वह उन सभी की देखभाल करती है, जो अपने दर्दों को उसमें देखते हैं। और वह सभी के दर्दों को हर लेती है। वह आपके आँसुओं को अपने में समाहित कर आपके चेहरे पर दर्दरहित मुस्कान लाती है। आपके सारे दुःखों को वह अपने खाते में जमा कर आपके खाते को खुशियों से भर देती है। वह आपकी परेशानियों को खुद वहन कर आपको राहत और आराम प्रदान करती है।
वह आपके लिए ईश्वर से इस तरह प्रार्थना करती है जैसे कि आप खुद प्रार्थना कर रहे हैं। तो आप निश्चित ही जानना चाहेंगे कि आखिर वह कौन है जो आपकी पीड़ा कोखुद अपनी झोली में समेटकर आपका दामन खुशियों से भरने का महान कार्य करती है?
वह निश्चित ही नर्स है जिसे धरती का देवदूत या परी भी कहा जाता है। जब कोई बच्चा अपनी जरूरत के लिए रोता है तो उसकी माता सारे जमाने को भुला कर फौरन अपने बच्चे को संभालने में जुट जाती है। वह अपने बच्चे को प्यार करती है, उसकी देखभाल करती है तथा उसकी सुख-सुविधा का ख्याल रखती है जैसे कि वह आत्मा पूरी तरह उस पर निर्भर है, इसी तरह नर्स भी अपने रोगियों की वैसी ही देखभाल करती है जैसे कि वह उनकी माँ है।
वह उन सभी की देखभाल करती है, जो अपने दर्दों को उसमें देखते हैं। और वह सभी के दर्दों को हर लेती है। वह आपके आँसुओं को अपने में समाहित कर आपके चेहरे पर दर्दरहित मुस्कान लाती है। सारे दुःखों को वह अपने खाते में जमा कर आपके खाते को खुशियों से भरती हैं।
एक सिस्टर (नर्स) वार्ड में अपने रोगी की पूरे समर्पण तथा निष्ठा के साथ देखभाल करती है। सिस्टर दर्द हो रहा है, सहा नहीं जाता, सारे समय वह इन शिकायतों को सुनते हुए उन्हें दूर करने के लिए प्रयासरत रहती है। एक सिस्टर जो सारी दुनिया में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के मध्य स्तंभ के रूप में कार्य करती है तथा एक ही समय में तरह-तरह के काम करते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वाह करती है। वह रोगियों को राहत देती है तो उनके परिजनों को परामर्श देती है।
वह वार्ड में प्रबंधक की भूमिका निभाती है तो संबंधित विभागों में एक अच्छे समन्वयक के रूप में अपना योगदान देती है। दुनिया का कोई भी अस्पताल या स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली इस अद्भुत देवदूत के बिना पूर्णता प्राप्त नहीं करता। नर्स के बिना वार्ड या अस्पताल की कल्पना तक नहीं की जा सकती है।
प्रौद्योगिकी के इस अतिआधुनिक जगत में हम अस्पतालों में कई नई-नई मशीनें, उपकरण तथा मरीजों के लिए एक से बढ़कर एक महँगे साधन देखते हैं। लेकिन सिस्टर के दयालु स्पर्श के बिना केवल मशीनों से मरीजों के चंगे होने की बात सोचना बेमानी होगी।
मशीनों से वह बात नहीं बन पाती जबकि सिस्टर के स्नेहिल स्पर्श से मरीज को जल्दी ठीक होने का आत्मविश्वास मिलता है। वार्ड में वह रोगी के भर्ती होने से छुट्टी मिलने तक उसकी संपूर्ण देखभाल करती है। इस दौरान वह चौबीसों घंटे अपने रोगी की देखभाल करती है। वह वार्ड में रोगी के आते ही उसके आराम की व्यवस्था करती है, जाँच तथा इलाज को आगे बढ़ाने के लिए चिकित्सकों तथा पैरामेडिकल स्टाफ से समन्वय करती है।
वह रोगी को समय पर दवाइयाँ देती है तथा दिए गए निर्देशों का यथासमय पालन करती है। वह रोगी की व्यक्तिगततथा पर्यावरण स्वच्छता की देखभाल करती है। वह रोगी की पोषकता का ख्याल रखती है। यद्यपि उसे एक समय में कई काम करने होते हैं, वह धैर्यपूर्वक रोगी की बातों को सुनती है।
वह रोगी को ऐसा महसूस कराती है जैसे कि वह उसके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वह अन्य रोगियों के अनुभव सुनाकर उनमें आत्मविश्वास भरने की चेष्टा करती है। वह अथक रूप से यह देखने के लिए सदैव तैयार रहती है कि उसका रोगी अच्छा रहे, खुश रहे तथा जल्दी से जल्दी अच्छा हो जाए।
लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि अपना कर्तव्य करते समय वह कितने, शारीरिक तथा मानसिक दबाव और तनाव से गुजरती होगी? वह चौबीसों घंटे रोगियों की परवाह करती है, लेकिन क्या कोई एक पल के लिए भी उसकी परवाह करता है? जब वह देखती है कि उसका रोगी ठीक नहीं हो पा रहा है तो वह चिंतित हो जाती है। जब वह पाती है कि उसके रोगी का दर्द असहनीय है तो वह अंदर ही अंदर विलाप करने लगती है। जब लंबी देखभाल के बाद उसका कोई रोगी दुनिया से कूच कर जाता है तो वह बिन बताए चुपचाप रोती है।
यह बात अलग है कि तब उसके आँसू किसी को दिखाई नहीं देते हैं। जब कोई उसकी भावना को समझ नहीं पाता है तो उसका दिल टूट जाता है। अत्यधिक खेदपूर्वक यह कहना पड़ता है कि समाज और रोगी के प्रति सिस्टर के समर्पण और निष्ठा को हमने कभी मान नहीं दिया है। हमारी स्वास्थ्य प्रणाली में उसका योगदान असीमित है। उसका मोल अनमोल है। बीमार के साथ उसकी मौजूदगी धरती पर देवदूत या एंजेल की तरह है, तब भी क्या हमने उसके प्रति अपने दायित्व को महसूस किया है? हमें समाज में सिस्टर के आदर्श तथा मर्यादा को यथोचित सम्मान देना ही चाहिए।
(लेखिका श्री अरविंदो (सेम्स) कॉलेज ऑफ नर्सिंग, इंदौर की प्रिंसीपल हैं)