सिम्बा : फिल्म समीक्षा

भारत में दो तरह के दर्शक वर्ग माने जाते हैं। एक होते हैं 'मास', जो सिंगल स्क्रीन में मसाला फिल्म देखना पसंद करते हैं। उन्हें थोड़ा रोमांस, थोड़ी कॉमेडी और थोड़ी मारधाड़ चाहिए होते हैं। दूसरा वर्ग है 'क्लास', जो मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखता है और उसकी पसंद थोड़ी हटके बनी फिल्मों में होती है।

इन दिनों क्लास के लिए ज्यादा और मास के लिए कम फिल्में बनती हैं क्योंकि मल्टीप्लेक्स की टिकट दर महंगी है और मुनाफा ज्यादा होता है। समय-समय पर 'मास' के लिए फिल्में बनती रहती हैं जैसे वांटेड, राउडी राठौर या सिंघम। दरअसल मसाला फिल्म बनाना भी आसान नहीं है क्योंकि मसालों का संतुलन सही नहीं हो तो स्वाद बिगड़ जाता है।

पिछले कुछ सालों में मसाला फिल्म बनाने में रोहित शेट्टी माहिर माने जाते हैं। गोलमाल सीरिज के रूप में उनकी हास्य और एक्शन फिल्मों के रूप में सिंघम सीरिज की फिल्में काफी पसंद की गईं। अब वे 'सिम्बा' लेकर आए हैं। पुलिस ऑफिसर के रूप में चुलबुल पांडे (दबंग) और सिंघम (सिंघम) काफी पसंद किए गए थे। इनको मिला-जुलाकर बनाया गया है सिम्बा।



अनाथ बच्चा बचपन में देखता है कि माल कमाने के लिए पुलिस बनना होता है तो वह पुलिस में शामिल होने का फैसला करता है। संग्राम भालेराव (रणवीर सिंह) एक ऐसा पुलिस ऑफिसर है जो पैसा कमाने के लिए भ्रष्टाचार करता है और अपना कर्तव्य नहीं निभाता। वह बाजीराव सिंघम (अजय देवगन) के शहर का ही रहने वाला है।

सिम्बा की मुलाकात शगुन साठे (सारा अली खान) से होती है और वह उसे दिल दे बैठता है। रानाडे (सोनू सूद) और उसके भाई अवैध धंधों में लिप्त है और यह जानते हुए भी सिम्बा आंख मूंद कर बैठे रहता है। अचानक ऐसी घटना घटती है जो सिम्बा को हिला देती है। उसका जमीर जाग जाता है। उसे अपने भ्रष्ट होने पर शर्म आती है। वह रानाडे और उसके भाइयों से सीधा भिड़ जाता है।

2015 में प्रदर्शित हिट तेुलुगु फिल्म 'टेम्पर' से सिम्बा प्रेरित है, जिसमें कुछ परिवर्तन किए गए हैं। फिल्म की कहानी रूटीन है और उसमें बहुत ज्यादा नई बात नहीं है। इस कहानी को निर्भया मामले से जोड़ कर रियलिटी का टच देने की कोशिश की गई है।

फिल्म इस बात का मुद्दा जोर-शोर से उठाती है कि भारत में बलात्कार की समस्या भयावह रूप ले रही है। बलात्कारियों को सजा मिलने में बहुत ज्यादा देर हो जाती है और कई तो सबूतों के अभाव में छूट जाते हैं। फिल्म जो हल सुझाती है वो वास्तव में संभव नहीं है, लेकिन आम आदमी इसी तरह का इंसाफ चाहता है और इसलिए यह फिल्म उसे अपील करती है।



रोहित शेट्टी ने इसे अपने अंदाज में बनाया है। चटक रंग, लाउड कैरेक्टर के साथ पहला हाफ हल्का-फुल्का और दूसरे हाफ में एक्शन और तनाव। उन्होंने सिंघम के साथ फिल्म को अच्छे से जोड़ा गया है और अजय देवगन का बहुत बढ़िया उपयोग किया है।

