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उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में 'ग़रीबी' की चर्चा क्यों नहीं हो रही?

Written By BBC Hindi
Updated: गुरुवार, 2 दिसंबर 2021 (08:02 IST)
सरोज सिंह, बीबीसी संवाददाता
'वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, हम कहते हैं गरीबी हटाओ' कांग्रेस पार्टी का चुनावी नारा 1971 का है। इंदिरा गांधी की जीत में इस नारे के योगदान को सभी राजनीतिक विश्लेषकों ने एक सुर में स्वीकार भी किया।
 
आँकड़ों की माने तो उस दौर में भारत में ग़रीबी दर 57 फ़ीसदी थी। आगे चल कर इंदिरा गांधी ने इसी नारे को अपने 20 सूत्रीय कार्यक्रम का हिस्सा भी बनाया। लेकिन भारत से 'ग़रीबी हटाओ' के नारे के पचास साल बाद 2021 तक ग़रीबी नहीं हटी है।
 
हाँ, ग़रीबी को नापने के पैमाने और तरीकों में समय समय पर बदलाव ज़रूर हुआ है। नीति आयोग की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश, भारत का तीसरा सबसे ग़रीब राज्य है।
 
इस रिपोर्ट में पहले स्थान पर बिहार और दूसरे स्थान पर झारखंड है। यानी भारत में ग़रीबी में उत्तर प्रदेश का मुक़ाबला बिहार और झारखंड जैसे राज्य से है। उत्तर प्रदेश में अगले तीन महीने में चुनाव होने वाले हैं।
 
बावजूद इसके ग़रीबी सूचकांक की चर्चा जाति, जिन्ना, हिंदू, मुसलमान और तालिबान की तरह नहीं हो रही है। जो नारा 1971 में किसी पार्टी की जीत-हार तय कर पाया था, आज उस पर पार्टियाँ केवल ट्वीट कर रह जा रही हैं।
 
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इस रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए मोदी सरकार के किसानों की आय दोगुनी करने के वादे पर तंज कसा।
 
वहीं कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश का ग्राफ़ साझा करते हुए मोदी सरकार के विकास के मॉडल पर सवाल खड़े किए।
 
रिपोर्ट पर उत्तर प्रदेश सरकार कोई प्रतिक्रिया देने को मजबूर हो जाए, विपक्षी दल इतना भी नहीं कर पाए।
 
उत्तर प्रदेश सरकार में श्रम विभाग, सेवायोजन, शहरी रोजगार और गरीबी उन्मूलन विभागों के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य से इस बारे में बीबीसी ने सवाल पूछा लेकिन रिपोर्ट की जानकारी न होने का हवाला देकर उन्होंने जवाब नहीं दिया।
 
क्या है रिपोर्ट में ?
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव हों या फिर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी - दोनों नेताओं ने ट्वीट करते समय एक बात पर शायद ध्यान नहीं दिया। इस रिपोर्ट का नाम है। नेशनल मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स (MPI)। ये रिपोर्ट नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की 2015-16 की रिपोर्ट पर आधारित है।
 
यानी ये रिपोर्ट उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के कार्यकाल के बारे में नहीं बल्कि अखिलेश सरकार के कार्यकाल की गवाही दे रही हैं। रिपोर्ट में पाया गया है कि उत्तर प्रदेश में 37.78 फ़ीसदी आबादी ग़रीब है।
 
उत्तर प्रदेश के 71 ज़िलों में 64 ज़िले ऐसे हैं जहाँ का 'मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स' राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा है।
 
रिपोर्ट के मुताबिक़ खाना बनाने के लिए ईंधन की बात हो या फिर सैनिटेशन की सुविधा या फिर रहने के लिए घर - तीनों इंडिकेटर्स पर उत्तर प्रदेश की स्थिति दूसरे राज्यों के मुकाबले ज़्यादा ख़राब है। उत्तर प्रदेश की 60 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी को ये तीनों बेसिक बेसिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।
 
ये रिपोर्ट तीन मानदंडों पर आधारित है - स्वास्थ्य, शिक्षा और स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग यानी जीवन स्तर। इन तीनों क्षेत्रों में 12 इंडिकेटर्स को शामिल किया गया है। जैसे स्वास्थ्य में न्यूट्रिशन को, शिक्षा में स्कूल की अटेंडेंस को। उसी तरह से जीवन स्तर के बारे में बात करते हुए खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन और पानी जैसी सुविधा को देखा-परखा गया है।
 
ग़रीबी का आधार पैसा या जीवन स्तर
अकसर लोग समझते हैं कि ग़रीब होने का मतलब है लोगों के पास पैसा नहीं है। लेकिन नीति आयोग की 'ग़रीबी सूचकांक' पर ताज़ा रिपोर्ट प्रति व्यक्ति आय या फिर ग़रीबी रेखा से कितने लोग ऊपर हैं या कितने नीचे - इस आधार पर नहीं है।
 
भारत सरकार के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणब सेन कहते हैं, "ग़रीबी का सही आकलन इसी बात से लगाया जा सकता है कि अच्छा जीवन जीने के लिए आपके पास सारी सुविधाएँ है या नहीं। कुछ चीज़े ऐसी होती हैं जो आप पैसे से ख़रीद सकते हैं। कुछ चीज़ें है जो पैसे से नहीं ख़रीद सकते हैं।
 
मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स में उन चीज़ों के बारे में बताया गया है जो पैसा होने के बाद भी आप ख़ुद बेहतर नहीं कर सकते। जैसे पीने का साफ़ पानी। सरकार जब तक आपके इलाके में इसकी सुविधा मुहैया ना करा पाए, आपके लिए आसान सुविधापूर्ण जीवन जीना मुश्किल हो सकता है।
 
जैसे इलाके में स्कूल नहीं है तो आप कहाँ पढ़ने जाओगे, आपके इलाके में अस्पताल ना हो तो दिक़्क़त आएगी।
 
लेकिन ग़रीबी का पता लगाने के लिए ऐसे सूचकांक की ज़रूरत क्यों पड़ी?
 
