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पवित्र यूखारिस्त

ख्रीस्तयाग-पवित्र परमप्रसाद

पवित्र यूखारिस्त ख्रीस्तयाग
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के पुत्र समेत 18 लोगों की हत्या के मामले में फरार कट्टर माओवादी अनिल राम को बिहार की नवादा पुलिस ने गिरफ्तार करने के बाद झारखंड पुलिस को सौंप दिया है।

नवादा के पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार ने बुधवार को बताया कि सूचना के आधार पर पुलिस ने प्रतिबंधित भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के स्वयंभू एरिया कमांडर अनिल राम को जिले के गोविंदपुर थाना के उसके पैतृक गाँव गुड़मुड़िया से दो दिन पूर्व देर रात गिरफ्तार किया।

उन्होंने बताया कि गिरफ्तार उग्रवादी झारखंड के गिरिडीह जिले के डेबरी थाना के तीलखारी गाँव में मरांडी के पुत्र समेत 18 लोगों की हत्या का नामजद अभियुक्त था और झारखंड सरकार ने उसकी गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित कर रखा था।

कुमार ने बताया कि अनिल प्रतिबंधित संगठन का स्वयंभू एरिया कमांडर है और वह झारखंड में उग्रवादी घटनाओं को अंजाम देने के बाद अपने पैतृक गाँव गुड़मुड़िया में आकर रहता था। गिरफ्तार उग्रवादी से गहन पूछताछ के बाद उसे कल रात झारखंड पुलिस के हवाले कर दिया गया।

उल्लेखनीय है 27 अक्टूबर को माओवादी उग्रवादियों ने धावा बोलकर मरांडी के पुत्र समेत 18 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

मिस्सा-बलिदान हमारे प्रभु के अंतिम ब्यालू की तरह है। खीस्तयाग में पुरोहित हमारे प्रभु को बेदी पर ले आते हैं... उसे हमारे पापों के लिए ईश्वर को चढ़ाते हैं और उसे पवित्र परमप्रसाद में लोगों को देते हैं।

मिस्सा-बलिदान को अच्छी तरह से समझने के लिए हमें अंतिम ब्यालू की याद करनी होगी। अंतिम ब्यालू के समय ख्रीस्त, ईश्वर के पुत्र, अपने प्रेरितों के साथ हैं। वह हमें स्वयं में, अपनी शिक्षा और अच्छाई के उदाहरण द्वारा संयुक्त करने आया था। उसका सार्वजनिक कार्य समाप्त हो चुका था। उसने अपने बहुत से आश्चर्यजनक कार्यों से यह सिद्ध कर दिया कि वह ईश्वर का पुत्र था और जब वे भोजन करने बैठे तो येसु ने कहा, 'दुःख भोगने के पहले, मेरी यह हार्दिक इच्छा थी कि मैं तुम्हारे साथ यह पास्क भोज खाऊँ।' हमारे पापों के लिए दुःख उठाने और मरने के एक रात पहले यह सब घटित हुआ।

और उसने कार्य जारी रखा, क्योंकि वह हमें खाने की मेज पर अपना शरीर और रक्त देना चाह रहा था... और आने वाले समस्त मिस्सा बलिदानों में... जिससे कि वह हममें और हम उसमें सदा के लिए संयुक्त हो जाएँ। ख्रीस्त ने वहाँ और उसी वक्त रोटी और दाखरस को अपने शरीर और रक्त में बदल दिया और अपने प्रेरितों को भी ऐसा ही करने की शक्ति दी।

यहाँ, जैसे बाइबिल में है, 'और रोटी लेकर उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया और अपने शिष्यों को देते हुए कहा, 'यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जाता है।' उसी तरह उसने कटोरा अपने हाथों में लिया, ईश्वर को धन्यवाद देने के बाद अपने शिष्यों को देते हुए कहा, 'तुम सब इसमें से पीयो, क्योंकि यह मेरा रक्त है, नए व्यवस्थान का रक्त, मेरी स्मृति में यह किया करो।'

स्मरण रखो, ख्रीस्त ने यह नहीं कहा, ढोंग करो या कल्पना करो कि यह मेरा शरीर और रक्त होगा, न ही उसने कहा, 'यह मेरे शरीर या रक्त का प्रतीक है।'

