बौद्ध धर्म स्वीकार किया था।
 
इतिहास के एक दूसरे पहलु अनुसार बौद्ध भिक्षुओं का वेश धरकर मिनिंदर के सैनिक मठों में आकर रहने लगे। हजारों मठों में सैनिकों के साथ-साथ हथियार भी छुपा दिए गए। इस गति‍विधि की जानकारी बौद्ध सम्राट वृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग को लगी।
 
पुष्यमित्र ने सम्राट वृहद्रथ से मठों की तलाशी की आज्ञा मांगी, परंतु बौद्ध सम्राट वृहद्रथ ने यह कहकर मना कर दिया कि तुम्हें व्यर्थ का संदेह है। लेकिन पुष्यमित्र शुंग एक राष्ट्रभक्त था। उसने राजाज्ञा का पालन किए बिना मठों की तलाशी ली और सभी भिक्षुओं को पकड़ लिया और भारी मात्रा में हथियार जब्त कर लिए, परंतु वृहद्रथ को आज्ञा का उल्लंघन अच्छा नहीं लगा।
 
कहते हैं कि पुष्यमित्र शुंग जब वापस राजधानी पहुंचा तब सम्राट वृहद्रथ सेना परेड लेकर जांच कर रहा था। उसी दौरान पुष्यमित्र शुंग और वृहद्रथ में कहासुनी हो गई। कहासुनी इतनी बढ़ी कि वृहद्रथ ने तलवार निकालकर पुष्यमित्र शुंग की हत्या करना चाही, लेकिन सेना को वृहद्रथ से ज्यादा पुष्यमित्र शुंग पर भरोसा था। सेना में बौद्ध भी होते थे और हिन्दू भी। पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ का वध कर दिया और फिर वह खुद सम्राट बन गया। इस दौरान सीमा पर मिलिंद ने आक्रमण कर दिया।
 
फिर पुष्यमित्र ने अपनी सेना का गठन किया और भारत के मध्य तक चढ़ आए मिनिंदर पर आक्रमण कर दिया। भारतीय सैनिकों के सामने ग्रीक सैनिकों की एक न चली। अंतत: पुष्‍यमित्र शुंग की सेना ने ग्रीक सेना का पीछा करते हुए उसे सिन्धु पार धकेल दिया।
 
कुछ बौद्ध ग्रंथों में लिखा है कि पुष्यमित्र ने बौद्धों को सताया था, लेकिन क्या यह पूरा सत्य है? नहीं, पुष्यमित्र एक कट्टर राष्ट्रभक्त जरूर था लेकिन वह भिक्षुओं का सम्मान करता था। कहते हैं कि सम्राट ने उन राष्ट्रद्रोही बौद्धों को सजा दी, जो उस समय ग्रीक शासकों का साथ दे रहे थे। मिलिंद पंजाब पर राज्य करने वाले यवन राजाओं में सबसे उल्लेखनीय राजा था। उसने अपनी सीमा का स्वात घाटी से मथुरा तक विस्तार कर लिया था। अब वह पाटलीपुत्र पर भी आक्रमण करना चाहता था।
 
इतिहासकारों अनुसार पुष्यमित्र का शासनकाल चुनौतियों से भरा हुआ था। उस समय भारत पर कई विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए, जिनका सामना पुष्यमित्र शुंग को करना पड़ा। पुष्यमित्र चारों तरफ से बौद्ध, शाक्यों आदि सम्राटों से घिरा हुआ था। फिर भी राजा बन जाने पर मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला। पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र ने 36 वर्ष (185-149 ई.पू.) तक राज्य किया। इसके बाद उसके राज्य का जब पतन हो गया, तो फिर से बौद्धों का उदय हुआ। हालांकि पुष्यमित्र शुंग के बाद 9 और शासक हुए- अग्निमित्र, वसुज्येष्ठ, वसुमित्र, अन्ध्रक, तीन अज्ञात शासक, भागवत, देवभूति। पुष्यमित्र शुंग को बौद्ध विरोधी समझना इतिहास की भूल है। इतिहास को जवाहरलाल नेहरू विश्‍व विद्यालय में बैठे वामपंथियों ने लिखा इसलिए उन्होंने पुष्यमित्र शुंग खलनायक की तरह प्रस्तुत किया।
 
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सम्राट विक्रमादित्य : विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज से 2285 वर्ष पूर्व हुए थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। नाबोवाहन के पुत्र राजा गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट थे। गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे।
 
विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठे। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। इनमें कालिदास भी थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।
 
उज्जैन के विक्रमादित्य के समय ही विक्रम संवत चलाया गया था। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा ईरान, इराक और अरब में भी था। विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उर ओकुल' में किया है।
 
विक्रमादित्य के पहले और बाद और ‍भी विक्रमादित्य हुए हैं जिसके चलते भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के बाद 300 ईस्वी में समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य हुए।
 
विक्रमादित्य द्वितीय 7वीं सदी में हुए, ‍जो विजयादित्य (विक्रमादित्य प्रथम) के पुत्र थे। विक्रमादित्य द्वितीय ने भी अपने समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण बनाए रखा। विक्रमादित्य द्वितीय के काल में ही लाट देश (दक्षिणी गुजरात) पर अरबों ने आक्रमण किया। विक्रमादित्य द्वितीय के शौर्य के कारण अरबों को अपने प्रयत्न में सफलता नहीं मिली और यह प्रतापी चालुक्य राजा अरब आक्रमण से अपने साम्राज्य की रक्षा करने में समर्थ रहा।
 
पल्‍लव राजा ने पुलकेसन को परास्‍त कर मार डाला। उसका पुत्र विक्रमादित्‍य, जो कि अपने पिता के समान महान शासक था, गद्दी पर बैठा। उसने दक्षिण के अपने शत्रुओं के विरुद्ध पुन: संघर्ष प्रारंभ किया। उसने चालुक्‍यों के पुराने वैभव को काफी हद तक पुन: प्राप्‍त किया। यहां तक कि उसका परपोता विक्रमादित्‍य द्वितीय भी महान योद्धा था। 753 ईस्वी में विक्रमादित्‍य व उसके पुत्र का दंती दुर्गा नाम के एक सरदार ने तख्‍ता पलट दिया। उसने महाराष्‍ट्र व कर्नाटक में एक और महान साम्राज्‍य की स्‍थापना की, जो राष्‍ट्र कूट कहलाया।
 
विक्रमादित्य द्वितीय के बाद 15वीं सदी में सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य 'हेमू' हुए। माना जाता है कि उज्जैन के विक्रमादित्य के पूर्व भी एक और विक्रमादित्य हुए थे।
 
सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बाद 'विक्रमादित्य पंचम' सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए। उन्होंने लगभग 1008 ई. में चालुक्य राज्य की गद्दी को संभाला। राजा भोज के काल में यही विक्रमादित्य थे। विक्रमादित्य पंचम ने अपने पूर्वजों की नीतियों का अनुसरण करते हुए कई युद्ध लड़े। उसके समय में मालवा के परमारों के साथ चालुक्यों का पुनः संघर्ष हुआ और वाकपतिराज मुञ्ज की पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमार राजा भोज ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त किया। लेकिन एक युद्ध में विक्रमादित्य पंचम ने राजा भोज को भी हरा दिया था।
 
अगले पन्ने पर पांचवें महान सम्राट...
 

शक सम्राट रुद्रदामन : यूं तो शक राजाओं में कई प्रतापी राजा हुए लेकिन उनका कम ही उलेख मिलता है। शकों के काल में मथुरा और उज्जैन भारत की सत्ता के केंद्र में थे इसीलिए शकों ने उज्जैन पर आक्रमण कर उसे अपने अधिन कर लिया। 
 
रुद्रदामन उज्जैन के सिंहास बैठा जो 'कार्दमकवंशी' चष्टन का पौत्र था। रुद्रदामन इस वंश का सर्वाधिक योग्य शासक था और इसका शासन काल 130 से 150 ई. माना जाता है। रुद्रदामन एक अच्छा प्रजापालक, तर्कशास्त्र का विद्वान तथा संगीत का प्रेमी था। इसके समय में उज्जयिनी शिक्षा, कला और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बन गई थी।
 
कहते हैं कि कुषाणों की तरह शक भी मध्य एशिया से निकाले जाने पर काबुल-कंधार की ओर होते हुए उज्जैन तक आ पहुंचे और यहां राज्य किया। महाभारत, पुराण, रामायण आदि सभी में शक या शाक्यों का उल्लेख मिलता है।
 
एक अनुश्रुति अनुसार उज्जैन के जैनाचार्य कालक का उज्जैन के राजा गर्दभिल्ल से विवाद था जिसके चलते वे पश्चिम के पार्थियन राज्य में चले गए थे जहां राजा मिथिदातस द्वितीय के अत्याचारों से परेशान शक लोगों के मुखियां को उन्होंने भारत आने के लिए प्रेरित किया।
 