किसी भी सितारे का फिल्म में कैसे उपयोग किया जाता है ये रोहित ने दिखाया है वरना अधिकतर निर्देशक मेहमान कलाकार के रूप में स्टार को बरबाद कर देते हैं। कॉमेडी और एक्शन का संतुलन सही रखा है। इस बार उनकी फिल्म में महिला पात्रों को भी महत्वपूर्ण जगह मिली है। मां, बहन के साथ जज और पुलिस में भी महिला किरदार दिखाई देते हैं।

रोहित अपनी फिल्म में कहानी से ज्यादा किरदार पर ध्यान देते हैं। गोलमाल और सिंघम की कहानी याद हो न हो, लेकिन उनके कैरेक्टर हमें अभी तक याद है। इसी तरह की मेहनत उन्होंने सिम्बा के कैरेक्टर को निखारने में की है। सिम्बा का छिछोरापन और बात को गंभीरता से नहीं लेने वाली बात उन्होंने खूब उभारा है। सिम्बा के कैरेक्टर से दर्शक प्यार करने लगते हैं और यही पर बाजी रोहित जीत लेते हैं। स्लोमोशन शॉट्स के जरिये उन्होंने सिम्बा के किरदार को लार्जर देन लाइफ बनाया है।

जहां तक स्क्रिप्ट की बात है तो यह युनूस सजवल की थोड़ी मेहनत और मांगती थी, खासतौर पर दूसरे हाफ में जब ड्रामा हावी होता है। कोर्टरूम ड्रामा कमजोर है और कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं जिनका जवाब नहीं मिलता। कुछ बातें अच्छी भी हैं खासतौर पर सिम्बा और मोहिले के बीच सैल्यूट को लेकर तनातनी वाला सीक्वेंस।

'सिम्बा' के रूप में प्रभावित करते हैं। अपने अभिनय और एनर्जी लेवल से वे दर्शकों को बांध कर रखते हैं और उनके होते हुए फिल्म की कमियों पर ध्यान नहीं जाता। अपने किरदार को उन्होंने खासा फनी बनाया है। इमोशनल और एक्शन दृश्यों में विशेष रूप से प्रभावित करते हैं।

सारा अली खान के लिए बहुत ज्यादा स्कोप नहीं था, लेकिन वे अपनी नेचुरल एक्टिंग और आत्मविश्वास से अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराती हैं। सोनू सूद विलेन के रूप में अपना असर छोड़ते हैं और सिम्बा को जोरदार टक्कर देते हैं। आशुतोष राणा का अभिनय देखने लायक है। सिद्धार्थ जाधव, अश्विनी कलसेकर, विजय पाटकर, वैदेही परशुरामी सहित सारे कलाकारों ने अपना काम अच्छे से किया है। गोलमाल की टीम, सिंघम के अलावा अक्षय कुमार भी नजर आते हैं जो इशारा करते हैं कि रोहित की अगली फिल्म में वे नजर आएंगे।

गीत-संगीत के मामले में फिल्म कंगाल है। नया नहीं सूझा तो पुराने हिट गानों से काम चलाया गया। गीत की सिचुएशन भी ठीक से नहीं बनाई गई और ये सिर्फ इसलिए रखे गए क्योंकि फिल्म में गाने होने चाहिए। सिनेमाटोग्राफी औसत से बेहतर है। एक्शन और अच्छा हो सकता था। बैकग्राउंड म्युजिक फिल्म की अपील को बढ़ाता है।

मसाला फिल्मों बहुत दिनों से नहीं देखी हो तो सिम्बा को एक मौका दिया जा सकता है।

बैनर : रिलायंस एंटरटेनमेंट, रोहित शेट्टी पिक्चर्स, धर्मा प्रोडक्शन्स
निर्माता : हीरू जौहर, रोहित शेट्टी, अपूर्व मेहता, करण जौहर
निर्देशक : रोहित शेट्टी
संगीत : तनिष्क बागची
कलाकार : रणवीर सिंह, सारा अली खान, सोनू सूद, सिद्धार्थ जाधव, आशुतोष राणा, अश्विनी कलसेकर, विजय पाटकर, वैदेही परशुरामी, मेहमान कलाकार- अजय देवगन, अक्षय कुमार, तुषार कपूर, कुणाल खेमू, श्रेयस तलपदे, अरशद वारसी
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 39 मिनट
रेटिंग : 3/5


 

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