प्यार भरा दिल तोड़ दिया : गुलशन बावरा

गुलशन बावरा नहीं रहे

गुलशन बावरा
स्मृति आदित्य|
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उनके गीतों की सौंधी खुशबू अतीत की धरती से उठकर आज की बयारों को महकाने में समर्थ है। गुलशन बावरा नाम था उनका। एक संवेदनशील गीतकार। कई अमर रचनाएँ। रचनाएँ भी ऐसी जिनमें मानवीय रिश्तों का इन्द्रधनुष दिखाई पड़ता है।

जब उन्होंने लिखा -मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती, तब देश के युवाओं के पोर-पोर में इस धरती के प्रति असीम प्रेम उमड़ आया। जब उनकी कलम ने रचा- चाँदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया तो न जाने कितने टूटे दिलों का दर्द इस गीत के साथ बह निकला।

विभाजन के समय पाकिस्तान छोड़कर वे दिल्ली आ गए। मुंबई आए तो कल्याणजी-आनंदजी ने पहला मौका दिया। फिल्म थी-चन्द्रसेना। चन्द्रसेना का गीत 'मैं क्या जानूँ काहे लागे सावन मतवाला' उस समय खासा लोकप्रिय हुआ। गुलशनजी की कलम तब भी गीत रचती रही जब वे अभिनय की दुनिया में कॉमेडी के रंग बिखेर रहे थे।
एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- 'मैं तब भी गाने लिख-लिखकर रखता था। फिर कहानी सुनने के बाद सिचुएशन के अनुसार गीतों का चयन करता था। कहानी के साथ चलना जरूरी है तभी गाने हिट होते हैं। आज किसे फुर्सत है कहानी सुनने की? और कहानी है कहाँ? विदेशी फिल्मों की नकल या दो-चार फिल्मों का मिश्रण। कहानी और विजन दोनों ही गायब हैं फिल्मों से।'
गुलशन आज के गीत-संगीत से भी विचलित थे। 'गीतों में भावना नहीं है। और संगीत में आत्मा। पहले श्रोताओं को ध्यान में रखकर रचना बनती थी। आजकल 'दर्शकों' को जेहन में रखा जाता है। उस जमाने में गीत-संगीत और दृश्यों का उम्दा तालमेल होता था। आजकल मात्र दृश्यों को प्रभावी बनाया जाता है।

पंजाबी फिल्म 'पुन्नो' में बतौर नायक अभिनय कर चुके गुलशन फिल्मों में और अधिक लेखन करना चाहते थे मगर इस शर्त पर कि डायरेक्टर और फिल्म अच्छी हो। अंतिम वक्त में उनकी पीड़ा थी- अब हमें पूछने वाला कौन है? जो प्रतिष्ठा और सम्मान मैंने पुराने गीतों को रचकर हासिल किया क्या वह आज चल रहे सस्ते गीत और घटिया धुनों के साथ बरकरार रखा जा सकता है?
लगभग सत्तर फिल्मों में ढाई सौ से ज्यादा सुरीले गीतों को रचने वाले गुलशन ने व्याकुल मन से कहा था - 'गीत-संगीत और फिल्मों की वर्तमान स्थिति को बदला जाना चाहिए क्योंकि यह मामला फिल्म इंडस्ट्री का नहीं बल्कि एक विधा का है। गीत-संगीत का एक मेहमान की तरह आकर चला जाना सचमुच दु:खद है।'

लेखन से उनका रिश्ता आजीवन जुड़ा रहा। चाहे फिल्मों के लिए नहीं अपने रचनाकार मन के लिए ही सही। नई फिल्मों पर उनकी तल्ख टिप्पणी कि 'मेरी बर्दाश्त से बाहर हैं नई फिल्में' हमें सोचने को विवश करती हैं। उनके रचे गीत 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी' की तर्ज पर कहें तो जीवनभर लेखन ही उनका ईमान और लेखन ही उनकी जिन्दगी रहा। आज गुलशन हमारे बीच नहीं हैं लेकिन खूबसूरत गीतों में यह 'बावरा' जिन्दा रहेगा।



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