YES BANK में SBI के निवेश से क्या आपको डरना चाहिए?

पुनः संशोधित शनिवार, 7 मार्च 2020 (16:26 IST)
मोहम्मदशाहिद
बीबीसी संवाददाता
 
भारत के चौथे सबसे बड़े प्राइवेट बैंक 'यस बैंक' को से उबारने को लेकर शनिवार को स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (एसबीआई) ने अपनी नीति सामने रखी। भारत के सबसे बड़े बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि को लेकर आरबीआई की पुनर्गठन योजना पर एसबीआई की टीम काम कर रही है।
 
इस दौरान उन्होंने जानकारी दी कि एसबीआई यस बैंक में 49 फ़ीसदी तक हिस्सेदारी ख़रीद सकता है। रजनीश कुमार ने कहा कि ड्राफ़्ट योजना के तहत यस बैंक में 2,450 करोड़ निवेश किया जाएगा।
 
इसके अलावा उन्होंने बताया कि इस बैंक में निवेश करने को लेकर और भी कई संभावित निवेशक मौजूद हैं जिन्होंने एसबीआई से संपर्क किया है।
 
उन्होंने कहा कि जो भी निवेशक इस बैंक में निवेश करना चाहता है वो 5 फ़ीसदी से अधिक का निवेश कर सकता है।
 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ही तरह रजनीश कुमार ने यस बैंक के ग्राहकों को भरोसा दिलाया है कि उनका पैसा सुरक्षित है और वो चिंतित न हों।
 
एसबीआई क्यों कर रहा निवेश?
यस बैंक में वित्तीय संकट के बाद हाल ही में आरबीआई ने बैंक से नकद निकासी समेत कई अन्य पाबंदियां लगा दी थीं।
 
आरबीआई ने बैंक के ग्राहकों के लिए नकद निकासी की सीमा 3 अप्रैल तक 50 हज़ार रुपए तय कर दी है। साथ ही बैंक को बचाने के लिए एक ड्राफ़्ट पेश किया है जिसमें एसबीआई ने दिलचस्पी दिखाई है।
 
एसबीआई यस बैंक में आख़िर दिलचस्पी क्यों ले रहा है? आर्थिक मामलों के जानकार आलोक जोशी कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि एसबीआई को सरकार ने ऐसा करने को कहा है।
 
वो कहते हैं- यह कोई बिज़नेस का फ़ैसला नहीं है जिसमें प्रबंधन ने इसका फ़ैसला लिया हो। यस बैंक की स्थिति बहुत ख़राब है और अगर कठोर शब्दों में कहूं तो यह डूब चुका बैंक है। आरबीआई ने जो बैंक को उबारने के लिए प्रस्ताव दिया है। उसमें कहा गया है कि निवेशक बैंक होगा।"
आरबीआई और सरकार
आलोक जोशी कहते हैं, "आरबीआई ने यस बैंक के कामों पर अचानक पाबंदियां नहीं लगाई हैं बल्कि सरकार को अंदाज़ा था कि बैंक के हालात ख़राब हैं और इसलिए उसने उसके मैनेजमेंट को हटाकर अपने लोग वहां बैठाए हैं। अगर यह कोई छोटा-मोटा बैंक होता तो उसका किसी भी बैंक में विलय किया जा सकता था।"
 
बिज़नेस स्टैंडर्ड के कंसल्टिंग एडिटर शुभमय भट्टाचार्य भी इस बात पर सहमति जताते हैं कि यस बैंक को बचाने के सरकार ने निर्देश दिए हैं क्योंकि आरबीआई और सरकार के पास कोई और विकल्प नहीं हैं।
 
वो कहते हैं- "यस बैंक की आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब है कि फ़ंड हाउसेज़ उसे डिफ़ॉल्ट कैटेगरी में डाल रहे हैं और उसका कुल नेटवर्थ इस समय नेगेटिव है। इससे बैंक की स्थिति पता चलती है।"
 
"भारत में डूबते बैंक को सिर्फ़ सरकारी कंपनियां ही बचा सकती है क्योंकि यहां पर सरकार के पास किसी निजी बैंक को क़र्ज़ देने की क्षमता नहीं है। इस सूरत में सरकार के सामने एलआईसी, एसबीआई और पीएनबी जैसी कंपनियां होती हैं, जो डूबती कंपनियों को बचाने के लिए आगे आती हैं।"
 
एसबीआई पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा?
डूबती कंपनियों को संकट से उबारने के लिए सरकार अपनी बड़ी कंपनियों का इस्तेमाल करती रही है। एलआईसी उसका एक बड़ा उदाहरण है लेकिन अब सरकार एलआईसी को भी बेचने की तैयारी में है। क्या एसबीआई का भी इस तरह से इस्तेमाल करते हुए कल उसकी भी हालत ख़स्ता हो सकती है?
 
इस पर आलोक जोशी कहते हैं कि आगे कुछ भी हो सकता है जिसके बारे में अभी से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि की जानकारी सामने आने के बाद एसबीआई के शेयर्स पर फ़र्क़ पड़ा है।
 
वो कहते हैं- "जब यह ख़बर आई कि एसबीआई यस बैंक में निवेश कर सकता है, उसी दिन एसबीआई के शेयर्स में 12 फ़ीसदी की गिरावट आ गई। यह निवेशकों के डर के कारण हुआ। अंग्रेज़ी में कहते हैं, 'थ्रोइंग गुड मनी, आफ़्टर बैड' तो सरकार लाभ में चल रहे बैंक का पैसा, डूबते बैंक को बचाने में लगा रही है।"
 
एसबीआई के ग्राहकों को डरने की ज़रूरत?
एलआईसी को जब निजी कंपनियों को बेचने की बात आई तो उसके ग्राहकों में खलबली मच गई। अब एसबीआई के ग्राहकों को क्या इसको लेकर कुछ चिंतित होने की ज़रूरत है?
 