कालक के साथ शक लोग पहले सिन्ध में प्रविष्ट हुए, और वहां पर उन्होंने अपना राज्य स्थापित कर लिया। फिर वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए। बाद में सौराष्ट्र को जीतकर उन्होंने उज्जयिनी पर भी आक्रमण कर वहां के राज्या गर्दभिल्ल को परास्त किया। शकों की मुख्य राजधानी मीननगर थी। बाद में उन्होंने लगभग ई.पू. 100 में मथुरा को अपना केंद्र बना लिया था। उनके शासन के अंतर्गत गांधार, सिंध, महाराष्ट्र, मथुरा और मालवा था। इस कुल में कई प्रातापी राजा हुए लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा नहपान, चष्टक और रुद्रदामन की होती है।
 
नहपान का शासनकाल सम्भवतः 119 से 224 तक रहा। कुछ लोग नहपान को ही शक संवत का प्रवर्तक मानते हैं। दूसरी ओर उज्जयिनी का पहला स्वतंत्र शक शासक चष्टण था। इसने अपने अभिलेखों में शक संवत का प्रयोग किया था। इसके अनुसार इस वंश का राज्य 130 ई. से 388 ई. तक चला। उज्जैन के क्षत्रपों में सबसे प्रसिद्ध रुद्रदामा (130 ई. से 150 ई.) था।
 
चौथी शताब्दी ई. के अन्त में समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय (शासन: 380-412 ईसवी) ने इस वंश के अन्तिम रुद्रसिंह तृतीय की हत्या कर शकों के क्षेत्रों को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। चन्द्रगुप्त द्वितीय भी शाकारि विक्रमादित्य की उपाधि से अलंकृत था।
 
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शकारि विक्रमादित्य द्वितीय  कुन्तल सातकर्णि  : महाराष्ट्र में सातवाहन राजाओं ने देर तक शकों के आक्रमण को रोके रखा। वीम के काल में जब शकों का जबरदस्त आक्रमण हुआ तो द्वितीय विक्रमादित्य का प्रादुर्भाव हुआ, जिसने इन नवागत शकों को परास्त कर दूसरी बार शकारि की उपाधि ग्रहण की। इस प्रतापशाली राजा का नाम कुन्तल सातकर्णि था। इसने मुलतान के समीप राजा विम की सेनाओं को परास्त कर कर दिया था। विक्रमादित्य द्वितीय बड़ा ही प्रतापी राजा था। उसकी रानी का नाम मलयवती था। सातवाहन राजा प्राकृत भाषा बोलते थे, पर कुन्तल सातकर्णि की रानी मलयवती की भाषा संस्कृत थी।
 
वात्स्यायन के कामसूत्र में उसका उल्लेख आया है। कुन्तल सातकर्णि (विक्रमादित्य द्वितीय) के राजदरबार में गुणाढ्य नाम का प्रसिद्ध लेखक व कवि रहता था। जिसने प्राकृत भाषा का प्रसिद्ध ग्रंथ 'बृहत्कथा' लिखा था।
 
संस्कृत ग्रंथ कथासरित्सागर के अनुसार विक्रमादित्य द्वितीय का साम्राज्य सम्पूर्ण दक्खन, काठियावाड़, मध्य प्रदेश, बंग, अंग और कलिंग तक विस्तृत था, तथा उत्तर के सब राजा, यहां तक कि काश्मीर के राजा भी उसके अधिन थे। अनेक दुर्गों को जीतकर उसने शकों का उसने संहार किया था। शको का संहार करके उसने उज्जयिनी में एक बड़ा उत्सव किया गया, जिसमें गौड़, कर्नाटक, लाट, काश्मीर, सिन्ध आदि के अधीनस्थ राजा सम्मिलित हुए। तब विक्रमादित्य-2 का एक बहुत शानदार जुलूस निकला, जिसमें इन सब राजाओं ने भाग लिया था।
 
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कनिष्क(115-147 ई॰ लगभग) : बौद्ध सम्राटों में अशोक के बाद कनिष्क का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वह बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अनुयायी था और उसने बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार किया। विम के पश्चात कनिष्क सिंहासन पर बैठा था। कषिष्क कुषाणवंशी था। कुषाण कौन थे इस पर मतभेद हैं। हिन्दू कहते हैं कि यह कुष्मांडा जाति के थे जो शैव धर्म को मानते थे। दूसरी ओर अंग्रेज इतिहासकार इन्हें मध्य एशिया का मानते हैं।
 
कनिष्क का राज्य मध्य एशिया से लेकर भारत के पूर्वी भाग तक था। उसके शासन के अंतर्गत तुर्किस्तान (तुर्की), काशगर, यारकंद, खोतन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कश्मीर, मथुरामंडल, बिहार आदि क्षेत्र आते थे। उत्तर में पेशावर (पुरुषपुर) को इसने अपने राज्य की राजधानी बनाया था। मध्य में मथुरा तथा पूर्व में सारनाथ उसके राज्य के मुख्य केन्द्र थे। खोतनी साहित्य तथा चीनी साहित्य में कनिष्क की अनेक विजय यात्राओं का उल्लेख मिलता है।
 
कनिष्क के दरबार में वसुमित्र, अश्वघोष, नागार्जुन, पार्श्व, चरक, संघरक्ष, और माठर जैसे विख्यात विद्धानों के अतिरिक्त अनेक कवि और कलाकार भी थे। अश्वघोष ने 'बुद्धचरित्र' तथा 'सौन्दरनन्द', शारिपुत्रकरण एवं सूत्रालंकार की रचना की। उनकी इस रचता की तुलना मिल्टन, गेटे, काण्ट एवं वॉल्टेयर से की जाती है जबकि होना उल्टा चाहिए।
 
कनिष्क ने सैकड़ों बौद्ध स्तूपों का निर्माण करवाया था। पेशावर और तक्षशिला की तरह कनिष्क ने मथुरा में भी अनेक बौद्ध स्तूपों और मठों का निर्माण करवाया था। कनिष्क के काल में हिन्दू और जैन धर्म की उन्नती भी हुई। कनिष्क ने अपने शासन के अंतर्गत सभी धर्मावलंबियों को स्वतंत्रता प्रदान कर रखी थी।
 
कनिष्क के पश्चात्य उसका पुत्र वासिष्क (102 -106 ई॰) और पौत्र हुविष्क(सं.163.-सं.195) ने शासन किया। परवर्ती कुषाणों को हूणों से तथा उनके पश्चात मुसलमानों से लड़ना पड़ा और अंतत: वे अपनी सत्ता और अपना अस्तित्व खो बैठे।
 
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समुद्रगुप्त : गुप्त साम्राज्य के दो महत्वपूर्ण राजा था पहले समुद्रगुप्त और दूसरे चंद्रगुप्त द्वितीय। शुंग वंश के पतन के बाद सनातन संस्कृति‍ की एकता को फिर से एकजुट करने का श्रेय गुप्त वंश के लोगों को जाता है। गुप्त वंश की स्थापना 320 ई. लगभग चंद्रगुप्त प्रथम ने की थी और 510 ई. तक यह वंश शासन में रहा। इस वंश में अनेक प्रतापी राजा हुए। नृसिंहगुप्त बालादित्य (463-473 ई.) को छोड़कर सभी गुप्तवंशी राजा वैदिक धर्मावलंबी थे। बालादित्य ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। आरंभ में इनका शासन केवल मगध पर था, पर बाद में संपूर्ण उत्तर भारत को अपने अधीन कर लिया था। इसके बाद दक्षिण में कांजीवरम के राजा ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था।
 
गुप्त वंश के सम्राटों में क्रमश: श्रीगुप्त, घटोत्कच, चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, रामगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम (महेंद्रादित्य) और स्कंदगुप्त हुए। स्कंदगुप्त के समय हूणों ने कंबोज और गांधार (उत्तर अफगानिस्तान) पर आक्रमण किया था। हूणों ने अंतत: भारत में प्रवेश करना शुरू किया। हूणों का मुकाबला कर गुप्त साम्राज्य की रक्षा करना स्कन्दगुप्त के राज्यकाल की सबसे बड़ी घटना थी। स्कंदगुप्त और हूणों की सेना में बड़ा भयंकर मुकाबला हुआ और गुप्त सेना विजयी हुई। हूण कभी गांधार से आगे नहीं बढ़ पाए, जबकि हूण और शाक्य जाति के लोग उस समय भारत के भिन्न- भिन्न इलाकों में रहते थे।
 
स्कंदगुप्त के बाद उत्तराधिकारी उसका भाई पुरुगुप्त (468-473 ई.) हुआ। उसके बाद उसका पुत्र नरसिंहगुप्त पाटलीपुत्र की गद्दी पर बैठा जिसने बौद्ध धर्म अंगीकार कर राज्य में फिर से बौद्ध धर्म की पताका फहरा दी थी। उसके पश्चात क्रमश: कुमारगुप्त द्वितीय तथा विष्णुगुप्त ने बहुत थोडे़ समय तक शासन किया। 477 ई. में बुद्धगुप्त, जो शायद पुरुगुप्त का दूसरा पुत्र था, गुप्त-साम्राज्य का अधिकारी हुआ। ये सभी बौद्ध हुए। इनके काल में बौद्ध धर्म को खूब फलने और फूलने का मौका मिला। बुद्धगुप्त का राज्य अधिकार पूर्व में बंगाल से पश्चिम में मालवा तक के विशाल भू-भाग पर था। यह संपूर्ण क्षेत्र में बौद्धमय हो चला था। यहां शाक्यों की अधिकता थी। सनातन धर्म का लोप हो चुका था। जैन और बौद्ध धर्म ही शासन के धर्म हुआ करते थे।
 
