महागठबंधन की जीत के 10 बड़े कारण

Last Updated: रविवार, 8 नवंबर 2015 (11:08 IST)
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के नेतृत्व में महागठबंधन को चुनकर जनता ने साबित कर दिया कि बिहार जिस ट्रेक पर चल रहा है, वही सही है। विकास के मुद्दे से अनर्गल चुनावी बयानबाजी तक हर मोर्चे पर महागठबंधन ने मोदी की टीम राजग का जमकर मुकाबला किया।
नीतीश के पास मोदी के हर वार का जवाबी तीर था जो सीधे निशाने पर लगा। चाहे लालू से गठबंधन की बात हो या मोदी के विकास पर करारे सवाल हर मोर्चे पर नीतीश भारी पड़े और मोदी की सभाओं में उमड़ी भीड़ को वोट में बदलने से रोक दिया। वे जनता को यह भी समझाने में सफल रहे हैं कि महागठबंधन जीता तो मुख्यमंत्री वे खुद होंगे और राजग जीता तो मोदी की कोई कठपुतली। आइए, नजर डालते हैं उन बातों पर जिसने नीतीश को मोदी के मायाजाल को तोड़ने में मदद की...
नीतीश कुमार की विकास पुरुष और सुशासन की छवि : इस चुनाव में नीतीश का विकास पीएम मोदी के विकास पर भारी पड़ गया। 10 साल से बिहार पर राज कर रहे नीतीश के काम से जनता खुश थी और उनके खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर भी नहीं थी। बिजली और सड़क के मुद्दे पर मतदाताओं को मोदी की बात से ज्यादा नीतीश के सुशासन में दम लगा। मोदी का 125 हजार करोड़ का पैकेज भी मतदाताओं के नीतीश का साथ भी मतदाताओं को नहीं लुभा पाया।
 
मुस्लिम-यादव समीकरण अटूट रहा : महागठबंधन की जीत में सबसे बड़ी भूमिका मुस्लिम-यादव मतदाताओं ने निभाई। लालू को साधने से यादव मतदाता पूरी तरह नीतीश के साथ हो गया। दूसरी ओर बीफ पर बवाल से मुस्लिम मतदाताओं ने भी भाजपा से दूरी बना ली। ओवैसी फैक्टर का यहां ज्यादा असर नहीं हुआ और मुस्लिम जनता पूरी तरह नीतीश के साथ खड़ी नजर आई।  
 
मोदी की अति सक्रियता का नकारात्मक असर : मोदी की अति सक्रियता ने बिहार के भाजपा नेताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। एक ओर नीतीश और लालू के रूप में बिहारी नेता दिखाई दे रहे थे तो दूसरी ओर भाजपा के पास सुशील कुमार मोदी, गिरिराजसिंह समेत कई दिग्गज होने के बावजूद किसी की उपस्थिति दिखाई नहीं दे रही थी। मोदी के करारे भाषणों ने माहौल को पूरी तरह नीतीशमय बना दिया। मोदी का डीएनए वाला बयान भी नीतीश को ऑक्सीजन दे गया और उन्हें मतदाताओं का भरपूर आशीर्वाद मिला। 
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