शुभमय भट्टाचार्य कहते हैं कि इससे बैंक के जमाकर्ता ग्राहकों को कोई ख़तरा नहीं है लेकिन एसबीआई के निवेशकों को ज़रूर है।
 
वो कहते हैं, "एसबीआई के निवेशकों को देखना होगा कि वो यस बैंक में 2,450 करोड़ रुपए का जो निवेश कर रहा है उसका रिटर्न कितना आता है। इसी तरह का प्रयोग अमेरिका में हो चुका है जब सिटी बैंक का राष्ट्रीयकरण किया गया था। सरकार के समर्थन से उसे चलाया गया और फिर बैंक अपनी पुरानी वाली स्थिति में आ गया था।"
 
यस बैंक को बंद क्यों नहीं किया जा सकता?
यस बैंक की इस स्थिति के लिए उसके संस्थापक राणा कपूर को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। उन पर आरोप है कि उन्होंने ख़ूब क़र्ज़ दिए जिसके बाद आज बैंक की यह स्थिति हो गई है।
 
तो बैंक को बंद क्यों नहीं किया जा सकता है? शुभमय भट्टाचार्य कहते हैं कि कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था अपने बैंकों को डूबने नहीं देती है, जो एक चलन है।
 
वो कहते हैं कि बाकी कितनी भी कंपनियां डूब जाएं लेकिन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बैंकों को डूबने नहीं दिया जाता है। वहीं, आलोक जोशी भी इसी बात को दोहराते हुए कहते हैं कि भारत के इतिहास में स्वतंत्रता से लेकर आज तक कोई भी बैंक बंद नहीं हुआ है, कुछ एक कॉपरेटिव बैंक डूबे हैं लेकिन सरकार उनमें भी कोशिश करती है कि किसी तरह जमाकर्ताओं का पैसा सुरक्षित रखा जाए।
 
वो कहते हैं कि इस बैंक में बहुत सारे लोग नौकरी कर रहे हैं और बहुत सारे लोगों का पैसा जमा है, इसके बंद होने का अर्थ यह होगा कि पूरे बैंकिंग सिस्टम में खलबली मच जाएगी इसलिए सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो इसको बचाए लेकिन सिर्फ़ यही बैंक को बचाने का इकलौता रास्ता है, यह अभी कहना मुश्किल है। कुल मिलाकर बैंक अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं जिन्हें बंद करना अर्थव्यवस्था के लिए ही नुक़सानदेह होता है।
 
बैंक कैसे बचाया जा सकता है?
आरबीआई की ड्राफ़्ट नीति में यस बैंक के सिर्फ़ 49 फ़ीसदी शेयर ही बेचे जाएंगे और उन शेयर्स में से 26 फ़ीसदी शेयर्स को तीन साल तक रखना ज़रूरी होगा जिसके बाद ही सभी शेयर्स बेचे जा सकते हैं। इन तीन सालों में क्या बैंक पूरी तरह सभी संकटों से उबर आएगा ये सबसे बड़ा सवाल है।
 
आलोक जोशी कहते हैं कि आरबीआई ने जो तीन साल की बैंक न छोड़ने की रोक लगाई है, उससे बहुत फ़र्क़ पड़ेगा। वो कहते हैं कि अगर एक-दो साल में ही बैंक को ठीक हालत में करने के बाद कोई निवेशक भागना चाहे तो वो भाग नहीं सकता है और सरकार एसबीआई को यह ज़िम्मेदारी इसलिए दे रही है क्योंकि बैंकिंग में उसकी बड़ी हैसियत है और उस पर भरोसा है।
 
इसके अलावा आलोक जोशी कहते हैं कि यस बैंक का नया मैनेजमेंट बोर्ड सबसे भरोसेमंद होना चाहिए, उसमें काम नए सिरे से शुरू हो जाए, पुराने लोन की वापसी हो जाए तो हो सकता है कि यस बैंक वापस खड़ा हो जाए।
 
कोरोना वायरस का अर्थव्यवस्था पर असर
आलोक जोशी कहते हैं, "एक बात साफ़ है कि कॉन्सेप्ट के लेवल पर यस बैंक बहुत नया और अच्छा बैंक माना जाता रहा है। नए ज़माने की कंपनियों और उसकी सैलरीड क्लास के खाते इस बैंक में हैं। इससे बैंक के बचने की उम्मीद है।" इस तरह की स्थिति में रहे एक बैंक को पहले भी बचाया जा चुका है।
 
शुभमय भट्टाचार्य कहते हैं कि सरकार ने एसबीआई, पीएनबी, एलआईसी की मदद से यूटीआई बैंक में निवेश किया था, जो आगे चलकर फ़ायदेमंद रहा और उसके निवेशकों ने उससे पैसा निकालने से भी मना कर दिया था।
 
शुभमय भट्टाचार्य कहते हैं कि यस बैंक को ख़तरे से बाहर निकालने में मैनेजमेंट की बहुत बड़ी भूमिका होगी। हालांकि, वो कहते हैं कि वैश्विक और देश के माहौल का भी यस बैंक पर काफ़ी असर डालेगा।
 
कोरोना वायरस ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ख़ासा असर डाला है। भारत की अर्थव्यवस्था भी इस समय खासी सुस्त है, जीडीपी की दर लगातार नीचे जा रही है। यस बैंक को आर्थिक संकट से उबारने में काफ़ी समय भी लग सकता है।

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