अब गाँधी विचार की हत्या...

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इस वर्ष को हम सन्‌ 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 साल पूर्ण होने, हिन्द स्वराज के प्रकाशन तथा अफ्रीका में महात्मा गाँधी ने जो सत्याग्रह किया उसके शताब्दी वर्ष, भारत की आजादी के 60 वर्ष व भारत छोड़ो आंदोलन के 65 वर्ष पूर्ण होने वाले वर्ष के रूप में समारोहपूर्वक मना रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी गाँधीजी का जन्मदिन यानी 2 अक्टूबर विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया। इसी के साथ 30 जनवरी 2008 को गाँधीजी की हत्या के साठ साल पूरे हो गया। यह दिन शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। परंतु यह देश इसे गाँधीजी की शहादत नहीं बल्कि हत्या का दिन मानकर समारोहपूर्वक मनाएगा?

शायद हमें सभी कुछ समारोह के रूप में मनाने की आदत सी हो गई है। वास्तव में यह दिन प्रायश्चित का दिन है। गाँधीजी की हत्या को अँग्रेजी अखबारों ने 'असेसिनेशन' की संज्ञा दी थी। इसका मतलब है कि विश्वासघात से किया गया खून। एक अन्य अखबार ने लिखा था कि गलतियाँ हमने की और सजा गाँधी को दी गई। दुर्भाग्य से आज भी उस हत्या को 'वध' कहा जाता है। मैंने जब इस शब्द पर आपत्ति की तो मुझे शब्दकोश दिखाया गया जिसमें खून, हत्या और वध को समानार्थी शब्द माना गया था। वस्तुतः ये समानधर्मी शब्द नहीं हैं।

हम भूल जाते हैं कि शब्दकोश में प्रतिशब्द होते हैं, शब्द का अर्थ नहीं होता। शब्द का अर्थ तो सामाजिक जीवन में वह शब्द जिस भावना से उपयोग में लाया जाता है उसमें निहित होता है। इस अर्थ में वध शब्द राक्षस को मारने के लिए उपयोग में लाया जाता है और यह धर्मकृत्य माना जाता है। साथ ही उस कृत्य को करने वाला धर्मात्मा होता है। यह कहना कि प्रभु रामचंद्र ने रावण की हत्या की थी, सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं होगा, बल्कि उसके खिलाफ आंदोलन खड़ा होगा। लेकिन आज गाँधी की हत्या के लिए वध शब्द का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। मानो वह धर्मकृत्य ही था और गोडसे धर्मात्मा था।

इस 30 जनवरी को अन्य शहीदों के साथ गाँधी को दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। शासकीय आदेशानुसार कर्मकांड की तरह समाधि पर निरपेक्ष, निर्विकार और निर्विचार भावना से फूल चढ़ाए जाएँगे।
  शायद हमें सभी कुछ समारोह के रूप में मनाने की आदत सी हो गई है। वास्तव में यह दिन प्रायश्चित का दिन है। गाँधीजी की हत्या को अँग्रेजी अखबारों ने 'असेसिनेशन' की संज्ञा दी थी। इसका मतलब है कि विश्वासघात से किया गया खून।      
जिसके शव (गाँधीजी) पर भारत की राजधानी में राजघाट पर समाधि बनी है उसके बारे में हिन्दी के एक कवि ने कहा है-

यह शव जिस पर मैंने/
फूल चढ़ाएँ हैं/
वह कत्ल भी मेरे ही/
इशारे पर हुआ है।

अब तो गाँधी की तस्वीर नोटों पर भी छाप दी गई है और उन नोटों पर उनकी उस छवि का दर्शन ही 'गाँधी दर्शन' कहलाता है। गाँधी की प्रतिमा सिर्फ दफ्तर की पिछली दीवार पर लगी होती है ताकि भ्रष्टाचार के लिए गाँधी दर्शन कर वे हीनभावना से भी मुक्ति पा सकें। आज गाँधी छाप नोट सिर्फ विनियोग का साधन नहीं है, उससे तो इंसान तथा वोटर को भी खरीदा जा रहा है और खून करने के लिए सुपारी भी दी और ली जाती है।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था कि 'खून सेंसरशिप का अंतिम और सबसे अच्छा तरीका है।' अब तो लोगों का खूनखराबे और हिंसा पर विश्वास बढ़ रहा है। इसलिए यह स्पष्ट है कि गोडसे एक व्यक्ति नहीं है, वह एक प्रवृत्ति है। गाँधीजी की हत्या होने के पहले भी उनकी हत्या करने के तीन से अधिक प्रयत्न किए गए थे और आखिरकार प्रार्थना स्थल की ओर जाते समय उन्हें नमस्कार करने का बहाना कर छलकपट से उन पर गोलियाँ चलाई गईं और उनकी हत्या कर दी गई।

गाँधीजी ने अंत तक पाकिस्तान का तथा पाकिस्तानी वृत्ति का विरोध किया था। फिर भी धर्मांध ताकतों ने उन्हें ही गुनाहगार ठहराया। पाकिस्तान बनने के बाद भी गाँधीजी ने स्पष्ट किया था कि वे नहीं मानते कि दो धर्म के लोग एक साथ नहीं रह सकते। लेकिन उनकी हत्या के बाद तो हमने यह भी मान लिया है कि अब तो दो भाषाएँ बोलने वाले भी इस देश में एक साथ नहीं रह सकते। इसलिए भाषा के आधार पर प्रदेशों की पुनर्रचना की गई। इस तरह भारत के और भी टुकड़े हुए। उत्तरांचल, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश भी बने। अब तो दक्षिण और उत्तर भारत भी साथ नहीं रहना चाहते।

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- चन्द्रशेखर धर्माधिकार
(लेखक प्रसिद्ध न्यायविद् एवं मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं।)


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