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विनोद खन्ना : “सुपरस्टार” से “सेक्सी संन्यासी” तक

Updated: गुरुवार, 27 अप्रैल 2017 (15:56 IST)
एक शब्द है “योगभ्रष्ट”। यह उनके लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो एक बार संन्यस्त होकर पुन: गृहस्थ बन जाते हैं। योगभ्रष्ट गृहस्थ को सामान्य गृहस्थ से भी अधिक पतित माना जाता है, क्योंकि वह ऊंचाई से नीचे गिरा होता है।
 
विनोद खन्ना को भी वैसा ही एक “योगभ्रष्ट” माना जा सकता है। अस्सी के दशक में जब वे अपने अभिनय करियर के चरम पर थे, जब उन्हें अमिताभ बच्चन के सामने नंबर दो का अभिनेता माना जा रहा था, तब वे सब छोड़छाड़कर ओशो रजनीश के संन्यासी बन गए और विनोद खन्ना से स्वामी विनोद भारती कहलाने लगे। 
 
विनोद अकेले नहीं थे। महेश भट्ट भी तब ओशो के संन्यासी बने थे। कहा तो यह भी जाता है कि महेश भट्ट ने ही विनोद खन्ना को संन्यासी बनने के लिए राज़ी किया था। तब विनोद की मां की मृत्यु हुई थी और उससे वे भीतर से हिल गए थे। उन्हें अपने भीतर आध्यात्मिकता की प्यास महसूस हुई और वे बंबई छोड़कर अमरीका के ओरेगोन स्थित रजनीशपुरम् आश्रम चले गए। इस आश्रम को “रैंचो रजनीश” भी कहा जाता था। रैंच फ़ॉर्महाउस के लिए अमरीकी काऊबॉय डिक्शनरी का शब्द है। गबरू और हैंडसम स्वामी विनोद भारती रैंच में रजनीश की माला पहने घूमते थे। इसीलिए मीडिया ने उन्हें “सेक्सी संन्यासी” की संज्ञा दी थी।
 
कहा जाता है कि विनोद खन्ना ने अपने सुपरस्टारडम को दांव पर लगा दिया था। अगर देखा जाए तो बीटल्स इससे भी बड़े ग्लोबल सितारे थे और वे भी महर्ष‍ि महेश योगी के प्रभाव में आकर सबकुछ छोड़कर भारत में चले आए थे। सत्तर और अस्सी के दशक में तब दुनिया में जो “काउंटर कल्चर” मूवमेंट चल रहा था, भारतीय आध्यात्म‍िता की ओर झुकाव उसका एक अहम हिस्सा था और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि विनोद खन्ना भी इसी लहर में बह गए थे।
 
जो एक बात विनोद खन्ना के व्यक्त‍ित्व में बराबर लक्ष्य की जा सकती है, वह यह है कि उनका चित्त कहीं भी स्थिर नहीं हो पाता था। बॉलीवुड में शीर्ष नायक का स्थान छोड़कर वे रजनीश आश्रम चले गए थे। यहां वे रजनीश के इतने क़रीबी बन गए कि रजनीश उन्हें पुणे आश्रम का कर्ताधर्ता बनाना चाहते थे। लेकिन आश्रम की हायरेर्की में शीर्ष स्थान पाने से ठीक पहले वे फिर फ़िल्मों में लौट आए। यहां लौटकर “फ़रिश्ते” जैसी दोयम दर्जे की फ़िल्में उन्होंने की, जिसमें अश्लील और द्व‍िअर्थी संवाद थे। तब विनोद की ख़ूब जगहंसाई हुई थी कि वे पांच साल के संन्यास के अनुभव से यही सीखकर किसी बुद्धू की तरह घर को लौटे हैं। 
 
