गुरुवार, 15 जनवरी 2026
  1. मनोरंजन
  2. बॉलीवुड
  3. बॉलीवुड न्यूज़
  4. Kartik Aaryans films offer entertainment along with socially relevant stories
Last Modified: रविवार, 28 दिसंबर 2025 (17:00 IST)

तू मेरी मैं तेरा से लेकर आकाशवाणी तक, कार्तिक आर्यन की फिल्में मनोरंजन के साथ परोसती हैं सामाजिक रूप से प्रासंगिक कहानियां

Kartik Aaryan
पिछले कुछ वर्षों में कार्तिक आर्यन की फिल्मोग्राफी केवल पारंपरिक कमर्शियल सिनेमा तक सीमित नहीं रही है। रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा के जरिए उनकी कई फिल्में सामाजिक चेतना, बदलते रिश्तों और आज के दौर के मूल्यों को संवेदनशीलता के साथ प्रतिबिंबित करती हैं। 
 
यही वजह है कि उनकी कहानियां दर्शकों से भावनात्मक रूप से जुड़ती हैं और सोचने पर मजबूर करती हैं। कार्तिक की हालिया रिलीज फिल्म ‘तू मेरी मैं तेरा, मैं तेरा तू मेरी’ एक ताज़गीभरी और प्रगतिशील रोमांटिक ड्रामा के रूप में सामने आती है, जो शादी से जुड़े पारंपरिक विचारों को चुनौती देती है। 
 
फ़िल्म एक बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली सवाल उठाती है, जैसे शादी के बाद हमेशा लड़की से ही घर छोड़ने की उम्मीद क्यों की जाती है? एक साहसी नैरेटिव विकल्प के तहत, कार्तिक आर्यन का किरदार शादी के बाद खुद अपने घर से निकलने का फ़ैसला करता है, जिससे वह अपने पार्टनर के साथ बराबरी की ज़िम्मेदारी साझा कर सके। 
 
समीक्षकों ने फिल्म की इस सामाजिक रूप से जागरूक सोच और आधुनिक दृष्टिकोण की सराहना की है। बिना उपदेश दिए, एक सहज प्रेम कहानी के माध्यम से स्ट्रिल-पुरुष समानता को सामान्य बनाना इसकी सबसे बड़ी ताक़त है। संवेदनशील और समझदार पुरुष किरदार के रूप में कार्तिक यह संदेश देते हैं कि असली बदलाव रोज़मर्रा के रिश्तों से ही शुरू होता है।
 
‘भूल भुलैया 3’ भले ही एक हॉरर-कॉमेडी के तौर पर प्रस्तुत की गई हो, लेकिन इसके भीतर एक गहरी सामाजिक टिप्पणी छिपी है। फ़िल्म क्वियर पहचान, विश्वासघात और स्वीकार्यता की ताक़त जैसे विषयों को छूती है। भूत बने देबेंद्रनाथ की बैकस्टोरी सामाजिक अस्वीकृति और दमन के दर्दनाक परिणामों को दिखाती है, जहां अपनी पहचान को नकारने की मजबूरी भावनात्मक विनाश का कारण बनती है। 
 
‘सत्यप्रेम की कथा’ सहमति, जेंडर-बेस्ड वायलेंस और यौन शोषण जैसे गंभीर और असहज विषयों को सीधे संबोधित करती है। फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत है पुरुष का संवेदनशील होना। कार्तिक आर्यन का किरदार, कियारा आडवाणी द्वारा निभाए गए महिला पात्र के साथ उसके ट्रॉमा और हीलिंग की यात्रा में मजबूती से खड़ा रहता है। यह कहानी सम्मान, संवाद और जवाबदेही की अहमियत को रेखांकित करती है और मर्दानगी की रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती देती है।
 
‘लुका छुपी’ छोटे शहरों में लिव-इन रिलेशनशिप जैसे विषय को हल्के-फुल्के हास्य और गर्मजोशी के साथ पेश करती है। शादी से पहले साथ रहने का फ़ैसला लेने वाला यह कपल जब अपने रूढ़िवादी परिवारों से इस सच्चाई को छुपाने की कोशिश करता है, तो कई मज़ेदार हालात पैदा होते हैं। लेकिन इस कॉमेडी के नीचे सामाजिक कलंक, पीढ़ियों के टकराव और रिश्तों को लेकर बदलती सोच की कहानी छुपी हुई है।
 
कार्तिक आर्यन के करियर की शुरुआत में आई ‘आकाश वाणी’ उनके सामाजिक रूप से सजग सिनेमा की शुरुआती झलक थी। फ़िल्म ने वैवाहिक बलात्कार, भावनात्मक शोषण और पारिवारिक दबाव जैसे विषयों को साहस के साथ उठाया। यह वो समय था, जब मुख्यधारा की फ़िल्मों में इन मुद्दों पर खुलकर बात कम होती थी। यह फ़िल्म एक ज़रूरी और निडर नैरेटिव चॉइस साबित हुई।
 
इन सभी फ़िल्मों को एक साथ देखें तो कार्तिक आर्यन का सिनेमा एक ऐसे सफ़र को दर्शाता है, जहां मनोरंजन और सामाजिक सरोकार साथ-साथ चलते हैं। ऐसी कहानियाँ चुनकर जो संवाद और आत्ममंथन को जन्म देती हैं, वह यह साबित करते हैं कि लोकप्रिय सिनेमा न सिर्फ़ मनोरंजक हो सकता है, बल्कि अर्थपूर्ण और ज़िम्मेदार भी।
 
ये भी पढ़ें
'द राजा साब' से तेलुगु डेब्यू करने जा रहीं मालविका मोहनन, बताया कैसा रहा प्रभास के साथ काम करने का अनुभव