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गुप्त साम्राज्य (320-540 ईस्वी) चन्द्रगुप्त द्वितीय : गुप्त काल को भारत का स्वर्ण काल कहा जाता है। गुप्त वंश की स्थापना चन्द्रगुप्त प्रथम ने की थी। आरंभ में इनका शासन केवल मगध पर था, पर बाद में गुप्त वंश के राजाओं ने संपूर्ण उत्तर भारत को अपने अधीन करके दक्षिण में कांजीवरम के राजा से भी अपनी अधीनता स्वीकार कराई।
समुद्रगुप्त का पुत्र 'चन्द्रगुप्त द्वितीय' समस्त गुप्त राजाओं में सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से संपन्न था। शकों पर विजय प्राप्त करके उसने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। वह 'शकारि' भी कहलाया। मालवा, काठियावाड़, गुजरात और उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिलाकर उसने अपने पिता के राज्य का और भी विस्तार किया। चीनी यात्री फाह्यान उसके समय में 6 वर्षों तक भारत में रहा। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासनकाल भारत के इतिहास का बड़ा महत्वपूर्ण समय माना जाता है।
 
चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में गुप्त साम्राज्य अपनी शक्ति की चरम सीमा पर पहुंच गया था। दक्षिणी भारत के जिन राजाओं को समुद्रगुप्त ने अपने अधीन किया था, वे अब भी अविकल रूप से चन्द्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते थे। शक-महाक्षत्रपों और गांधार-कम्बोज के शक-मुरुण्डों के परास्त हो जाने से गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अरब सागर तक और हिन्दूकुश के पार वंक्षु नदी तक हो गया था। 
 
गुप्त वंश में अनेक प्रतापी राजा हुए- श्रीगुप्त, घटोत्कच, चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, रामगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य) और स्कंदगुप्त। चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त थी। उसके काल में भारत ने हर क्षेत्र में उन्नति की। उज्जैन के सम्राट गंधर्वसेन के पुत्र राजा विक्रमादित्य के नाम से चक्रवर्ती सम्राटों को ही विक्रमादित्य की उपाधि से सम्माननीय किया जाता था।
 
मौर्य वंश के बाद भारत में कुषाण, शक और शुंग वंश के शासकों का भारत के बहुत बड़े भू- भाग पर राज रहा। इन वंशों में भी कई महान और प्रतापी राजा हुए। चन्द्रगुप्त मौर्य से विक्रमादित्य और फिर विक्रमादित्य से लेकर हर्षवर्धन तक कई प्रतापी राजा हुए।
 
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मिहिरकुल (515 - 540) :  तोरमाण का पुत्र मिहिरगुल लगभग 515 ई. में गद्दी पर बैठा था। उसकी राजधानी पंजाब में 'साकल' अथवा 'सियालकोट' थी। कल्हण ने बारहवीं शताब्दी में राजतरंगिणी नामक ग्रन्थ में कश्मीर का इतिहास लिखा हैं। उन्होंने मिहिरकुल का एक शक्तिशाली विजेता के रूप में चित्रण किया हैं। वे कहते हैं कि मिहिरकुल काल का दूसरा नाम था। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के संपूर्ण क्षेत्र पर अपना शासन स्थापित कर दिया था। उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया था। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था।
 
इतिहासकार मानते हैं 450 ईं में हूण गांधार क्षेत्र के शासक थे और यहां से इन्होंने सारे सिंधु प्रदेश को जीत लिया था। 5वीं शताब्दी के मध्यकाल में गुप्तकाल के दौरान हूणों के राजा तोरमाण ने मालवा (मध्यप्रदेश का एक हिस्सा) की विजय करने के बाद भारत में स्थायी निवास बना लिया था। 
स्कंदगुप्त के काल में ही हूणों ने कंबोज और गांधार अर्थात बौद्धों के गढ़ संपूर्ण अफगानिस्तान पर अधिकार करके फिर से हिन्दू राज्य को स्थापित कर दिया था। लगभग 450 ईस्वीं में उन्होंने सिन्धु घाटी क्षेत्र को जीत लिया। कुछ समय बाद ही उन्होंने मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान के इलाके भी जीत लिए। 495 ईस्वीं के लगभग हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में गुप्तों से पूर्वी मालवा छीन लिया। एरण, सागर जिले में वराह मूर्ति पर मिले तोरमाण के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती है। सभी हूण शिव के कट्टर भक्त थे।
 
जैन ग्रंथ 'कुवयमाल' के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या नगरी से भारत पर शासन करता था। इतिहासकारों के अनुसार पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी। तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का राजा बना।
 
मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों में हमेशा उसके साथ रहता था। उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और बौद्ध धर्मावलंबी गुप्तों से भी कर वसूल करना शुरू कर दिया। तोरमाण के बाद मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया।
 
मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासनकाल में हजारों शिव मंदिर बनवाए और बौद्धों के शासन को उखाड़ फेंका। उसने संपूर्ण भारतवर्ष में अपने विजय अभियान चलाए और वह बौद्ध, जैन और शाक्यों के लिए आतंक का पर्याय बन गया था, वहीं विक्रमादित्य और अशोक के बाद मिहिरकुल ही ऐसा शासन था जिसके अधीन संपूर्ण अखंड भारत आ गया था। उसने ढूंढ-ढूंढकर शाक्य मुनियों को भारत से बाहर खदेड़ दिया।
 
मिहिरकुल इतना कट्टर था कि जिसके बारे में बौद्ध और जैन धर्मग्रंथों में विस्तार से जिक्र मिलता है। वह भगवान शिव के अलावा किसी के सामने अपना सिर नहीं झुकाता था। यहां तक कि कोई हिन्दू संत उसके विचारों के विपरीत चलता तो उसका भी अंजाम वही होता, जो शाक्य मुनियों का हुआ। मिहिरकुल के सिक्कों पर 'जयतु वृष' लिखा है जिसका अर्थ है- जय नंदी।
 
इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी। उसने 'क्रिश्‍चियन टोपोग्राफी' नामक अपने ग्रंथ में लिखा है कि हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, उनका राजा मिहिरकुल एक विशाल घुड़सवार सेना और कम से कम 2 हजार हाथियों के साथ चलता है, वह भारत का स्वामी है।
 
मिहिरकुल के लगभग 100 वर्ष बाद चीनी बौद्ध तीर्थ यात्री ह्वेनसांग 629 ईस्वी में भारत आया, वह अपने ग्रंथ सी-यू-की में लिखता है कि कई वर्ष पहले मिहिरकुल नाम का राजा हुआ करता था, जो स्यालकोट से भारत पर राज करता था। ह्वेनसांग बताता है कि मिहिरकुल ने भारत में बौद्ध धर्म को बहुत भारी नुकसान पहुंचाया। ह्वेनसांग के अनुसार मिहिरकुल ने भारत से बौद्धों का नामो-निशान मिटा दिया। क्यों? इसके पीछे भी एक कहानी है। वह यह कि बौद्धों के प्रमुख ने मिहिरकुल का घोर अपमान किया था। उसकी क्रूरता के कारण ही जैन और बौद्ध ग्रंथों में उसे कलिराज कहा गया है।
 
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा है कि राजा बालादित्य ने तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल को कैद कर लिया था, पर बाद में उसे छोड़ दिया था। यह बालादित्य के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुआ।
 
मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के इलाके जीत लिए थे। उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेश्वर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था। उसने फिर से भारत में सनातन हिन्दू धर्म की स्थापना की थी।
 
यशोवर्मन और बालादित्य : मिहिरकुल के आतंक को देखते हुए यशोवर्मन और बालादित्य ने मिलकर 528 ईस्वी में उसे पराजित कर दिया। लेगांधार क्षेत्र में मिहिरकुल के भाई के विद्रोह के कारण, उत्तर भारत का साम्राज्य उसके हाथ से निकलकर उसके विद्रोहियों के हाथों में चला गया। लगभ 528 ई. में मगध के राजा बालादित्य और मंदसोर के राजा यशोधर्मन ने मिलकर मिहिरकुल को पराजित किया और भगा दिया। मिहिरकुल भागकर कश्मीर आ गया और यहां का शासक बन बैठा। किन इस पराजय के बाद भी हूण वापस मध्य एशिया नहीं गए। वे भारत में ही बस गए और यहीं के हिन्दू धर्म और संस्कृ‍ति के अंग बन गए थे। 
 
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हर्षवर्धन (590 ईस्वी से 647 तक): पाल राजाओं में हर्षवर्धन का नाम प्रमुख है। इस्लाम धर्म के संस्‍थापक हजरत मुहम्मद के समकालीन राजा हर्षवर्धन ने लगभग आधी शताब्दी तक अर्थात् 590 ईस्वी से लेकर 647 ईस्वी तक अपने राज्य का विस्तार किया। हर्षवर्धन ने ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’ और ‘नागरानंद’ नामक नाटिकाओं की भी रचना की। हर्षवर्धन का राज्यवर्धन नाम का एक भाई भी था। हर्षवर्धन की बहन का नाम राजश्री था। उनके काल में कन्नौज में मौखरि वंश के राजा अवंति वर्मा शासन करते थे।
 