ख्रीस्त ने सुस्पष्ट कहा, 'यह मेरा शरीर है... यह मेरा रक्त है।'

बाद में, ख्रीस्त ने रोटी और दाखरस को अपने शरीर और रक्त में बदल दिया, तब पास्क टेबल पर रोटी और दाखरस नहीं रहा... वह वास्तव में... उसका शरीर और रक्त था... और यह परिवर्तन तत्व परिवर्तन कहलाता है।

ख्रीस्त ने अंतिम ब्यालू के समय प्रथम ख्रीस्तयाग चढ़ाया और हमें महानतम पूजा दी, जिसे सर्वशक्तिमान ईश्वर को चढ़ा सकें।

इसके साथ ही उसने अपने प्रेरितों को भी ऐसा ही करने की शक्ति दी, जब उसने कहा, 'मेरी स्मृति में यह किया करो।' (लूकस 22:19)

कलीसिया के धर्माध्यक्ष और पुरोहित उनके उत्तराधिकारी हैं। केवल उन्हें ही पुरोहिताई संस्कार के द्वारा यह शक्ति प्राप्त होती है।

ईश्वर का पुत्र येसु ख्रीस्त ही पिता ईश्वर को पूर्ण धन्यवाद और अनन्त पश्चाताप का बलिदान चढ़ा सकता है, क्योंकि वही सच्चा ईश्वर, सच्चा मनुष्य, पूर्ण पुरोहित और पूर्ण बलि है। ख्रीस्तयाग कलवारी के बलिदान की तरह है, क्योंकि बलि चढ़ाने वाला और बलि स्वयं वही येसु ख्रीस्त है।
फिर भी, ये तीन विभिन्नताएँ हैं-
- क्रूस पर, येसु ने अपना खून बहाया, ख्रीस्तयाग में ऐसा नहीं होता।
- क्रूस पर उसने स्वयं को, स्वर्गीय पिता को, प्रत्यक्ष अर्पित किया, जबकि वेदी पर, वह स्वयं को अपने प्रतिनिधि-पुरोहित द्वारा अर्पित करता है।
- क्रूस पर येसु ने हमारे लिए सब कृपाएँ अर्जित की, ख्रीस्तयाग में इन सभी अर्जित कृपाओं को वह हमें प्रदान करता है।

यह याद रखने योग्य है कि पुरोहित 'मेरा बलिदान और तुम्हारा बलिदान' कहता है और निरंतर प्रार्थना करते हुए ईश्वर के पूरे परिवार के नाम पर चढ़ाता है, इसलिए हमें इस उपासना विधि में पूर्णतया सचेतन और सक्रिय भाग लेना चाहिए, जो कि संपूर्ण ख्रीस्तीय कलीसिया के प्रति पवित्र और भव्य धर्म क्रिया है।

ख्रीस्तयाग पूजन पद्धति का श्रेष्ठतम समारोह है। यह कलीसिया की प्रार्थना है। यह हमारे साथ प्रार्थना करती हुई स्वयं येसु की प्रार्थना है। ख्रीस्तयाग में उपस्थित, साथ ही वे जो जीवित और मृत हैं ख्रीस्तयाग के पुण्यफलों के भागीदार होते हैं। यह पृथ्वी, शोधकाग्नि और स्वर्ग की सार्वभौमिक कलीसिया है, जो प्रभु के वेदी के चारों ओर ईश्वर को अपनी भक्ति की श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्र करता है।

ख्रीस्तयाग का समझदारी से अनुसरण करने का अर्थ है, ख्रीस्तयाग के भागों को जानना और उनको आत्मसात करना।

ख्रीस्तयाग और उसके भागों का संक्षिप्त उल्लेख-

प्रवेश गान- ख्रीस्तयाग समारोह की तैयारी कराता है।
प्रभु दया कर- यह प्रार्थना प्रभु येसु ख्रीस्त से दया की याचना है।

उच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा- यह पवित्र तृत्व के तीन दिव्यजनों के आनंद का गीत है।

प्रार्थना- जिसमें, पुरोहित हमारी आवश्यकताओं एवं इच्छाओं को ईश्वर के सम्मुख रखते हैं, अपने पुत्र प्रभु येसु ख्रीस्त और हमारे मध्यस्थ के नाम से उन सभी आवश्यकताओं एवं इच्छाओं को हमें देने की याचना करते हैं।

