एक चित्रकार की निगाह से दुनिया देखने की कोशिश

इस बार सीरज सक्सेना का ब्लॉग ' इधर से देखो'

रवींद्र व्यास|
अन्य लेख 'कालीघाट' में बलि के तहत वे कोलकाता की सुंदर स्त्रियों, ट्रामों का जिक्र करने के साथ ही काली के मंदिर में बलि के दर्दनाक किस्से दर्ज करते हैं कि कैसे बकरे काटे जा रहे हैं, धड़ और गर्दन अलग हो रहे हैं, कैसे उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर प्रसाद बनाने के लिए पकने के लिए भेजा जा रहा है। वे टिप्पणी करते हैं कि क्या धर्म है, क्या उसके कर्मकांड। और अंत में वे टिप्पणी करते हैं कि- देर तक बकरे की गर्दन, धड़ और काली की जीभ और आँखें- मेरी आँखों के सामने घूमती रहीं।

क्रीमची के मंदिर औऱ घर को लेकर भी उनकी यादें एक चित्रकार की यादें ही हैं। वे वहाँ की प्रकृति, नदी, पत्थर, मंदिरों की बनावट, दीवारों का रंग औऱ उन पर बने अलंकार को याद करते हैं औऱ कहते हैं कि हो सकता है इसका असर उनके चित्रों में कभी दिखाई दे। शनि की माया, भय और प्रीति तथा मिट्टी के सहचर जैसे लेख भी वस्तुतः यात्रा संस्मरण ही हैं।
लेखों के अलावा उन्होंने अपनी कुछ कविताएँ भी पोस्ट की हैं। वृक्ष औऱ तालाब, बत्तख औऱ बच्चा, बाल कितने स्याह, केंचुली, प्रेम, हरा सर्प, पूर्वज, मुक्ति, घर लौटते पक्षी, दयालु माता का मंदिर औऱ जनगढ़सिंह श्याम का गाँव शीर्षक से कविताएँ हैं। इनमें भी प्रकृति औऱ प्रेम का ही स्वर है। भाषा चित्रमयी है। बिम्ब औऱ प्रतीक भी प्रकृति के ही हैं। इन कविताओं में कहीं-कहीं अशोक वाजपेयी की कविताओं की गूँज को भी सुना जा सकता है। एक कविता बहुत सुंदर औऱ मार्मिक है जिसका शीर्षक है मिश्र कल्याण। मैं उसे पूरी यहाँ दे रहा हूँ। पढ़िए और मजा लीजिए।
नर्मदा से कुछ नीर
नौका से कुछ डगमगाहट
धुएँ से कुछ फकीरी
अतीत से कुछ
पीड़ा
देवताओं से
कुछ हसीं
समय से कुछ एकांत
जीवन से कुछ अवकाश
हाथों से कुछ रस
स्त्री से कुछ लय वे अभिनय माँ से कुछ धैर्य
खुद से कुछ जिद
कली से कुछ मादकता
पैरों से कुछ भ्रमण
पिता के कुछ स्वर
भाषा से कुछ शब्द
अर्थ से कुछ मृत्यु
आदि मिश्र कर
वे गाते हैं
स्वयं का,
ईश्वर काकल्याण करते हैं।

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