हर्ष का जन्म थानेसर (वर्तमान में हरियाणा) में हुआ था। यहां 51 शक्तिपीठों में से 1 पीठ है। हर्ष के मूल और उत्पत्ति के संदर्भ में एक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जो कि गुजरात राज्य के गुन्डा जिले में खोजा गया है।
 
हर्षवर्धन ने पंजाब छोड़कर शेष समस्त उत्तरी भारत पर राज्य किया था। उनके पिता का नाम प्रभाकरवर्धन था। प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के पश्चात राज्यवर्धन राजा हुआ, पर मालव नरेश देवगुप्त और गौड़ नरेश शशांक की दुरभिसंधिवश मारा गया। हर्षवर्धन 606 में गद्दी पर बैठा।
 
6ठी और 8वीं ईसवीं के दौरान दक्षिण भारत में चालुक्‍य बड़े शक्तिशाली थे। इस साम्राज्‍य का प्रथम शास‍क पुलकेसन, 540 ईसवीं में शासनारूढ़ हुआ और कई शानदार विजय हासिल कर उसने शक्तिशाली साम्राज्‍य की स्‍थापना की। उसके पुत्रों कीर्तिवर्मन व मंगलेसा ने कोंकण के मौर्यन सहित अपने पड़ोसियों के साथ कई युद्ध करके सफलताएं अर्जित कीं व अपने राज्‍य का और विस्‍तार किया।
 
कीर्तिवर्मन का पुत्र पुलकेसन द्वितीय चालुक्‍य साम्राज्‍य के महान शासकों में से एक था। उसने लगभग 34 वर्षों तक राज्‍य किया। अपने लंबे शासनकाल में उसने महाराष्‍ट्र में अपनी स्थिति सुदृढ़ की व दक्षिण के बड़े भू-भाग को जीत लिया। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि हर्षवर्धन के विरुद्ध रक्षात्‍मक युद्ध लड़ना थी।
 
कादंबरी के रचयिता कवि बाणभट्ट उनके (हर्षवर्धन) के मित्रों में से एक थे। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत में अराजकता की स्थिति बनी हुई थी। ऐसी स्थिति में हर्ष के शासन ने राजनीतिक स्थिरता प्रदान की। कवि बाणभट्ट ने उसकी जीवनी 'हर्षचरित' में उसे 'चतुःसमुद्राधिपति' एवं 'सर्वचक्रवर्तिनाम धीरयेः' आदि उपाधियों से अलंकृत किया।
 
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धर्मपाल : पाल वंश का सबसे बड़ा सम्राट 'गोपाल' का पुत्र 'धर्मपाल' था। इसने 770 से लेकर 810 ई. तक राज्य किया। हर्षवर्धन के बाद भारत में पाल, प्रातिहार और राजपूतों का शासन रहा जबकि दक्षिण में राष्ट्रकूट वंश का शासन था। उक्त सभी के बाद फिर भारत में मराठा, मुगल और सिखों का साम्राज्य रहा जबकि दक्षिण में बहमनी, निजामशाहियों, विजयनगर साम्राज्य, काकतिया साम्राज्य आदि का राज रहा।
 
हर्ष के समय के बाद से उत्तरी भारत के प्रभुत्व का प्रतीक कन्नौज माना जाता था। बाद में यह स्थान दिल्ली ने प्राप्त कर लिया। पाल साम्राज्य की नींव 750 ई. में 'गोपाल' नामक राजा ने डाली। पाल वंश का सबसे बड़ा सम्राट 'गोपाल' का पुत्र 'धर्मपाल' था। इसने 770 से लेकर 810 ई. तक राज्य किया।
 
पहले प्रतिहार शासक 'वत्सराज' ने धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पर इसी समय राष्ट्रकूट सम्राट 'ध्रुव', जो गुजरात और मालवा पर प्रभुत्व के लिए प्रतिहारों से संघर्ष कर रहा था, उसने उत्तरी भारत पर धावा बोल दिया। कड़े संघर्ष के बाद उसने नर्मदा पार कर आधुनिक झांसी के निकट वत्सराज को युद्ध में पराजित किया। इसके बाद उसने आगे बढ़कर गंगा घाटी में धर्मपाल को हराया। इन विजयों के बाद यह राष्ट्रकूट सम्राट 790 में दक्षिण लौट आया।
 
प्रतिहारों के कमजोर पड़ने के धर्मपाल फिर सक्रिय हुआ। वह अपनी हार से शीघ्र उठ खड़ा हुआ और उसने अपने एक व्यक्ति को कन्नौज के सिंहासन पर बैठा दिया। यहां उसने एक विशाल दरबार का आयोजन किया और आसपास के सभी छोटे राजाओं को अपना सहयोगी बना लिया। इनमें गांधार (पश्चिमी पंजाब तथा काबुल घाटी), मद्र (मध्य पंजाब), पूर्वी राजस्थान तथा मालवा के राजा शामिल थे। इस प्रकार धर्मपाल को सच्चे अर्थों में उत्तरपथस्वामिन कहा जा सकता है।
 
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मिहिरभोज : गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामंत ने 725 ई. में की थी। उसने राम के भाई लक्ष्मण को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को सूर्यवंश की शाखा सिद्ध किया। विद्वानों का मानना है कि इन गुर्जरों ने भारतवर्ष को लगभग 300 साल तक अरब-आक्रांताओं से सुरक्षित रखकर प्रतिहार (रक्षक) की भूमिका निभाई थी।
 
नागभट्ट प्रथम बड़ा वीर था। उसने सिंध की ओर से होने से अरबों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया, साथ ही दक्षिण के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के आक्रमणों का भी प्रतिरोध किया और अपनी स्वतंत्रता को कायम रखा। नागभट्ट के भतीजे का पुत्र वत्सराज इस वंश का प्रथम शासक था जिसने सम्राट की पदवी धारण की। वत्सराज के बाद उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय राजसिंहासन पर बैठा।
 
इस वंश का सबसे प्रतापी राजा भोज प्रथम था, जो कि मिहिरभोज के नाम से भी जाना जाता है और जो नागभट्ट द्वितीय का पौत्र था। भोज प्रथम ने (लगभग 836-86 ई.) 50 वर्ष तक शासन किया और गुर्जर साम्राज्य का विस्तार पूर्व में उत्तरी बंगाल से पश्चिम में सतलुज तक हो गया। अरब व्यापारी सुलेमान इसी राजा भोज के समय में भारत आया था।
 
मिहिरभोज के बाद अगला सम्राट महेन्द्रपाल था, फिर महेन्द्र का पुत्र महिपाल बैठा। उसके बाद भोज द्वितीय, विनायकपाल, महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय और विजयपाल ने जैसे-तैसे 1019 ई. तक अपने राज्य को कायम रखा। महमूद गजनवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था।
 
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कृष्ण द्वितीय : राष्ट्रकूट वंश के दो महाना शासक कृष्ण द्वितीय (978-915 ई.) और इन्द्र तृतीय (915-917 ई.) थे। दोनों के ही काल में महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में कला, संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा ही नहीं मिला बल्कि इनके शासन में आक्रमणकारियों से भी दक्षिण भारत सुरक्षित रहा। 
 
राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ 'दन्तिदुर्ग' से लगभग 736 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। इसके उपरान्त इन शासकों ने मान्यखेत, (आधुनिक मालखंड) को अपनी राजधानी बनाया। राष्ट्रकूटों ने 736 ई. से 973 ई. तक राज्य किया। इनके शासन की राजथानी नासिक हुआ करती थी।
 
राष्ट्रकूटों के समय का सबसे विख्यात मंदिर एलोरा का कैलाश मंदिर है। इसका निर्माण कृष्ण प्रथम के शासनकाल में किया गया था।
 
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राजेन्द्र प्रथम (1012-1044 ई.) : जब उत्तर भारत में मेहबूत गजनबी मंदिरों को लूटकर ध्वस्त कर रहा था तब चोल राजवंश के महान राजा राजराजा चोल का पुत्र राजेंद्र चोल गद्दी पर बैठा था। राजेंद्र चोल को भी राजाओं का राजा अर्थात राजराजा कहा जाता था। कहते हैं कि राजेन्द्र की दस लाख से अधिक थलसेना और उन्नत नौसेना (जो दक्षिणी चीन सागर तक जा पहुंची थी) का सामना करने से बचने के लिए महमूद कभी दक्षिण भारत नहीं आया।
 
1014 से 1044 तक बंगाल की खाड़ी से लेकर इंडोनेशिया समेत पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया तक एकक्षत्र राज करने वाले राजेन्द्र चोल के इतिहास को उत्तर भारत में नहीं पढ़ाया जाता। वामपंथियों और अंग्रेजों ने भारत का इतिहास उत्तर भारत को केंद्र में रखकर ही लिखा और उन्होंने आक्रमणकारिकयों और लूटेरों में ही महानता की बातें खोजी।
 