1. सुसमाचार की पूजन विधि-

पहला पाठ- इसे सुनकर और हमारे जीवन में अपनाकर, हम ईश्वर की मित्रता की ओर अग्रसर होते हैं।

मनन भजन- पहले पाठ के संदेश के लिए हमारा धन्यवाद का गीत और सुसमाचार को सुनने की तैयारी है।

सुसमाचार- सुसमाचार में प्रभु का वचन पढ़ने से पहले याजक, उसे क्रूस के चिह्न से अंकित करते हैं, यह दिखाने के लिए कि यह क्रूसित ख्रीस्त की शिक्षा है। यह नियम हो गया है कि ईशवाणी को आदर देने के लिए खड़े हो जाएँ और हमारे मस्तक, होठों और हृदय पर क्रूस का चिह्न बनाते हुए प्रार्थना करें कि ख्रीस्त की शिक्षा हमारी बुद्धि को भर दे, हमेशा हमारे होठों पर रहे और हमारे हृदयों को ईश्वर को अधिक प्यार करने को प्रेरित करे।

निसेया का धर्मसार- हमारे विश्वास की घोषणा है। हम ईश्वर को धन्यवाद दें कि जिस पर प्रेरितों ने और संतों ने विश्वास किया, उसी पर विश्वास करने की ईश्वर ने हमें कृपा प्रदान की।

2. परमप्रसाद की धर्म विधि-
रोटी और दाखरस का चढ़ावा- हम अब खास 'बलिदान' आरंभ करते हैं। भेंट के समय हम रोटी और दाखरस के प्रतीक में अपने को ईश्वर को चढ़ाते हैं और यह प्रार्थना सब कुछ अभिव्यक्त करने में मदद करती है, 'हे प्रभु आज हम तुझे, अपनी प्रार्थनाएँ, कार्य, खुशियाँ और कष्टों को अर्पित करते हैं। हमें अनन्त पिता से संयुक्त कर और यह कहना सिखा, तुम्हारी इच्छा पूरी हो।'

भेंट करना- अब याजक प्रार्थना बोलता है, जिसमें वह ईश्वर से पवित्र बलिदान स्वीकारने की याचना करता है और हमें भरपूर कृपाओं और आशीषों से भर देने की याचना करता है।

यूखारिस्तीय प्रार्थना- ख्रीस्त वेदी पर एक बलि के रूप में आने वाले हैं। उससे संयुक्त हो, हम स्वयं को, अनन्त पिता को स्वीकार्य बलि स्वरूप चढ़ाते हैं। गर्व को त्यागते, गुस्से को दबाते, विषय-वासनाओं को और प्रत्येक दुर्वासनाओं को नीचे दबाते बलि स्वरूप चढ़ाते हैं। हमारे हृदयों को परिवर्तित करते हैं कि प्रत्येक पाप का मार्ग अवरुद्ध हो जाए और वह जो आध्यात्मिक जीवन को बढ़ावा देता है, उत्साहपूर्वक विकसित हो।

अवतरणिका- पिता ईश्वर से धन्यवाद की प्रार्थना है, जिसने अपने दिव्य पुत्र को हमारी मुक्ति के लिए दे दिया।

परिवर्तन- यहाँ से पुरोहित बोलते हैं। अपने स्वयं या विश्वासियों के नाम से नहीं, परन्तु ख्रीस्त के नाम पर। यहाँ वह हमारे प्रभु के शब्दों को दोहराते हैं, जो रोटी और दाखरस को ख्रीस्त के शरीर और रक्त में बदलता है। हम स्वयं को हमारे स्वर्गीय पिता को, महिमामय बलि ख्रीस्त के साथ चढ़ाते हैं।

3. परमप्रसाद विधि-
प्रभु की प्रार्थना- हे हमारे पिता, हम ईश्वर की महिमा और हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक आवश्यकताओं के लिए प्रार्थना करते हैं।

परमप्रसाद की प्रार्थना- हमारे पापों के लिए ईश्वर से क्षमा याचना करते हुए, उसकी और अधिक भक्ति के लिए समस्त ख्रीस्तीयों के बीच शांति और एकता के लिए एवं शरीर और आत्मा के स्वास्थ्य और कृपा के लिए हम याजक के साथ प्रार्थना कर सकते हैं।

