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Written By समय ताम्रकर
Last Updated: सोमवार, 10 नवंबर 2014 (14:44 IST)

क्रीचर : फिल्म समीक्षा

विक्रम भट्ट द्वारा बनाई गई हॉरर फिल्मों को देख दर्शक थक और पक चुके हैं, लेकिन विक्रम भट्ट अभी बोर नहीं हुए हैं। तीन-चार महीने में दर्शकों को डराने के लिए वे फिल्म लेकर हाजिर हो जाते हैं। दर्शक चाहते हैं कि विक्रम उन्हें अपनी फिल्मों से डराएं, चौकाएं, रोमांचित करें, लेकिन अब तो उनकी हॉरर/थ्रिलर फिल्मों को देख हंसी आती है। हॉरर या थ्रिलर बजाय ये हास्य फिल्मों में तब्दील हो गई हैं। 
 
विक्रम के साथ समस्या ये है कि वे एक जैसी फिल्में बना रहे हैं। भूत-चुड़ैल-प्रेतात्मा के जरिये भय पैदा किया जाता है। फिर कोई तांत्रिक, वैज्ञानिक, पंडित या फादर आकर रास्ता निकालता है। ‘क्रीचर’ में उन्होंने डराने के लिए एक खूंखार जानवर को लाया है। जो मानव और छिपकली का मिला-जुला रूप है। इसे ब्रह्मराक्षस बताया गया है। इसकी उत्पत्ति कैसे होती है इसके बारे में फिल्म में जूलॉजिस्ट बने मुकुल देव बताते हैं। इस ब्रह्मराक्षस से डराने की सारी कोशिश कमजोर स्क्रिप्ट के अभाव में बेकार हो गई हैं। 

 
 
कहानी है आहना दत्त (बिपाशा बसु) की, जो लोन लेकर हिमाचल प्रदेश में एक हिल स्टेशन पर एक होटल खोलती है। होटल के खुलते ही वहां कई लोग रूम की बुकिंग कराते हैं, जिसमें से एक लेखक कुणाल आनंद (इमरान अब्बास नकवी) भी है। जल्दी ही दहशत का माहौल शुरू हो जाता है क्योंकि होटल में ठहरे एक व्यक्ति की जंगल में अपनी पत्नी को घुमाने ले जाने के दौरान मौत हो जाती है। वह आहना के होटल में रूका था। क्रीचर होटल के कुक को भी मार डालता है। धीरे-धीरे मौत का सिलसिला शुरू हो जाता है। 
 
हमले से बचा एक आदमी बताता है कि यह एक राक्षस का किया धरा है। मुंबई का एक प्रोफेसर सदाना (मुकल देव) बताता है कि यह क्रीचर मूलत: ब्रह्मराक्षस है जिसे मारना लगभग असंभव है। आहना के होटल में कोई रूकना नहीं चाहता। प्रोफेसर सदाना भी आहना को होटल बंद करने का कहते हैं। इधर बैंक वाले आहना पर लोन चुकाने का दबाव बनाते हुए उसे दस दिन का समय देते हैं। 
 
आहना होटल बंद करने के बजाय क्रीचर से लड़ने का निश्चय करती है। उसका साथ देता है कुणाल जो अब आहना को चाहने लगा है। इसी बीच आहना को डॉ. मोगा (मोहन कपूर) बताता है कि क्रीचर को उसी हथियार से मारा जा सकता है जिसे गुरु पूर्णिमा के दिन नीम के पानी से एक विशेष तालाब में धोकर पवित्र किया जाए। गुरु पूर्णिमा तो महीनों दूर है। आहना इस ब्रह्मराक्षस से कैसे निपटती है यह फिल्म का सार है। 
 
विक्रम भट्ट की कहानी बेहद घिसी-पिटी है। सुखमणि साधना के साथ मिलकर उन्होंने स्क्रीनप्ले लिखा है, लेकिन कुछ भी नया वे पेश नहीं कर पाए। 'क्रीचर' ही एकमात्र पहलू है जिसको लेकर दर्शकों में जिज्ञासा रहती है। शुरुआत में क्रीचर वाले दृश्य थोड़ा डराते हैं, लेकिन जब इसी तरह के दृश्य लगातार दोहराए जाते हैं तो डर काफूर हो जाता है। जब तक क्रीचर को दिखाया नहीं गया है तब तक जरूर फिल्म में उत्सुकता रहती है, लेकिन क्रीचर को देखने के बाद फिल्म बेहद खींची गई है और इसमें रहस्य जैसी कोई बात नहीं रह जाती। क्रीचर को मारने का जो उपाय बताया गया है उस पर यकीन दिलाने में फिल्मकार नाकाम रहे हैं।  
 
विक्रम भट्ट की तारीफ इसलिए की जा सकती है कि उन्होंने हॉलीवुड की तर्ज पर बॉलीवुड में इस तरह की फिल्म बनाने का प्रयास किया है। सीमित बजट की वजह से वे अपनी कल्पनाओं को वैसे पंख नहीं लगा पाए। लेखक के रूप में एकरसता से उन्हें बचना होगा। उनकी सारी फिल्में एक जैसी लिखी जाती हैं। विक्रम ने अपने आपको एक ऐसे घेरे में कैद कर लिया है जिसके बाहर वे सोच नहीं पा रहे हैं। पहले भय पैदा किया जाता है, फिर उससे निपटने का बकवास सा उपाय बताया जाता है। अब तो विक्रम की फिल्मों के किरदार भी एक जैसे लगते हैं। 
 
‘क्रीचर’ को  खराब स्क्रिप्ट ले डूबी। जो थ्रिल, सस्पेंस और हॉरर इस जॉनर की फिल्मों में होना चाहिए वो नदारद है। फिल्म में गाने दर्शकों के लिए ब्रेक का काम करते हैं। बिपाशा और इमरान वाला रोमांटिक ट्रेक भी बेहद कमजोर है। वीएफएक्स वर्क तारीफ योग्य हैं क्योंकि सीमिति साधनों में किया गया है। थ्री-डी इफेक्ट्स कुछ जगह प्रभावी है। संवादों पर बिलकुल भी मेहनत नहीं की गई है।  
 
बिपाशा बसु ने अपने अभिनय से फिल्म में जान डालने की पुरजोर कोशिश की है, लेकिन नाकाम रही हैं। उनके अभिनय में विविधता नहीं है। इमरान अब्बास को पता ही नहीं कि एक्टिंग किसे कहते हैं। पूरी फिल्म में वे ‘वूडन एक्सप्रेशन’ लिए घूमते रहे। मुकुल देव औसत रहे। 
 
क्रीचर में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके लिए टिकट खरीदा जाए।
 
3 डी 
बैनर : टी-सीरिज सुपर कैसेट्स इंडस्ट्री लि., बीजीवी फिल्म्स
निर्माता : भूषण कुमार, किशन कुमार
निर्देशक : विक्रम भट्ट
संगीतकार : मिथुन, टोनी कक्कड़
कलाकार : बिपाशा बसु, इमरान अब्बास, मुकुल देव, मोहन कपूर
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 15 मिनट
रेटिंग : 1.5/5