चोल साम्राज्य के काल में भव्य मंदिरों का निर्माण किया गया जिसमें सबसे बड़ा मंदिर तंजावुर का मंदिर है जिसे पेरियाकोइल यानि की बड़ा मंदिर कहते हैं। यह मंदिर चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने बनवाया था जो लगभग 10 वर्ष में बनकर तैयार हुआ था। राजेंद्र चोल का नाम अरुण मोल्य वर्मन था। चोल साम्राज्य 9वीं सदी से 13वीं सदी तक कायम रहा। चोल सम्राज्य का दक्षिण भारत में राज्य रहा है। विजयनगर सम्राज्य के राजाओं की तरह इस वंश के राजा बड़े ही पराक्रमी और कला प्रेमी थे। 
 
तमिलनाडु के तंजावुर या तंजोर शहर का यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है, जो आज भी विद्यमान है। यह मंदिर राजराजा राजेंद्र चोल की शक्ति और सम्राज्य को बयां करता है। राज राजा राजेंद्र के समय दक्षिण भारत का केंद्र उनका शासन ही था। इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। यह मंदिर भगवान शिव का है।
 
कला के इतिहस में राज राजा का सबसे बड़ा योगदान रहा है। उनके द्वारा बनवाई गई ठोस कांसे में ढली भगवान शिव की 60 प्रतिमाएं इसका उदाहण है। राजा ने मंदिर में कुछ स्वर्ण मुकुट, अन्य सोने की वस्तुएं और चांदी की कई वस्तुएं दान दी थी जिसका उल्लेख मंदिर की ‍लेखों में मिलता है। कला एवं संस्कृति का उत्थान-साहित्य, कला, स्थापत्य कला, शिक्षा आदि के क्षेत्र में राजेन्द्र देव के समय उल्लेखनीय विकास हुआ। वैदिक संस्कृति की शिक्षा के लिये प्रत्येक कुर्रम में श्रेष्ठ गुरुकुल उस काल में स्थापित किये गये। इनमें संस्कृत और तमिल में शिक्षा दी जाती थी। उत्कृष्ट साहित्य की रचना भी इन दोनों भाषाओं में उस समय हुई। स्थापत्य, मूर्ति कला और मंदिरों के निर्माण के लिये यह भारत का स्वर्ण-युग था। श्रीरंगम्, मदुरा, कुंभकोणम्, रामेश्‍वरम आदि प्रसिद्ध स्थलों पर राजेन्द्र देव ने भव्य मंदिर बनवाये। ये आज भी हैं और स्थापत्य कला के अद्वितीय उदाहरण माने जाते हैं। इनकी दीवारों, गोपुर, गर्भगृह आदि में उकेरी गई मूर्तियाँ भारतीय मूर्ति-कला की उत्कृष्टता का बखान करती हैं। 
 
राजेंद्र चोल के पास लकड़ी के बने भव्य जहाज थे और वे समुद्री रास्ते से व्यापार करते थे। वे बंगाल की खाड़ी के पार जाकर व्यापार करते थे। पहले बंगाल की खाड़ी को चोल झील कहते थे। अरब और चीन से भी उनके व्यापार संबंध थे। इन्हीं जहाजों में जाकर वे दूसरे द्वीप राज्यों पर आक्रमण भी करते थे। अन्दमान-निकोबार द्वीपों और मालदीव पर भी चोल-नौसेना का अधिपत्य हो गया था। राजेन्द्र चोल की इस विजय के शिलालेख आज भी मलेशिया, इंदोनेशिया और सुमात्रा में मिलते हैं। सन् 1025 में उसके सैनिक बेड़े ने गंगा सागर पार कर यव-द्वीप (जावा) और सुवर्ण द्वीप(सुमात्रा) पर अधिकार कर लिया था।
 
राजेंद्र ने कई राज्यों पर आक्रमण करके अपने अधिन कर लिया था। राजेन्द्र प्रथम ने पाण्ड्य चेर देशों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने श्रीलंका पर भी पूर्ण विजय प्राप्त की और एक युद्ध में श्रीलंका के राजा और रानी के मुकुटों और राज चिह्नों को अपने अधिकार में ले लिया। अगले पचास वर्षों तक श्रीलंका चोल शासकों के नियंत्रण से मुक्त न हो सका।
 
राजेन्द्र प्रथम का एक प्रमुख अभियान वह था जिसमें वह कलिंग होता हुआ बंगाल पहुंचा जहां उसकी सेना ने दो नरेशों को पराजित किया। इस अभियान का नेतृत्व 1022 ई. में एक चोल सेनाध्यक्ष ने किया और उसने वही मार्ग अपनाया जो महान विजेता समुद्रगुप्त ने अपनाया था।
 
देखा जाये तो राजेन्द्र चोल की विजय-यात्राओं के सामने सिकन्दर तथा नेपोलियन के सैनिक अभियान भी बौने थे। राज राजेन्द्र चोल ने बीस वर्षों के यशस्वी शासन के बाद अपने पुत्र राजाधिराज को एक विस्तृत और शक्तिशाली साम्राज्य का दायित्व सौंपा। जेन्द्र चोल निस्संदेह रूप से विश्‍व के महान् विजेताओं में से था। लेकिन उसकी महानता उसके शौर्य, पराक्रम और सामर्थ्य में ही नहीं थी, उसने अनेक जन-कल्याणकारी कार्य भी किये। उसके शासन काल में पूरे दक्षिणापथ की जनता सुखी और समृद्ध थी। हालैण्ड के चार सौ साल प्राचीन लिडेन विश्‍वविद्यालय के म्यूजियम में राजेन्द्र देव के सुशासन और विजय यात्राओं के दस्तावेज शिला-लेखों के रूप में उपलब्ध हैं। राजाधिराज राजेन्द्र के आज्ञापत्र 21 ताम्र-पत्रों में मौजूद हैं जिनका भार तीस किलोग्राम है। ये आज्ञापत्र संस्कृत और तमिल में हैं।
 
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राजा भोज (राज भोज- 1010 से 1053) : प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक व्यवस्थापक, उस वंश का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक राजा भोज था। ग्वालियर से मिले राजा भोज के स्तुति पत्र के अनुसार केदारनाथ मंदिर का राजा भोज ने 1076 से 1099 के बीच पुनर्निर्माण कराया था। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदिशंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं, तब भी यह मंदिर मौजूद था।
 
कुछ विद्वान मानते हैं कि महान राजा भोज (भोजदेव) का शासनकाल 1010 से 1053 तक रहा। राजा भोज ने अपने काल में कई मंदिर बनवाए। राजा भोज के नाम पर भोपाल के निकट भोजपुर बसा है। धार की भोजशाला का निर्माण भी उन्होंने कराया था। कहते हैं कि उन्होंने ही मध्यप्रदेश की वर्तमान राजधानी भोपाल को बसाया था जिसे पहले 'भोजपाल' कहा जाता था। इनके ही नाम पर भोज नाम से उपाधी देने का भी प्रचलन शुरू हुआ जो इनके ही जैसे महान कार्य करने वाले राजाओं की दी जाती थी।
 
भोज के निर्माण कार्य : मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक गौरव के जो स्मारक हमारे पास हैं, उनमें से अधिकांश राजा भोज की देन हैं, चाहे विश्वप्रसिद्ध भोजपुर मंदिर हो या विश्वभर के शिवभक्तों के श्रद्धा के केंद्र उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर, धार की भोजशाला हो या भोपाल का विशाल तालाब- ये सभी राजा भोज के सृजनशील व्यक्तित्व की देन हैं। उन्होंने जहां भोज नगरी (वर्तमान भोपाल) की स्थापना की वहीं धार, उज्जैन और विदिशा जैसी प्रसिद्ध नगरियों को नया स्वरूप दिया। उन्होंने केदारनाथ, रामेश्वरम, सोमनाथ, मुण्डीर आदि मंदिर भी बनवाए, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर हैं।
 
राजा भोज ने शिव मंदिरों के साथ ही सरस्वती मंदिरों का भी निर्माण किया। राजा भोज ने धार, मांडव तथा उज्जैन में 'सरस्वतीकण्ठभरण' नामक भवन बनवाए थे जिसमें धार में 'सरस्वती मंदिर' सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। एक अंग्रेज अधिकारी सीई लुआर्ड ने 1908 के गजट में धार के सरस्वती मंदिर का नाम 'भोजशाला' लिखा था। पहले इस मंदिर में मां वाग्देवी की मूर्ति होती थी। मुगलकाल में मंद‍िर परिसर में मस्जिद बना देने के कारण यह मूर्ति अब ब्रिटेन के म्यूजियम में रखी है।
 
राजा भोज का परिचय : परमारवंशीय राजाओं ने मालवा के एक नगर धार को अपनी राजधानी बनाकर 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। उनके ही वंश में हुए परमार वंश के सबसे महान अधिपति महाराजा भोज ने धार में 1000 ईसवीं से 1055 ईसवीं तक शासन किया।
 
महाराजा भोज से संबंधित 1010 से 1055 ई. तक के कई ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं। भोज के साम्राज्य के अंतर्गत मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उन्होंने उज्जैन की जगह अपनी नई राजधानी धार को बनाया।
 
ग्रंथ रचना : राजा भोज खुद एक विद्वान होने के साथ-साथ काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे और उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी थीं। मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे जिसमें धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र आदि प्रमुख हैं।
 