पवित्र परमप्रसाद- याजक स्वयं परमप्रसाद लेता है और तब वह विश्वासियों को परमप्रसाद बाँटता है।

प्रसाद प्रार्थना- धन्यवाद की प्रार्थना है... इसके बाद याजक सब को आशीर्वाद देते हैं।

जितने बेहतर हम ख्रीस्तयाग का अनुसरण करते हैं, हम अधिकाधिक कृपा ग्रहण करते हैं और अधिक ईश्वर की महिमा करेंगे और मनुष्य की मुक्ति प्राप्त करेंगे।

'पूर्वानुमानित' या संध्याकालीन ख्रीस्तयाग-
'यूखारिस्तीय रहस्य की उपासना पर अधिकृत निर्देश' उल्लेख करता है कि जब रविवार के ख्रीस्तयाग को पूर्ण करने के लिए उसके पूर्व संध्या, शनिवार शाम को ख्रीस्त की अनुमति दी जाती है तो यह ख्रीस्तयाग संध्या को ही हो सकती है। ख्रीस्तयाग के समय का निर्धारण स्थानीय बिशप द्वारा होता है। ख्रीस्तयाग में प्रवचन और विश्वासियों की प्रार्थना होती है। इस तरह का ख्रीस्तयाग हुक्म पर्व की पूर्व संध्या को भी लागू होता है। विश्वासीगण जो रविवार या हुक्म पर्व का ख्रीस्तयाग पूर्व संध्या को सम्पन्न करते हैं, वे शाम के वक्त भी परमप्रसाद ग्रहण कर सकते हैं, जो भी उन्होंने सुबह को ही परमप्रसाद ग्रहण कर लिया है।

सहानुष्ठानित ख्रीस्तयाग- उचित ढंग से बलिदान और पुरोहिताई की एकता को प्रदर्शित करता है। इसके अतिरिक्त, जब विश्वासी इसमें सक्रिय तौर पर भाग लेते हैं तो ईश्वर के लोगों की एकता आश्चर्यजनक रूप से प्रकट होती है। उस समय विशेष तौर से यदि धर्माध्यक्ष महायाजक हो... सहानुष्ठान पुरोहित के भाईचारे के बंधन को दोनों प्रतीक द्वारा प्रकट करता और शक्ति देता है... यद्यपि प्रत्येक याजक अकेले ही ख्रीस्तयाग चढ़ाने का अधिकार रखता है। यह न्यायसंगत है कि पुरोहितगणों को, ख्रीस्तयाग इसी महान तरीके से चढ़ाना चाहिए।

पवित्र परमप्रसाद
पवित्र यूखारिस्त को 'विश्वास का रहस्य' कहा जाता है।... और यह सच है। स्वयं ख्रीस्त ने कहा था, 'धन्य हैं वे जिन्होंने नहीं देखा, परन्तु फिर भी विश्वास करते हैं।'

फ्रांस के राजा संत लुईस के समय में, पेरिस में, पेरिस के एक गिरजाघर में सुबह के समय बड़ी ही उत्तेजना थी। बड़ी वेदी पर ख्रीस्तयाग चढ़ाया जा रहा था और वहाँ जो भी उपस्थित थे, उन्होंने हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त को पवित्र होस्तिया में बालक के रूप में देखा। यह बात तुरंत ही चारों ओर फैली और स्वाभाविक ही है कि इस आश्चर्य को देखने लोग दौड़कर आने लगे।

राजा, अपने स्वयं के छोटे प्रार्थनालय में ख्रीस्तयाग सुन रहा था, किसी ने दौ़ड़कर इस बात की खबर राजा को दी, परन्तु वह जहाँ था वहीं रहा।

'हमारा प्रभु जिस तरह वहाँ मौजूद है, यहाँ भी है।' उसने कहा, 'ऐसे चमत्कार अविश्वासियों के लाभ के लिए होते हैं। उन्हें ही जाने दो और देखने दो जो विश्वास नहीं करते। मेरे लिए मेरा विश्वास काफी है। मैं अपने प्रभु की वास्तविक उपस्थिति में विश्वास करता हूँ, क्योंकि उसने ऐसा ही कहा था।'