चल पड़ा है भारतीय 'हाथी'

गुरचरन दास| Last Updated: बुधवार, 9 जुलाई 2014 (15:28 IST)
औद्योगिक युग में हमारी कमजोरी रही विरासत ही ज्ञान युग में हमारी शक्ति बनकर उभरी है। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में हमारी सफलता का एक कारण ज्ञान के प्रति श्रद्धा की हमारी युगों पुरानी परंपरा हो सकती है। हम भारतीय ढाई हजार वर्षों से उपनिषदों की अमूर्त अवधारणाओं से दो-चार होते आए हैं। हमने शून्य का आविष्कार किया।


जिस प्रकार आध्यात्मिक विस्तार अदृश्य होता है, उसी प्रकार सायबर स्पेस भी दिखाई नहीं देता। अतः हमारा मूल सामर्थ्य अदृश्य रह सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी के रूप में हमने संभवतः वह क्षेत्र पा लिया है जिसमें हम औरों से आगे जा सकते हैं। यह क्षेत्र हमारे देश को बदलकर रख सकता है। इंटरनेट ने भी समान अवसरों का मैदान खोल दिया है और भारतीय उद्यमियों के लिए अनेक संभावनाएँ प्रस्तुत कर दी हैं।
इन दो वैश्विक धाराओं ने भविष्य में भारत की आर्थिक सफलता के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार कर दी हैं। इन्होंने तेजी से मध्यम वर्ग का विस्तार तो किया ही है, साथ ही गरीबी की सनातन समस्या से छुटकारा पाने की आस भी बँधाई है। 1980 से पहले, जब हमारी विकास दर 3.5 प्रतिशत थी, तब गरीबी से मुक्ति पाने में हमें सफलता न के बराबर मिल पाई थी।

गरीबी उन्मूलन के लिए गरीबी हटाने की योजनाएँ नहीं, विकास चाहिए होता है। जब आप विकास के साथ अच्छे स्कूल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करते हैं, तो यह गरीबों की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका होता है। यही कारण है कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्रालय देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। दुर्भाग्य से हमने ये मंत्रालय हमेशा निकृष्टतम नेताओं के हवाले किए हैं।

मैं भारत को शेर ('एशियाई शेरों' की भाँति) कहने के बजाए हाथी कहना पसंद करता हूँ, क्योंकि भारत को पहले लोकतंत्र मिला और फिर पूँजीवाद। भारत 1950 में लोकतंत्र बना, लेकिन उसने बाजार की ताकतों को 1991 में ही खुला छोड़ा। अमेरिका को छोड़कर दुनिया के शेष सभी देशों ने इससे ठीक उल्टा किया।

इस उल्टी धारा के मतलब ये हैं कि भारत न तो 'एशियाई शेरों' की गति से विकास करेगा और न ही उनकी गति से गरीबी व अशिक्षा को मिटा पाएगा। सच तो यह है कि लोकतंत्र हमारी गति को धीमा कर देता है। इसकी वजह से नीतियों में परिवर्तन करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि सभी अपनी-अपनी बात मनवाना चाहते हैं। यही कारण है कि हमारे सुधार इतनी धीमी गति से चल रहे हैं।
खैर, अब भारतरूपी हाथी आगे बढ़ने लगा है। हमारी अर्थव्यवस्था चीन के बाद विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। हमें इस बात को लेकर ज्यादा दुखी नहीं होना चाहिए कि चीन हमसे अधिक तेजी से विकास कर रहा है। जीवन भारत और चीन के बीच कोई दौड़ नहीं है। लोकतंत्र के साथ 7 प्रतिशत की दर से विकास करना लोकतंत्र के बिना 9 प्रतिशत की दर से विकास करने से बेहतर है।
कई भारतीय भी इसे ही पसंद करेंगे, भले ही इसकी वजह से हम चीन से 25 वर्ष पिछड़ जाएँ। यह लोकतंत्र की कीमत है और अनेक भारतीय इसे चुकाने के लिए तैयार हैं। आखिर हमने इस क्षण के लिए 3000 वर्ष तक इंतजार किया है, जब हम व्यापक समृद्धि पा सकेंगे और एक मुक्त, लोकतांत्रिक समाज में गरीबी पर विजय पा सकेंगे।
(लेखक प्रॉक्टर एंड गैंबल इंडिया के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक तथा वर्तमान में स्वतंत्र स्तंभकार हैं।)



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