उन्होंने 'समरांगण सूत्रधार', 'सरस्वती कंठाभरण', 'सिद्वांत संग्रह', 'राजकार्तड', 'योग्यसूत्रवृत्ति', 'विद्या विनोद', 'युक्ति कल्पतरु', 'चारु चर्चा', 'आदित्य प्रताप सिद्धांत', 'आयुर्वेद सर्वस्व श्रृंगार प्रकाश', 'प्राकृत व्याकरण', 'कूर्मशतक', 'श्रृंगार मंजरी', 'भोजचम्पू', 'कृत्यकल्पतरु', 'तत्वप्रकाश', 'शब्दानुशासन', 'राज्मृडाड' आदि ग्रंथों की रचना की।
 
'भोज प्रबंधनम्' नाम से उनकी आत्मकथा है। हनुमानजी द्वारा रचित रामकथा के शिलालेख समुद्र से निकलवाकर धारा नगरी में उनकी पुनर्रचना करवाई, जो हनुमान्नाष्टक के रूप में विश्वविख्यात है। तत्पश्चात उन्होंने चम्पू रामायण की रचना की, जो अपने गद्यकाव्य के लिए विख्यात है।
 
आईन-ए-अकबरी में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार भोज की राजसभा में 500 विद्वान थे। इन विद्वानों में नौ (नौरत्न) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। महाराजा भोज ने अपने ग्रंथों में विमान बनाने की विधि का विस्तृत वर्णन किया है। इसी तरह उन्होंने नाव व बड़े जहाज बनाने की विधि का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने रोबोट तकनीक पर भी काम किया था।
 
मालवा के इस चक्रवर्ती, प्रतापी, काव्य और वास्तुशास्त्र में निपुण और विद्वान राजा, राजा भोज के जीवन और कार्यों पर विश्व की अनेक यूनिवर्सिटीज में शोध कार्य हो रहा है।
 
इसके अलवा गौतमी पुत्र शतकर्णी, यशवर्धन, नागभट्ट और बप्पा रावल, मिहिर भोज, देवपाल, अमोघवर्ष , इंद्र द्वितीय, चोल राजा, राजेंद्र चोल, पृथ्वीराज चौहान, विक्रमादित्य vi, हरिहर राय और बुक्का राय, राणा सांगा, अकबर, श्रीकृष्णदेववर्मन, महाराणा प्रताप, गुरुगोविंद सिंह, शिवाजी महाराज, पेशवा बाजीराव और बालाजी बाजीराव, महाराजा रणजीत सिंह आदि के शासन में भी जनता खुशहाल और निर्भिक रही।
 
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पृथ्वीराज चौहान (जन्म- 1149 - मृत्यु- 1192 ई.)  : हर्षवर्धन की मृत्यु के उपरांत जिन महान शक्तियों का उदय हुआ था, उनमें अधिकांश राजपूत वर्ग के अंतर्गत ही आते थे। एजेंट टोड ने 12वीं शताब्दी के उत्तर भारत के इतिहास को 'राजपूत काल' भी कहा है। कुछ इतिहासकारों ने प्राचीनकाल एवं मध्यकाल को 'संधि काल' भी कहा है। इस काल के महत्वपूर्ण राजपूत वंशों में राष्ट्रकूट वंश, चालुक्य वंश, चौहान वंश, चंदेल वंश, परमार वंश एवं गहड़वाल वंश आदि आते हैं। 
 
राजपूतों में महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान आदि राजपूतों ने देश की रक्षा मुस्लिम आक्रांताओं से की। उनमें पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। पृथ्वीराज चौहान अथवा 'पृथ्वीराज तृतीय' को 'राय पिथौरा' भी कहा जाता है। वे चौहान राजवंश के प्रसिद्ध राजा थे। वे तोमर वंश के राजा अनंग पाल का दौहित्र (बेटी का बेटा) थे और उसके बाद दिल्ली के राजा हुए। मध्यकाल में दिल्ली देश की राजधानी थी।
 
चौदह साल के वीर राजपूत पृथ्वीराज अजमेर की गद्दी पर बैठे। पृथ्वीराज ने अपने समय के विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी को कई बार पराजित किया। गौरी ने 18 बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था जिसमें 17 बार उसे पराजित होना पड़ा।
 
इतिहासकार मानते हैं क‍ि गौरी और पृथ्वीराज के बीच कम से कम दो भयंकर युद्ध हुए थे जिनमें प्रथम में पृथ्वीराज विजयी और दूसरे में पराजित हुए थे। ये दोनों युद्ध थानेश्वर के निकटवर्ती 'तराइन' या 'तरावड़ी' के मैदान में क्रमशः सं. 1247 और 1248 में हुए थे।
 
इसके बाद गुलाम, मुगल, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी, निजामी, बहमनी आदि मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों से भारत की रक्षा करने के लिए मराठा और सिख साम्राज्य का उदय हआ। मराठाओं में वीर शिवाजी और सिखों में महाराजा रणजीत सिंह और गुरु गोविंद सिंह प्रमुख थे।
 
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कुतुबद्दीन ऐबक (1206-10 ई.) : कुतुबद्दीन ऐबस से दिल्ली के तख्त पर इस्लामिक साम्राज्य की शुरुआत हुई। गुलाम वंश दिल्ली में कुतुबद्दीन ऐबक द्वारा 1206 ई. में स्थापित किया गया था। कुतुबद्दीन भारत पर आक्रमण करने वाले क्रूर शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी का तुर्क गुलाम था और 1192 ई. के 'तराइन के युद्ध' में विजय प्राप्त करने में गोरी की सहायता की थी। इस सहायता के एवज में उसे दिल्ली का तख्त मिला था। तख्त पर आसीन होकर उसने मुसलमानों की सल्तनत पश्चिम में गुजरात तथा पूर्व में बिहार और बंगाल तक विस्तृत कर ली थी।
 
दिल्ली के सिंहासन पर यह वंश 1206 ई. से 1290 ई. तक आरूढ़ रहा। कुतुब के बाद प्रमुख रूप से दिल्ली के तख्त पर इल्तुतमिश रजिया सुल्तान ने शासन किया। उनसके बाद दिल्ली के तख्‍त पर क्रमश: खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैय्यद वंश, लोदी वंश और अंत में मुगल वंश ने शासन किया। इस दौरान उत्तर भारत, बिहार और मध्य भारत में इनकी पकड़ मजबूत रही।
 
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‍फिरोजशाह बहमनी : फिरोजशाह बहमनी बहमनी वंश का आठवां सुल्तान था। दक्षिण भारत में मुसलमानों के दो शासक वंश थे। पहला बहमनी और दूसरा निजामी। मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम दिनों में दक्षिण में 'अमीरान-ए-सादाह' के विद्रोह के परिणामस्वरूप 1347 ई. में 'बहमनी साम्राज्य' की स्थापना हुई। बहमनी शसकों ने विजयनगर साम्राज्य को कड़ी चुनौती दी।
 
बहमनी शासकों में अलाउद्दीन बहमनशाह और फिरोजशाह बहमनी का नाम प्रमुख है। फिरोजशाह ने लगभग हर वर्ष पड़ोसी विजयनगर साम्राज्य पर हमले किए। अंतत: 1406 ई. में वह नगर में घुस गया राजा देवराय प्रथम (1406-12) को संधि करने के बदले में अपनी लड़की देने को मजबूर कर दिया था। फिरोजशाह के बाद उसका शासन तुर्क गुलामों के कब्जे में चला ‍गया।

निजामशाही : दक्षिण भारत में ही निजाम शाही वंश का शासन था। इनका शासन (1490 ईस्वी से 1565 ईस्वी तक रहा। इस दौरान हिन्दू जनता पर बेहद जुल्म ढाए गए। इस वंश में हुसैन निजामशाह प्रमुख थे।
 
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कृष्ण देवराय (1509-1529) : विजयनगर अर्थात जीत का शहर। कृष्ण देवराय के समय में विजयनगर सम्राज्य सैनिक दृष्टि से दक्षिण भारत का बहुत ही शक्तिशाली राज्य हो गया था। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में कृष्ण देवराय को भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बताया है। कृष्ण देवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे, जिन्हें 'अष्ट दिग्गज' कहा जाता था। कृष्ण देवराय को 'आंध्र भोज’ की उपाधि प्राप्त थी। राजा कृष्ण देवराय के दरबार का सबसे प्रमुख और बुद्धिमान दरबारी था तेनालीराम। असल में इसका नाम रामलिंगम था। तेनाली गांव का होने के कारण इसे तेनालीराम कहा जाता था।
 