इस सवाल के जवाब में प्रणब सेन कहते हैं, " सरकारें चाहें तो इन आंकड़ों के आधार पर नीति बनाए, किन क्षेत्रों में और पैसा और सुविधा देने की ज़रूरत है। इस सूचकांक का मकसद यही है।"
 
अब 'ग़रीबी हटाओ' चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता
जनसंख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा राज्य है और ग़रीबी सूचकांक में तीसरे नंबर पर है। रिपोर्ट ये भी कहती है कि ग़रीबी के मामले कमोबेश हर ज़िले का एक जैसा ही हाल है।
 
उत्तर प्रदेश की राजनीति को दशकों से कवर कर रहे पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, " आज जनता के बीच 'इंस्टेंट नूडल्स' हिट है। चुनाव के ठीक पहले 'फ्री बी' यानी मुफ़्त उपहार की घोषणा कर चुनाव जीतने का जमाना है। इसलिए जनता को लोन माफ़ी, मुफ़्त लैपटॉप, मुफ़्त राशन, मुफ़्त बिजली, पेंशन जैसी योजनाएँ भाने लगी है। इसकी शुरुआत दक्षिण भारत से हुई थी। बाद में उत्तर भारत में इसका चलन बढ़ गया है।"
 
"बहुत सालों बाद मैं देख रहा हूँ इस बार के चुनाव में महँगाई एक मुद्दा है। फिर वो गैस, तेल के बढ़े हुए दाम ही क्यों ना हो। लोग बेरोज़गारी से भी दुखी हैं। यूपीटीईटी के पेपर लीक होने के बाद यही वजह है कि मुख्यमंत्री ने एक ही महीने में दोबारा पेपर कराने की घोषणा उसी दिन कर दी। इन दिक़्क़तों के मूल में है तो ग़रीबी ही, लेकिन उसे ना तो जनता मुद्दा बना रही है ना कि विपक्षी दल"
 
मंगलवार को बीजेपी सासंद वरुण गांधी ने मंगलवार को अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है, जिसकी चर्चा सोशल मीडिया पर खूब हो रही है। ये लेख भारत बेरोज़गारी, बढ़ती महँगाई और कर्ज़ में डूबी जनता के लिए केंद्र सरकार के नीतिगत फैसलों को ज़िम्मेदार ठहराती है। वरुण ख़ुद उत्तर प्रदेश से सासंद हैं।
 
सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "उत्तर प्रदेश के ग़रीबी के आँकड़े तो कोरोना काल के पहले के हैं। 2015-16 में कोई महामारी नहीं थी। अगर उस वक़्त ये हाल था तो 2020 आते आते स्थिति और बदतर ही हुई है। ऐसा मेरा आकलन है। कुछ हद तक ये अब मानसिकता की भी बात हो गई है। लोग ग़रीबी को अपने भाग्य से जोड़ कर देख रहे हैं।"
 
इसी बात को प्रणब सेन दूसरे अंदाज़ में कहते हैं। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "लोगों को लगता है कि ग़रीबी के लिए वो ख़ुद ज़िम्मेदार है इसलिए इसे दुरुस्त करना लोगों का काम है। इस वजह से सरकार से सब ठीक करने की माँग नहीं करते।"
 
डॉ. अजय प्रकाश लखनऊ विश्वविद्यालय में बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के प्रोफ़ेसर है। चुनाव में फ्री बी की घोषणा और उसके प्रभाव पर उनका काम भी है।
 
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता में अदल बदल कर हर बार राजनीतिक दल घूम फिर कर आते-जाते रहते हैं। कभी कांग्रेस तो कभी बीएसपी, कभी समाजवादी पार्टी तो कभी बीजेपी। कोई राजनीतिक दल अगर 'ग़रीबी' को मुद्दा बनाती है, तो जीतने पर उस दिशा में उन्हें उतना काम भी करना पड़ेगा। 38 फ़ीसदी आबादी का ग़रीब होना बहुत बड़ा आँकड़ा है। इसे ठीक करने के लिए मेहनत भी लगेगी। लेकिन सभी राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं भी कम नहीं है। कोई इससे साथ बहुत दिन तक जुड़ के काम नहीं कर सकता।
 
यही वजह है कि ग़रीबी को दूसरे तरीके से ये पार्टियां अप्रोच करती है। कोई महिलाओं को 1000 रुपये महीना देने की बात करता है, तो कोई ग़रीब कल्याण योजना में मुफ़्त राशन।
 
दूसरी बात ये है कि इंदिरा गांधी से ज़माने से अब तक ग़रीबी मापने का पैमाना भी बदला है और परिभाषा भी बदली है।
 
पहले लोगों की बुनियादी ज़रूरत रोटी, कपड़ा और मकान होती थी। आज कपड़ा मिल जा रहा है, रोटी की व्यवस्था कई सरकारी योजनाओं से पूरा हो जा रही है।
 
आज केंद्र सरकार 8 लाख रुपये की सालाना आय वालों को भी आर्थिक रूप से पिछड़ा मान रही है। ईडब्लूएस नाम की नई कैटेगरी बना दी गई है।
 
इसलिए राजनीतिक दल अगर ये कहे कि हम आपको कपड़ा दे देंगे, तो जनता की वो ज़रूरत रह ही नहीं गई है। अब जनता को भी कैश ही हाथ में अच्छा लगता है। ये बड़ी वजह है कि गरीबी सूचकांक चुनावी मुद्दा नहीं बन रहा।"

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