विनोद ने राजनीति में भी हाथ आज़माया और गुरदासपुर से सांसद बने, लेकिन किसी भी एक स्थान पर टिककर नहीं रहने की उनकी फ़ितरत ने उन्हें यहां भी नुक़सान पहुंचाया। किसी भी क्षेत्र में शीर्ष स्थान प्राप्त करना विनोद की नियति ही नहीं थी।
प्रारंभ में जब विनोद खन्ना ओशो से जुड़े थे तो वे कोरेगांव पार्क पुणे स्थि‍त ओशो आश्रम में ध्यान करने के बाद फ़िल्मों में शूटिंग करने भी जाते थे। विनोद ने कहा है कि बंबई में सुपरस्टार होने के बावजूद आश्रम में माली का काम करना उनके अहंकार पर कड़ी चोट थी और उन्होंने इसका बहुत आनंद लिया। वे अकसर “समाधि टैंक” में चले जाते थे, जहां मां के गर्भ जैसी स्‍थिति बनाई जाती थी। विनोद ने कहा है कि वहां पर उन्हें अपने जन्‍म का अनुभव भी हुआ था।
 
आख़िरकार उन्होंने फ़िल्मी दुनिया को पूरी तरह अलविदा कह दिया। उसी दौरान रजनीश आश्रम भी पुणे के बजाय ओरेगान स्थानांतरित हुआ। विनोद ने रजनीशपुरम् के निर्माण में जुटकर काम किया था। वो एक नया शहर बसाने की तरह था। यहां भी उन्होंने बागवानी का ही काम सौंपा गया था। बहुधा ओशो विनोद को अपने पास बुलाते और उनसे कहते कि वे बॉलीवुड के अपने अन्य मित्रों को भी यहां बुलाएं और यहां का माहौल दिखाएं। यह स्पष्ट था कि ओशो को विनोद खन्ना जैसे ग्लैमरस शिष्यों की दरक़ार थी।
 
तीन-चार साल में विनोद मोहभंग की स्थिति में आ गए। इसकी शुरुआत रजनीशपुरम् के बिखराव से हुई, जिसने विनोद को अवसाद में धकेल दिया था। तब विनोद घंटों रोते रहते थे। अपने हाथों से बसाया गया शहर उनके सामने ध्वस्त हो रहा था। वो इसके लिए अपने करियर को दांव पर लगाकर आए थे और अब अचानक उनकी आंखों के सामने अंधकार छा गया था। तब ओशो ने उन्हें अपने पास बुलाया और कहा कि अगर यहां तुम्हारा मन नहीं लग रहा है तो पूना चले जाओ और एशिया की गतिविधियों का काम संभालो। विनोद ने इनकार करते हुए कहा, यह मेरे बस का रोग नहीं है। 
 
इसी मनोदशा में विनोद खन्ना ने फ़िल्मों में वापसी करने का निर्णय लिया। लेकिन पांच साल का अंतराल बॉलीवुड में बहुत होता है। यहां पूरी दुनिया ही बदल चुकी थी और नए सितारे उभर चुके थे। स्वयं अमिताभ बच्चन अब उतनी बड़ी ताक़त नहीं रह गए थे। इधर विनोद भी इस ग्‍लानि से घिर गए कि उन्होंने कठिन समय में ओशो को छोड़ दिया। शूटिंग के दौरान जब तक वे कैमरे के सामने होते, बिलकुल अच्‍छी हालत में होते, लेकिन मेकअप रूम में जाते ही रोना फूट पड़ता। उसी दौरान पत्रकारों ने यह कहना शुरू कर दिया कि विनोद खन्ना का दिमाग़ अब ठिकाने पर नहीं है। 
 
विनोद खन्ना बाद में ख़ुद को समझाने के लिए कहते रहे कि बंबई लौटते ही उन्होंने इंसाफ़, फ़रिश्ते, रिहाई, चांदनी जैसे सुपरहिट फ़िल्में दीं, उन्होंने पहले से भी बड़ा घर ख़रीदा और जितना गंवाया था, उससे दस गुना फिर से हासिल कर लिया, लेकिन वे अपने दिल में भीतर ही भीतर जानते थे कि शीर्ष नायक का जो पद उनके लिए सुरक्षित था, उन्होंने उसे हमेशा के लिए गंवा दिया था। लेकिन यही डावांडोल मन तो विनोद खन्ना के होने का मतलब था। कम से कम उन्होंने साहसी फ़ैसले तो लिए। इतने भर के लिए तो विनोद खन्ना को एक अभिनेता और एक संन्यासी से बढ़कर याद रखा ही जाना चाहिए। उनकी स्मृति को नमन।
लेखक के बारे में
सुशोभित सक्तावत

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