तुंगभद्रा नदी के किनारे बसे हम्पी और डम्पी नामक शहर विजय नगर साम्राज्य की गौरव गाथा कहते हैं। हम्प‍ि कर्नाटक राज्य का हिस्सा है जो कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। राजा कृष्‍णदेव राय के समय में यह विजनगर सम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर था। कृष्णदेव राय एक यौद्ध होने के साथ-साथ कवि भी थे और घमंड से कोसो दूर रहते थे। कृष्णदेव राय ने जब सिंहासन संभाला तब उनकी उम्र महज 20 वर्ष थी और राज्य के खस्ता हाल थे। राज्य में अकाल पड़ा था। ऐसे में कृष्‍णदेव राय को उस समय अपने ही परिवार के अंदर भीतरघात का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने जल्द ही इन स्थितियों को बदल दिया। उन्होंने नए इलाकों पर जीत हासिल की और परंपरा के मुताबिक मंदिरों और गरीबों के लिए खूब दान दिया। कृष्णराय ने अपार सैनिक क्षमता, योग्य और कुलीनवर्ग के साथ एक राजसी साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने दरबारियों में इनाम और पद बांटे जाने की पुरानी परंपरा को तोड़ा और उन्होंने ऐसे यौद्धाओं को शामिल किया जिनका अपने शासक के साथ वर्ग या जाति का रिश्ता नहीं था। ये लोग खुद आगे बढ़ने वाले होते थे और अक्सर ये घुमक्कड़ होते थे। कृष्णदेव राज ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। उनके दरबारी जीवन का वर्णन उस काव्य में देखने को मिलता है जिसे उन्होंने खुद लिखा था जिसका नाम है 'अमुक्त माल्या।'
 
उस दौर में घोड़े भारत में दुर्लभ थे। पैदल, सेना, हाथी और तोप सभी उनके पास था। घोड़ों के व्यापार पर पहले अरबों और फिर पुर्तगालियों का नियंत्रण था। कृष्णदेवराय ने घोड़ों के व्यापार पर एकाधिपार करने की इच्छा से अरब से घोड़े मंगवाएं और उनका मुंह मांगा दाम दिया। कृष्णदेव राय के राज्य में मुसलमान सबसे ज्यादा सुरक्षित जीवन जीता था। जबकि कृष्णदेव राय पर मुस्लिम राजा सबसे ज्यादा आक्रमण करते थे। विजयनगर सम्राज्य के बारे में यह धारणा फैलाई गई की यह एक हिन्दू राज्य है जबकि कृष्णदेव राय के शासन में दोनों ही धर्म के लोगों को बराबर का दर्जा प्राप्त था। 
 
विजयनगर साम्राज्य का सच : विजयनगर साम्राज्य (लगभग 1350 ई. से 1565 ई.) की स्थापना राजा हरिहर ने की थी। मध्ययुग के इस शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना के बाद से ही इस पर लगातार आक्रमण हुए लेकिन इस साम्राज्य के राजाओं से इसका कड़ा जवाब दिया। यह साम्राज्य कभी दूसरों के अधीन नहीं रहा। इसकी राजधानी को कई बार मिट्टी में मिला दिया गया, लेकिन यह फिर खड़ा कर दिया गया। हम्पी के मंदिरों और महलों के खंडहरों के देखकर जाना जा सकता है कि यह कितना भव्य रहा होगा। इसे यूनेस्को ने विश्‍व धरोहर में शामिल किया है। दरअसल यह उस दौर का वैश्विस शहर था।
 
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना राजा हरिहर प्रथम ने 1336 में की थी। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना में हरिहर प्रथम को दो ब्राह्मण आचार्यों- माधव विद्याराय और उसके ख्यातिप्राप्त भाई वेदों के भाष्यकार 'सायण' से भी मदद मिली थी। हरिहर प्रथम को 'दो समुद्रों का अधिपति' कहा जाता था।
 
अनेगुंडी के स्थान पर इस साम्राज्य का प्रसिद्ध नगर विजयनगर बनाया गया था, जो राज्य की राजधानी थी। बादामी, उदयगिरि एवं गूटी में बेहद शक्तिशाली दुर्ग बनाए गए थे। हरिहर ने होयसल राज्य को अपने राज्य में मिलाकर कदम्ब एवं मदुरा पर विजय प्राप्त की थी। दक्षिण भारत की कृष्णा नदी की सहायक तुंगभद्रा नदी इस साम्राज्य की प्रमुख नदी थी। हरिहर के बाद बुक्का सम्राट बना। उसने तमिलनाडु का राज्य विजयनगर साम्राज्य में मिला लिया। कृष्णा नदी को विजयनगर तथा मुस्लिम बहमनी की सीमा मान ली गई। इस साम्राज्य में बौद्ध, जैन और हिन्दू खुद को मुस्लिम आक्रमणों से सुरक्षित मानते थे।
 
इस साम्राज्य की स्थापना का उद्देश्य दक्षिण भारतीयों के विरुद्ध होने वाले राजनीतिक तथा सांस्कृतिक आंदोलन के परिणामस्वरूप संगम पुत्र हरिहर एवं बुक्का द्वारा तुंगभद्रा नदी के उत्तरी तट पर स्थित अनेगुंडी दुर्ग के सम्मुख की गई। विजयनगर दुनिया के सबसे भव्य शहरों में से एक था।
 
इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 5 भाइयों वाले परिवार के 2 सदस्यों हरिहर और बुक्का ने की थी। वे वारंगल के ककातीयों के सामंत थे और बाद में आधुनिक कर्नाटक में काम्पिली राज्य में मंत्री बने थे। जब एक मुसलमान विद्रोही को शरण देने पर मुहम्मद तुगलक ने काम्पिली को रौंद डाला, तो इन दोनों भाइयों को भी बंदी बना लिया गया था। इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और तुगलक ने इन्हें वहीं विद्रोहियों को दबाने के लिए विमुक्त कर दिया। तब मदुराई के एक मुसलमान गवर्नर ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और मैसूर के होइसल और वारगंल के शासक भी स्वतंत्र होने की कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद ही हरिहर और बुक्का ने अपने नए स्वामी और धर्म को छोड़ दिया। उनके गुरु विद्यारण के प्रयत्न से उनकी शुद्धि हुई और उन्होंने विजयनगर में अपनी राजधानी स्थापित की।
 
1356 में बुक्का प्रथम ने सिंहासन संभाला। हरिहर द्वितीय ने 1377 ईस्वी में सिंहासन संभाला इसके बाद विरुपाक्ष प्रथम 1404 में गद्दी पर बैठे। इसी सन् में बुक्का द्वितीय ने सिंहासन संभाला। इसके बाद 1406 ईस्वी में देवराय प्रथम ने राज्य का कार्यभार संभाला। इसके बाद देवराय द्वितीय को 1422 ईस्वी में सिंहासन सौंपा गया। देवराय द्वितीय के बाद विजयराय द्वितीय ने 1446 में राज्य का कार्यभार संभाला, फिर 1447 में मल्लिकार्जुन और इसके बाद विरुपाक्ष द्वितीय ने 1465 से 1485 तक शासन किया। अंत में प्रौढ़ राय 1485 ने शासन किया।
 
तीन वंश : इसके बाद इस साम्राज्य में 3 वंशों का शासन चला- शाल्व वंश, तुलुव वंश और अरविंदु वंश।
 
शाल्व वंश : शाल्व वंश के राजा नरसिंह देवराय ने 1485 में सिंहासन संभाला, फिर 1491 में थिम्म भूपाल और फिर 1491 में ही नरसिंह राय द्वितीय ने संभालकर 1505 तक राज किया।
 
तुलुव वंश : इसके बाद तुलुव वंश के राजा नरस नायक ने 1491 से 1503 तक राज किया। फिर क्रमश: वीरनरसिंह राय (1503-1509), कृष्ण देवराय (1509-1529), अच्युत देवराय (1529-1542) और सदाशिव राय (1542-1570) ने शासन किया।
 
अरविदु वंश : तुलव के बाद अरविदु वंश के राजाओं ने राज किया। इनमें क्रमश: अलिय राम राय (1542-1565), तिरुमल देव राय (1565-1572), श्रीरंग प्रथम (1572-1586), वेंकट द्वितीय (1586-1614), श्रीरंग द्वितीय (1614-1614), रामदेव अरविदु (1617-1632), वेंकट तृतीय (1632-1642), श्रीरंग तृतीय (1642-1646) ने राज किया।
 
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महाराणा प्रताप (जन्म 9 मई, 1540 ई. मृत्यु 29 जनवरी, 1597 ई.) : महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी संवत् कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म महाराजा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कंवर के घर ई.स. 1540 में हुआ था। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था।
महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। मेवाड़ की शौर्य-भूमि धन्य है जहां वीरता और दृढ प्रण वाले प्रताप का जन्म हुआ। जिन्होंने इतिहास में अपना नाम अजर-अमर कर दिया। उन्होंने धर्म एवं स्वाधीनता के लिए अपना बलिदान दिया। 
 
सन् 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में करीब बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के अस्सी हजार की सेना का सामना किया। महाराणा प्रताप के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था, जिसका नाम 'चेतक' था। इस युद्ध में अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को शक्ति सिंह ने बचाया। यह युद्ध केवल एक दिन चला परंतु इसमें सत्रह हजार लोग मारे गए। 
 
मेवाड़ को जीतने के लिए अकबर ने भी सभी प्रयास किए लेकिन महाराणा प्रताप ने कभी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने कई वर्षों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप अकबर को तुर्क और विदेशी कहते थे।
 
