कुछ टूटी हुई, कुछ बिखरी हुई

ब्‍लॉग-चर्चा में आज इरफान का ब्‍लॉग – टूटी हुई बिखरी हुई

WD
आज ब्‍लॉग-चर्चा में हम जिस ब्लॉग को लेकर हाज़िर हुए हैं, वह कई मायनों में अब तक यहाँ चर्चित ब्लॉगों से भिन्‍न है। सबसे पहली बात तो यह कि ‘टूटी हुई बिखरी हुनाम का यह ब्लॉग सबसे कम उम्र का ब्लॉग है। इसे चलाते हैं - स्वतंत्र पत्रकार और मीडियाकर्मी इरफान। मई, 2007 में मोहल्‍ला फेम ब्‍लॉगर अविनाश की मदद से इरफान का ब्‍लॉग की दुनिया में पदार्पण हुआ और फिर प्रकाश में आया - ‘टूटी हुई, बिखरी हु। नाम पर न जाएँ, नाम भले टूटा-फूटा हो, ब्‍लॉग फिलहाल एकदम दुरुस्‍त है। इसीलिए आज इस कॉलम में आप सबसे रू-ब-रू है।

ब्‍लॉग का नाम जितना अजीब है, यूआरएल उससे भी ज्‍यादा पेचीदा। ब्‍लॉगस्‍पॉट के पहले अँग्रेजी के 21 अक्षर टाइप करने में ब्‍लॉग पढ़ने वाला खुद ही ‘टूटी हुई, बिखरी हुहो जाता है। लेकिन एक बार ब्‍लॉग खुले तो फिर ऐसी जान लौटती है कि घंटों उस ब्‍लॉग पर कब बीते, पता ही नहीं चलता।

इरफान इसकी सफाई कुछ यूँ देते हैं, ‘मुझे तब यह नहीं मालूम था कि ब्लॉग टाइटिल और यूआरएल अलग-अलग भी हो सकते हैं। ‘टूटी हुई बिखरी हु’ हिंदी के प्रख्यात कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह की एक कविता है। शमशेर की स्मृति को समर्पित यह ब्लॉग कविताओं का नहीं है। यह अलग बात है कि कविताएँ भी यहाँ हैं। ख़ुद शमशेर की उपरोक्त पूरी कविता अपने अँग्रेज़ी अनुवाद के साथ यहाँ एक स्थाई उपस्थिति बनाए हुए है
  आज ब्‍लॉग-चर्चा में हम जिस ब्लॉग को लेकर हाज़िर हुए हैं, वह कई मायनों में अबतक यहाँ चर्चित ब्लॉगों से भिन्‍न है। सबसे पहली बात तो यह कि ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ नाम का यह ब्लॉग सबसे कम उम्र का ब्लॉग है। इसे स्वतंत्र पत्रकार और मीडियाकर्मी इरफान चलाते हैं।      


इरफान दिल्ली में रहते हैं। उनका परिचय उनके ब्लॉग पर कुछ इन शब्‍दों में पढा जा सकता है, ‘मैं मिर्ज़ापुर के घुरमा मारकुंडी में पैदा हुआ। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ा और समकालीन जनमत के साथ पटना होता हुआ दिल्ली पहुँचा। यहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता, लेखन और ऑडियो-विज़ुअल प्रोडक्शन्स में लगा हुआ हूँ’ इरफान को आश्चर्य होता है कि उन्होंने दोस्तों से ज़्यादा दुश्मन बनाए हैं और अपने व्यवहार में हमेशा एक कटुता और मुँहफटपन लिए रहते हैं, फिर भी उनमें और उनके ब्लॉग में लोगों की जिज्ञासा क्यों है, जबकि उनके अनुसार उनके ब्लॉग में ऐसा कुछ है भी नहीं, जिसका इंतज़ार लोगों को हो।

वे कहते हैं, ‘मैंने तो मज़े-मज़े में इसे शुरू किया है और आइडिया यही है कि मैं अपनी बरसों से समेटी-सँजोई चीज़ों का एक व्यवस्थित रैक बनाऊँ। इसी क्रम में मैंने शुरुआती पोस्टें जारी कीं, जिनमें किसी की दिलचस्पी क्यों होती।

WD
‘पुराने ईपी और एलपी के कवर्स, गुज़रे ज़माने के ब्रॉडकास्टर्स, फिल्मी लोग और साहित्यकारों की तस्वीरें.... मुझे जो कुछ भी दबा-छिपा मिल जाता, उसे मैं सँजोने लगा। सच पूछिए तो ‘टूटी हुई बिखरी हुपूरी तरह किसी भी एक विधा या फोकस का ब्लॉग नहीं है। वो ये भी है और वो भी है या कहें ये भी नहीं है और वो भी नहीं

इरफान आगे कहते हैं, ‘बहरहाल धीरे-धीरे मैंने कुछ लिखने की कोशिश की, जिसका बहुत ख़राब रिस्पांस देखकर लगा कि यहाँ समझदारी की बातें करना बेकार है। उसके बाद से मैं अब ज़्यादातर साउंड पोस्ट करने का काम करता हूँ। इसमें भी लालच यही रहता है कि जो कुछ मुझे सुनने के लायक लगता है, उसे दोस्तों के साथ शेयर करूँ। वैसे भी मेरा मौजूदा पेशा मुझे इस ओर उद्धत करता है कि खुद सुनने के अलावा मैं सुनाऊँ भी।’

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इरफान रेडियो जॉकी भी हैं। वे कहते हैं, ‘सुनाने का एक बडा फोरम होने के बावजूद मेरे सामने कुछ बंदिशें भी हैं और एक ख़ास तरह का फिल्मी म्यूज़िक बजाने के अलावा मेरे सामने कोई रास्ता भी नहीं है। ऐसे में ब्लॉग ने मुझे यह अवसर दिया है कि मैं इस तरह का संगीत भी लोगों तक पहुँचा सकूँ। आलोक धन्‍वा, नरेश सक्सेना, उदय प्रकाश, इब्बार रब्बी, विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल और चंद्रकांत देवताले जैसे हिंदी के कवियों की उन्हीं के स्वर में कविताएँ हों, आम लोगों की बोलती गाती आवाज़ें हों, देवकीनंदन पांडे और ज़िया मोहिउद्दीन के नायाब पाठ हों या मेरी पसंद के गीत... इन सब चीज़ों के लिए एफएम रेडियो में स्थान नहीं है। मैं इस तरह ब्लॉग के माध्यम से एक वैकल्पिक रेडियो चलाने का भी आंशिक सुख लेता हूँ।’



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