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कौन थे लुई ब्रेल, जानें नेत्रहीनों के मसीहा के बारे में

Written By WD Feature Desk
Updated: शनिवार, 6 जनवरी 2024 (12:49 IST)
Introduction of Louis Braill: प्रतिवर्ष 4 जनवरी को हम विश्व ब्रेल दिवस मनाते हैं, क्योंकि इस दिन लुई ब्रेल का जन्मदिन है। वह ब्रेल के आविष्कारक हैं। लुई ब्रेल का जन्म फ्रांस की राजधानी पेरिस से 40 किमी दूर कूपरे नामक गांव में 4 जनवरी 1809 में हुआ था। वे स्वयं एक दृष्टिहीन थे। सौम्य व्यक्तित्व और दयालु स्वभाव के लुई ब्रेल उत्कृष्ट पियानोवादक थे। ब्रेल लिपि के द्वारा उन्होंने दृष्टिहीनों के जीवन में जो प्रकाश पैदा किया उसके लिए वे सदैव याद किए जाते रहेंगे।
 
आइए जानते हैं उनके जीवन की खास बातें-
 
• मोनिक ब्रेल लुई की माता एक घरेलू महिला थी और पिता सायमन ब्रेल घोड़ों की जीन बनाने का एक कारखाना चलाते थे। 
 
• लुई ब्रेल 4 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे।
 
• आज हम ऐसे दृष्टिहीन लोगों को बहुत सामर्थ्य के साथ अनेक जगहों पर काम करते हुए देखते हैं, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। अंधे व्यक्ति या तो किसी के आश्रित होते थे या उन्हें भीख मांगकर अपना जीवन गुजारना पड़ता था। 
 
• लुई ब्रेल जब महज 3 साल के थे, तब एक दिन खेलते-खेलते उन्होंने जीन के लिए चाकू से चमड़ा काटने का प्रयास किया लेकिन चाकू आंख में जा लगा और लुई की एक आंख हमेशा के लिए दृष्टिहीन हो गई। उस आंख में हुए संक्रमण की वजह से कुछ दिनों बाद उन्हें दूसरी आंख से भी दिखना बंद हो गया और वे पूरी तरह दृष्टिहीन हो गए। लेकिन जल्द ही उन्होंने जीवन जीने के अपने नए तरीके में महारत हासिल कर ली। 
 
• लुई ब्रेल ने स्वयं एक दृष्टिहीन होने के बावजूद दृष्टिहीनों को पढ़ने-लिखने के योग्य बनाया। 
 
• सामान्य बच्चे या तो रोमन लिपि में पढ़ते हैं या देवनागरी लिपि में, लेकिन दृष्टिहीन बच्चों के पढ़ने के लिए लुई ब्रेल ने एक अलग लिपि विकसित की और उसे ब्रेल लिपि नाम मिला। 
 
• लुई के जीवन 7 वर्ष ऐसे ही गुजरे, 10 वर्ष की उम्र में उनके पिता ने उन्हें पेरिस के रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड चिल्डे्रन में भर्ती करवा दिया। उस स्कूल में वेलंटीन होउ द्वारा बनाई गई लिपि से पढ़ाई होती थी, पर यह लिपि अधूरी थी। 
 
• लुई ने यहां इतिहास, भूगोल और गणित में प्रावीण्य प्राप्त किया। इसी स्कूल में एक बार फ्रांस की सेना के एक अधिकारी कैप्टन चार्ल्स बार्बियर एक प्रशिक्षण के सिलसिले में आए और उन्होंने सैनिकों द्वारा अंधेरे में पढ़ी जाने वाली 'नाइट राइटिंग' या 'सोनोग्राफी' लिपि के बारे में बताया। 
 
• यह लिपि कागज पर अक्षरों को उभार कर बनाई जाती थी और इसमें 12 बिंदुओं को 6-6 की दो पंक्तियों को रखा जाता था, पर इसमें विराम चिह्न, संख्‍या, गणितीय चिह्न आदि का अभाव था। 
 
• प्रखर बुद्धि के लुई ने इसी लिपि को आधार बनाकर 12 की बजाय मात्र 6 बिंदुओं का उपयोग कर 64 अक्षर और चिह्न बनाए और उसमें न केवल विराम चिह्न बल्कि गणितीय चिह्न और संगीत के नोटेशन भी लिखे जा सकते थे। यही लिपि आज सर्वमान्य है। 
 
• मात्र 15 वर्ष के उम्र में लुई ने यह लिपि बनाई। इस‍ लिपि में स्कूली बच्चों के लिए पाठ्‍युपस्तकों के अलावा रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ प्रतिवर्ष छपने वाला कालनिर्णय पंचांग आदि उपलब्ध हैं। ब्रेल लिपि में पुस्तकें भी निकलती हैं। 
 
• लुई ब्रेल को बाद में उसी विद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्ति दी गई। व्याकरण, भूगोल, गणित में उन्हें महारत हासिल थी। लेकिन अच्‍छा काम करने वालों को शुरुआत में अक्सर उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, लुई ब्रेल के साथ भी यह हुआ। उनके जीवनकाल में ब्रेल लिपि को मान्यता नहीं मिली।
 
• सन् 1851 में उनकी तबियत बिगड़ने लगी और 6 जनवरी 1852 को मात्र 43 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। 
 
• उनकी मृत्यु के 16 वर्ष बाद सन् 1868 में 'रॉयल इंस्टिट्‍यूट फॉर ब्लाइंड यूथ' ने इस लिपि को मान्यता दी। 
 
• सन् 1824 में बनी यह लिपि दुनिया के लगभग सभी देशों में उपयोग में लाई जाती है। हमारे देश में भी ब्रेल लिपि को मान्यता प्राप्त है। 
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