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जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (1542-1605) : सिकंदर महान, अशोक महान, विक्रा‍मादित्य महान के बाद भारतीय सम्राट अकबर के नाम के बाद महान लगाया जाता है। अकबर और कृष्णदेव राय ने सम्राट अशोक के जीवन से सीख लेकर बहुत सारे कार्य किए। आशोक की तरह ही उन्होंने अपने दरबार में 9 रत्न रखे थे। अकबर के नवरत्नों में बिरबल और तानसेन के नाम प्रसिद्ध है। अकबर का शासनकाल 1556 से 1605 ई तक रहा। अकब तैमूर और चंगेज खां का वंशज था। वह तुर्की था।
 
अकबर ने एक नए धर्म की स्थापना की थी जिसे दिन-ए-इलाही कहा जाता है, लेकिन यह धर्म चला नहीं। अकबर के राज्य की सीमा में उत्तर और मध्य भारत के कुछ हिस्से थे। अकबर को एक ओर जहां महाराणा प्रताप से चुनौती मिली तो दूसरी ओर गोंडवाना की रानी दुर्गावती से। अकबर अन्य राजपूत घरानों की विधवाओं की तरह दुर्गावती को भी रनवासे की शोभा बनाना चाहता था। लेकिन दुर्गावती ने युद्ध में उसकी सेना का डटकर मुकाबला किया और उसकी सेना को परास्त कर दिया था। महारानी ने 16 वर्ष तक राज संभाला। 
 
अकबर के शासन के दौरान बंगाल में पठान थे जो राजस्थान में राजपूत, मालवा में मांडू का सुल्तान था तो कश्मीर, सिंध, बलूचिस्तान सभी दिल्ली की सत्ता से मुक्त थे। हालांकि अकबर में कई अभियानों में इन सभी पर विजय प्राप्त कर ली थी। अकबर के बाद जहांगीर और जहांगीर के बाद शाहजहां और शाहजहां के बाद औरंगजेब ने मुगल सम्राज्य की बागडोर संभाली। 
 
मुगल राजवंशो की शुरुआत बाबर (1526-1530) से हुई। बाबार के बाद हुमायूं (1530-1540 और 1555-1556), हुमायूं के बाद शेर शाह सूरी (1540-1545), सूरी के बाद अकबर (1556-1605), अकबर के बाद जहांगीर, जहांगीर के बाद शाहजहां, शाहजहां के बाद औरंगजेब ने सत्ता संभाली। सभी में मिलकर भारत में मुस्लिम धर्म और साम्राज्य का विस्तार किया। 
 
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छत्रपति शिवाजी (जन्म : 19 फरवरी 1627- मृत्यु : 3 अप्रैल 1680) : मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी राजे भोसले का जन्म मराठा परिवार में शिवनेरी महाराष्ट्र राज्य में हुआ। शिवाजी के पिता शाहजी और माता जीजाबाई थी। उन्होंने भारत में एक सार्वभौम स्वतंत्र शासन स्थापित करने का प्रयत्न स्वतंत्रता के अनन्य पुजारी वीर प्रवर शिवाजी ने भी किया था। इसीलिए उन्हें एक अग्रगण्य वीर एवं अमर स्वतंत्रता-सेनानी स्वीकार किया जाता है।
 
यूं तो शिवाजी पर मुस्लिम विरोधी होने का दोषारोपण किया जाता है, पर यह सत्य इसलिए नहीं कि उनकी सेना में तो अनेक मुस्लिम नायक एवं सेनानी थे तथा अनेक मुस्लिम सरदार और सूबेदारों जैसे लोग भी थे। 
 
वास्तव में शिवाजी का सारा संघर्ष उस कट्टरता और उद्दंडता के विरुद्ध था, जिसे औरंगजेब जैसे शासकों और उसकी छत्रछाया में पलने वाले लोगों ने अपना रखा था। नहीं तो वीर शिवाजी राष्ट्रीयता के जीवंत प्रतीक एवं परिचायक थे। इसी कारण निकट अतीत के राष्ट्रपुरुषों में महाराणा प्रताप के साथ-साथ इनकी भी गणना की जाती है।
 
माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली होते हुए भी गुण-स्वभाव और व्यवहार में वीरंगना नारी थीं। इसी कारण उन्होंने बालक शिवा का पालन-पोषण रामायण, महाभारत तथा अन्य भारतीय वीरात्माओं की उज्ज्वल कहानियां सुना और शिक्षा देकर किया था। दादा कोणदेव के संरक्षण में उन्हें सभी तरह की सामयिक युद्ध आदि विधाओं में भी निपुण बनाया था।
 
धर्म, संस्कृति और राजनीति की भी उचित शिक्षा दिलवाई थी। उस युग में परम संत रामदेव के संपर्क में आने से शिवाजी पूर्णतया राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यपरायण एवं कर्मठ योद्धा बन गए।
 
बचपन में शिवाजी अपनी आयु के बालक इकट्ठे कर उनके नेता बनकर युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे। युवावस्था में आते ही उनका खेल वास्तविक कर्म शत्रु बनकर शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके किले आदि भी जीतने लगे। 
 
जैसे ही शिवाजी ने पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर अपना अधिकार जमाया, वैसे ही उनके नाम और कर्म की सारे दक्षिण में धूम मच गई, यह खबर आग की तरह आगरा और दिल्ली तक जा पहुंची। अत्याचारी किस्म के यवन और उनके सहायक सभी शासक उनका नाम सुनकर ही मारे डर के बगलें झांकने लगे।
 
शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित बीजापुर के शासक आदिलशाह जब शिवाजी को बंदी न बना सके तो उन्होंने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार किया। पता चलने पर शिवाजी आग बबूला हो गए। उन्होंने नीति और साहस का सहारा लेकर छापामारी कर जल्द ही अपने पिता को इस कैद से आजाद कराया।
 
तब बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जीवित अथवा मुर्दा पकड़ लाने का आदेश देकर अपने मक्कार सेनापति अफजल खां को भेजा। उसने भाईचारे व सुलह का झूठा नाटक रचकर शिवाजी को अपनी बांहों के घेरे में लेकर मारना चाहा, पर समझदार शिवाजी के हाथ में छिपे बघनख का शिकार होकर वह स्वयं मारा गया।
 
इससे उसकी सेनाएं अपने सेनापति को मरा पाकर वहां से दुम दबाकर भाग गईं। उनकी इस वीरता के कारण ही उन्हें एक आदर्श एवं महान राष्ट्रपुरुष के रूप में स्वीकारा जाता है। इसी के चलते छत्रपति शिवाजी महाराज का सन्‌ 1680 ई. में तीन सप्ताह की बीमारी के बाद रायगढ़ में स्वर्गवास हो गया। 
 
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महाराजा रणजीत सिंह (जन्म: 13 नवम्बर, 1780, गुजरांवाला; मृत्यु: 27 जून, 1839, लाहौर) : सिख राज्य के संस्थापक महान सम्राट और शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के मन में साधु और संतों के लिए बहुत आदर था। उन्होंने मंदिरों की खूब दान दिया। उनके पिता का नाम महासिंह और माता का नाम ज़िन्दां रानी और संतान का नाम दिलीप सिंह था। 
 
रणजीत सिंह के शासन के अंतर्गत सिंध का कुछ क्षेत्र, पेशावर, कश्मीर, पंजाब और मुल्तान थे। रणजीत सिंह के मृत्यु तक अंग्रेजों ने पंजाब में घुसने की हिम्मत नहीं की लेकिन उनके अंतिम दिनों में अंग्रेजों ने पंजाब पर आक्रमण करना शुरू कर दिया। इसके परिणामस्परूप आंग्ला-सिख युद्ध हुआ।
 
सिखों से दो युद्ध हुए प्रथम युद्ध (1845-1846 ई.) और द्वितीय युद्ध (1848-1849 ई.)। सिखों की हार के बाद अंग्रेज और सिखों में संधि हो गई और प्रशासन अंग्रेजों के अधिन हो गया।
 
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टीपू सुल्तान (जन्म: 20 नवम्बर, 1750 ई. ; मृत्यु- 4 मई 1799 ई.) : टीपू सुल्तान को भारत इतिहास में अंग्रेजों से लड़ने वाला महान योद्धा माना जाता है। उसे 'शेर-ए-मैसूर' कहा गया है। अंग्रेजों ने मराणों, निजाम और सिखों के साम्राज्य को अपने अधिन कर लिया था। अब बस बचा था तो सिर्फ सुल्तान का राज्य। 
 
मैसूर के टीपू सुलतान ने अंग्रेज फौजों के खिलाफ रॉकेटों का उपयोग किया था। 1772 और 1799 में श्रीरंगपट्टनम में दो लड़ाइयां हुईं। इनमें टीपू के सिपाहियों ने 6 से लेकर 12 पौंड तक के रॉकेट फिरंगियों पर फेंके। टीपू ने अंग्रेजों को कई बार भगाया। मैसूर की तीसरी लड़ाई में भी जब अंग्रेज़ टीपू को नहीं हरा पाए तो उन्होंने मैसूर के इस शेर से 'मंगलोर की संधि' नाम से एक समझौता कर लिया।
 
'फूट डालो, शासन करो' की नीति चलाने वाले अंग्रेजों ने संधि करने के बाद टीपू से गद्दारी कर डाली। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर ज़बर्दस्त हमला किया और आख़िरकार 4 मई सन् 1799 ई. को मैसूर का शेर श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हो गया।