रोमांसिंग विद देव आनन्द

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प्रभात फिल्म कंपनी (पुणे) में काम करते समय अपने धोबी की गलती से की मुलाकात ऐसे व्यक्ति से हुई, जो आगे चलकर उनका हमदम दोस्त बना। वह व्यक्ति थे गुरुदत्त, जिन्होंने प्यासा/कागज के फूल और साहब, बीबी और गुलाब जैसी क्लासिक फिल्में बनाकर दुनिया में नाम कमाया। गुरुदत्त कर्नाटक से शांति निकेतन वाया उदयशंकर के अल्मोड़ा स्थित बैले ग्रुप से कोरियोग्राफी सीखकर प्रभात में आए थे। एक बार धोबी ने दोनों के शर्ट की रांग डिलेवरी दे दी। अपने-अपने शर्ट लेकर धोबी की दुकान पर संयोग से एक साथ पहुँचे। धोबी की गलती ने उन्हें जिंदगीभर का दोस्त बना दिया। दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि जो कोई पहले निर्माता-निर्देशक बनेगा, वह दूसरे को फिल्म में ब्रेक देगा। 1951-52 में देव ने अपने बैनर नवकेतन के जरिए ‘बाजी’ और ‘जाल’ फिल्म का निर्देशन गुरुदत्त से कराया। इसी प्रकार गुरुदत्त ने फिल्म ‘सीआईडी’ में देव को शकीला के साथ पेश किया।

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चुप-चुप खड़े हो जरूर कोई बात है
हर हीरो का किसी न किसी हीरोइन से रोमांस का चक्कर चलना फिल्मी दुनिया की आम बात है। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हो गया। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। दोनों के प्यार के चर्चे नरगिस-राजकपूर या दिलीपकुमार-मधुबाला के चर्चों की तरह हर किसी की जुबान पर थे। सुरैया की नानी कट्टर मुस्लिम थी। 1947 के भारत विभाजन से हिन्दू-मुसलमान के बीच दरारें बढ़ गई थीं। यदि सुरैया की शादी देव से हुई होती तो दंगे तक भड़कने का अंदेशा था। इसलिए सुरैया ताउम्र कुँवारी रही और उन्होंने देव के अलावा और किसी के सपने नहीं देखे, जबकि पाकिस्तान से एक दूल्हा बैंडबाजे के साथ बारात लेकर उनके दरवाजे तक आ गया था। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर सिर्फ दस मिनट में शादी हो गई। सेट पर उपस्थित उनके भाई चेतन आनन्द तक को इस शादी की भनक तक नहीं थी।

गाता रहे मेरा दिल
Devanand
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आजादी के बाद फिल्मों में टीम वर्क का सिलसिला राजकपूर ने शुरू किया। उन्होंने लता-मुकेश/शैलेन्द्र-हसरत/शंकर-जयकिशन/ की जोड़ी को अपनी टीम में शामिल किया। दूसरी ओर नौशाद-शकील साथ रहे। साहिर-एसडी बर्मन की जुगलबंदी लंबी चली। देव आनन्द ने गुरुदत्त/गीता बाली/किशोर कुमार/एसडी बर्मन/ साहिर को अपनी टीम का हमसफर बनाया। नौशाद तथा शंकर जयकिशन के सामने यदि किसी संगीतकार को सफलता और लोकप्रियता मिली तो वे थे दादा बर्मन। ये तमाम साथी कलाकार मिलकर देवआनन्द को लार्जर देन लाइफ बनाते हैं।

चलते चलो, चलते चलो
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ये देव आनंद के जीवन का फलसफा है। उनके करियर के कुछ खट्टे-मीठे-चरपरे संस्मरण :
* राजकपूर जैसे दोस्त के साथ देव साब ने एक भी फिल्म में काम नहीं किया।
* दिलीपकुमार के साथ वे सिर्फ इंसानियत फिल्म में आए थे।
* किशोर कुमार की आवाज उधार लेकर देव ने अपनी शिखर यात्रा तय की।
* फिल्म आनन्द और आनन्द में देव ने अपने बेटे सुनील को लाँच किया, मगर वे सफल नहीं हुए।
* देव आनन्द कभी पार्टी नहीं देते और दूसरों की पार्टी में भी कभी कभार ही जाते हैं।
समय ताम्रकर|
धोबी की दिलचस्प भूल!
* देव आनंद ने कई लड़कियों को बतौर हीरोइन अपनी फिल्मों में मौका दिया है।



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