पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र की दुर्गति

गुरचरन दास|
भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र।


हमने पिछले दिनों एक और गणतंत्र दिवस मनाया, लेकिन कई भारतीयों के लिए इसमें उत्साह की कोई बात नहीं थी क्योंकि सरकार को लकवा मार जाने से वे हताश हैं। यह अब तक की सबसे कमजोर सरकारों में से एक है और कई लोग दृढ़ एवं निर्णयात्मक नेतृत्व की कामना कर रहे हैं।

प्रसिद्ध सुधारकों के नेतृत्व वाली इस सरकार ने लगभग कोई नया सुधार लागू नहीं किया है और भारत-अमेरिका परमाणु करार के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता जारी है। यह भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण करारों में से एक है, जो हमारे देश को विश्व की बड़ी ताकतों की श्रेणी में ला सकता है और पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंधों को बदलकर रख सकता है। जब से यह सरकार सत्ता में आई है, तब से वाम दलों के व्यवहार को लेकर मध्यम वर्ग में रोष है। गठबंधन प्रणाली में बहुत बड़ी गड़बड़ यह है कि अल्पमत वाला एक छोटा मगर वाचाल वर्ग हमारे राष्ट्रीय हित को बंधक बनाकर रख सकता है।
हमारी हताशा की जड़ इतिहास के एक अदद हादसे में निहित है। भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र। अर्थात पहले समृद्धि की निर्माण किया गया और फिर इस बात पर बहस छिड़ी कि इस समृद्धि का वितरण कैसे किया जाए।
इस ऐतिहासिक हादसे का मतलब यह है कि भारत का भविष्य अकेले पूँजीवाद की देन नहीं होगा। वह जाति, धर्म तथा गाँव की रूढ़िवादी ताकतों, देश के बौद्धिक जीवन पर 60 साल से हावी वामपंथी एवं समाजवादी ताकतों और वैश्विक पूँजीवाद की नई ताकतों के बीच रोजाना के संवाद से उभरकर सामने आएगा।

लोकतंत्र की इन लाख बहसों, हितों की बहुलता और हमारे लोगों के कलहप्रिय व्यवहार को देखते हुए यह आर्थिक सुधारों की रफ्तार धीमी ही रहेगी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत चीन या एशियाई शेरों की रफ्तार से विकास नहीं करेगा और न ही उनकी तरह शीघ्रता से गरीबी व अशिक्षा को दूर कर पाएगा।
अधिकांश देशों में आधुनिक लोकतंत्र का प्रवेश पूँजीवाद के बाद ही हुआ। ये सब देश औद्योगिक क्रांति से गुजर चुके थे, जिसने संपन्नाता का आधार बना दिया था। इसके बाद ही यूरोप में उन्नीसवीं सदी में क्रमिक रूप से मताधिकार दिया जाने लगा। इसके बाद बड़े राजनीतिक दलों का विकास हुआ। तत्पश्चात लोकतंत्र ने पूँजीवादी संस्थाओं को प्रभावित करना शुरू किया।
वामपंथी दलों और मजदूर यूनियनों ने धन-संपत्ति का पुनर्वितरण करने व राज सहायताएँ देने की कोशिश भी की और इससे पश्चिमी देशों में भी उत्पादकता वृद्धि में कमी आई। इस प्रक्रिया की परिणति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी विश्व में 'जन-कल्याणकारी राज्य' के रूप में हुई, जिसमें आम लोगों को बेरोजगारी बीमा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिला।

इसके विपरीत भारत में हमें औद्योगिक क्रांति लाने का मौका मिलता, इससे पहले ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना कर दी गई। रोटी बनाने से पहले ही हम इस बहस में उलझ गए कि रोटियों का वितरण कैसे किया जाए। इससे पहले कि हम भोजन, उर्वरक, बिजली आदि पर सबसिडियाँ देने में समर्थ बनते, हम इन पर सबसिडियाँ देने लग गए। हमारे उद्योग उत्पादन में कुशल बन पाते, इससे पहले ही हमने उन पर विस्तृत नियंत्रण बैठा दिए।
'कल्याण' उत्पन्न करने वाले रोजगार सृजित होने से पहले ही हम लोगों का 'कल्याण' करने के विषय में सोचने लगे। नतीजा रहा उद्यमशीलता का गला घोंटना, धीमा विकास तथा खोए हुए अवसर। लायसेंस राज ने एक विशाल काली अर्थव्यवस्था का निर्माण किया।

चूँकि हमारे पास गरीबों तक सबसिडियों का लाभ पहुँचाने के लिए संस्थागत ढाँचा था ही नहीं, अतः तमाम सबसिडियाँ रास्ते में ही डकार ली गईं और गरीबों तक पहुँची ही नहीं। यह थी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवाद की असफलता। जब तक हम सार्वजनिक रूप से इस असफलता को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम एक परिपक्व राष्ट्र नहीं बन सकते। हम चोरी-छुपे आर्थिक सुधार लाते रहेंगे और एक झूठ को जीते रहेंगे।
यह है पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र लाने की कीमत, बल्कि बहुत अधिक लोकतंत्र और अपर्याप्त पूँजीवाद लाने की कीमत, जो हम चुका रहे हैं। इस समाजवादी मॉडल ने अंततः हमें 1991 में दिवालिएपन के कगार पर ला दिया और हम सुधार लागू करने पर विवश हुए। यह उस समय हुआ, जब पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का पतन हुआ और सोवियत संघ का अवसान हो गया। तब जाकर हम समझ सके कि किसी राष्ट्र को धन-संपत्ति का वितरण करने से पहले उसका निर्माण कर लेना चाहिए।
आर्थिक सुधारों की बदौलत अंततः हम संपन्नाता का निर्माण कर रहे हैं। भारतीयों की उद्यमशीलता पर लगी बेड़ियाँ खोल दी गई हैं और हमारे निजी क्षेत्र ने भारत को विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना दिया है।

लेकिन राजनीतिज्ञों ने इससे कोई सबक नहीं लिया है। चूँकि भारत में गरीब बहुत बड़ी संख्या में हैं, अतः राज्य सरकारों को दिवालिया बना देने वाले वादे करने का प्रलोभन हमेशा बना रहता है। यदि कोई राजनेता दो रुपए किलो में चावल उपलब्ध कराने का वादा करे, जबकि बाजार में वह पाँच रुपए किलो हो, तो वह चुनाव जीत जाता है।
एनटी रामाराव ने 1994 में आंध्रप्रदेश में यही किया। वे चुनाव जीत गए, मुख्यमंत्री बने और राज्य को दिवालिया बना बैठे। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल ने 1997 में किसानों को मुफ्त बिजली और पानी दिया। उन्होंने अपना चुनावी वादा निभाया लेकिन बारह महीनों में पंजाब की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई और सरकारी सेवकों को वेतन देने के लिए भी पैसे नहीं रह गए।
जो सबक हम सब सीख चुके हैं, वह राजनेता नहीं सीख पाए हैं। वे मतदाताओं को मुफ्त का माल तथा सेवाएँ बाँटने की आपस में होड़ लगाते हैं। तब फिर स्कूल व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने के लिए पैसा कहाँ से आएगा?

इन सब बातों को देखते हुए भारत कभी आर्थिक शेर नहीं बन पाएगा। वह तो हाथी है। लेकिन यह हाथी 8 प्रतिशत की सम्मानजनक दर से आगे बढ़ने लगा है। वह कभी भी गति नहीं पकड़ पाएगा लेकिन दूरी तय अवश्य करेगा।
पूँजीवाद और लोकतंत्र की उलटी गंगा बहने के ऐतिहासिक हादसे को देखते हुए लगता है कि शायद चीन के मुकाबले भारत अधिक स्थिर, शांतिपूर्वक एवं परस्पर सहमतिपूर्वक भविष्य में पदार्पण करेगा। वह बिना तैयारी के पूँजीवादी समाज बनाने के घातक दुष्प्रभावों से भी बच जाएगा, जो कि रूस भुगत रहा है।

धीमी गति के विकास के बावजूद इस बात की संभावना अधिक है कि ग्लोबल संस्कृति के आक्रमण के बीच भारत अपनी जीवनशैली एवं विविधता, सहिष्णुता तथा आध्यात्मिकता को बचाए रखने में सफल होगा। यदि ऐसा होता है, तो इसे शायद एक बुद्धिमान हाथी कहा जा सकता है। (लेखक प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के पूर्व सीईओ तथा 'मुक्त भारत' के लेखक हैं।)



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