जम्मू-कश्मीर से क्यों अलग होना चाहते थे लेह के लोग : ग्राउंड रिपोर्ट

BBC Hindi|
- कुलदीप मिश्र
"यूटी का मतलब क्या होता है?" "यूनियन टेरेटरी" इतना कहकर छह साल के उस बच्चे ने दौड़ लगा दी। लद्दाखवासियों के लिए (यूटी) की मांग एक पुराने नारे की शक़्ल में रही है, इसलिए इसका बुनियादी अर्थ समझने के लिए यहां के बाशिंदे नागरिक शास्त्र की किताबों पर निर्भर नहीं रहे। 5 अगस्त को भारत सरकार ने के अहम प्रावधानों को हटाने और को जम्मू-से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फ़ैसला किया।

अब कश्मीर के नीचे नहीं
बौद्ध बहुल आबादी वाले में लोगों की पहली साझी प्रतिक्रिया इस फ़ैसले के स्वागत की ही दिखती है। बाज़ारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई संदेश वाले बैनर लगे हुए हैं।

देहचिन लेह के मुख्य बाज़ार में सब्ज़ियां बेचती हैं। उनके खेत यहां से 10-15 मिनट की दूरी पर हैं। वो नहीं जानतीं कि यूटी मिलने से उनकी ज़िंदगी कैसे बदलेगी। पर कहती हैं कि इससे उनका परिवार और आस-पास के लोग बहुत ख़ुश हैं। टूटी-फूटी हिंदी में वो कहती हैं, "पहले हम लोग जम्मू-कश्मीर के नीचे बैठता था। अब अपनी मर्ज़ी का हो गया।"

कश्मीरियों के भेदभाव' से मुक्ति का भाव
लद्दाख के 'कश्मीर के नीचे बैठने' की 'पीड़ा' यहां बहुत लोगों की ज़ुबान पर है और लोग इसे अपनी संस्कृति के स्वतंत्र अस्तित्व का भावुक मसला बताते हैं।

वे मानते हैं कि कश्मीरी कल्चर, वहां के नेता और उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं का लद्दाख से, ख़ासतौर से लेह से कोई रिश्ता नहीं है। इसलिए उनके ख़ुश होने को इतना ही काफ़ी है कि वे 'कश्मीरी नेताओं की रहनुमाई' से मुक्ति पा गए हैं।

यहां बहुत लोग यह महसूस करते हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने से विकास योजनाओं और फंड के संबंध में उनके साथ भेदभाव होता रहा है।

किरगिस्तान में पूर्व भारतीय राजदूत, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक पी. स्तोबदान लेह के रहने वाले हैं और केंद्र शासित प्रदेश के मसले पर भी लिखते रहे हैं। वो मानते हैं कि लोग इसे एक ग़ुलामी की तरह देखते थे।

वो कहते हैं- जम्मू-कश्मीर की साठ फ़ीसदी ज़मीन लद्दाख में है लेकिन कश्मीर घाटी के 15 फ़ीसदी लोग लद्दाख का वर्तमान और भविष्य तय करते थे। शेख़ अब्दुल्ला या कोई भी हो, वो लद्दाख के लोगों के लीडर तो कभी नहीं थे। न कोई ख़ून का रिश्ता था, न आत्मीय संबंध था। लेकिन हर मंच पर वे लोग ही हमारा प्रतिनिधित्व करते थे। यह एक अन्याय था। यह यहां के लोगों के लिए अपमान की तरह था।

विकास, रोज़गार और उद्योगों की उम्मीदें
तो एक ख़ुशी स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्तित्व की बहाली की है और दूसरी ख़ुशी विकास और रोज़गार की नई उम्मीदों से जुड़ी है। लोग मानते हैं कि यूटी का दर्ज़ा मिलने के बाद यहां नए उद्योग आएंगे तो स्थानीय लोगों के लिए कमाई के साधन बढ़ेंगे।

ड्राइवर का काम करने वाले सोनम तरगेश को उम्मीद है कि जब तक उनके बच्चे बड़े होंगे, शायद यहां चंडीगढ़ के स्तर का एक डिग्री कॉलेज बन जाएगा, जहां से पढ़ाई करके उनके बच्चे बड़े शहरों के छात्रों से स्पर्धा कर सकेंगे। वे मानते हैं कि अभी लेह में जो डिग्री कॉलेज है, वहां पढ़ाई अच्छी नहीं होती। कई जानकार ये भी कहते हैं कि लद्दाख में कई प्राकृतिक संसाधन हैं। सौर ऊर्जा उत्पादन की अच्छी संभावनाएं हैं।

पी. स्तोबदान कहते हैं- "यहां जो पानी उपलब्ध है उससे जिस पैमाने पर बिजली बनाई जा सकती है, उस पैमाने पर नहीं बनाई जा रही। कुछ निजी शोध बताते हैं कि यहां 23 गीगावॉट की सौर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता है।" इसलिए वो ये मशविरा भी देते हैं कि निजी कंपनियों से पहले यहां सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को आना चाहिए।

थोड़ा-सा इतिहास
दसवीं से उन्नीसवीं सदी तक लद्दाख एक स्वतंत्र राज्य था। यहां 30-32 राजाओं का इतिहास रहा है, लेकिन 1834 में डोगरा सेनापति ज़ोरावर सिंह ने लद्दाख पर विजय प्राप्त की और यह जम्मू-कश्मीर के अधीन चला गया।

इसलिए लद्दाख अपनी स्वतंत्र पहचान को लेकर मुखर रहा है। यहां यूटी की मांग दशकों पुरानी है। लेकिन साल 1989 में इस मांग को कुछ सफलता मिली, जब यहां बौद्धों के प्रभावशाली धार्मिक संगठन लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (एलबीए) की अगुवाई में बड़े स्तर पर आंदोलन हुआ।

राजीव गांधी की सरकार इस पर बात करने को तैयार हुई। यूटी का दर्ज़ा तो नहीं मिला लेकिन बाद में 1993 में केंद्र और प्रदेश सरकार लद्दाख को स्वायत्त हिल काउंसिल का दर्ज़ा देने को तैयार हो गईं।

इस काउंसिल के पास ग्राम पंचायतों के साथ मिलकर आर्थिक विकास, सेहत, शिक्षा, ज़मीन के उपयोग, टैक्सेशन और स्थानीय शासन से जुड़े फ़ैसले लेने का अधिकार है जबकि लॉ एंड ऑर्डर, न्याय व्यवस्था, संचार और उच्च शिक्षा से जुड़े फ़ैसले जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए ही सुरक्षित रखे गए। यानी एक तरह से कुछ क्षेत्रों में लद्दाख को थोड़ी स्वायत्तता ज़रूर मिली और उसके बाद कई स्तरों पर यहां विकास की रफ़्तार में भी इज़ाफ़ा हुआ।

कुछ कन्फ्यूज़न भी, कुछ चिंताएं भी
लोगों को उम्मीद है कि विकास की ये रफ़्तार और बढ़ेगी जब स्थानीय मूल के एक उपराज्यपाल अपने मुख्य सचिव के साथ लेह या कारगिल में बैठेंगे। उन्हें यहां के समाज की बेहतर समझ होगी और वो केंद्र में उनके सच्चे प्रतिनिधि होंगे।

लेकिन जश्न और ख़ुशी के इस माहौल में लोगों की कुछ अस्पष्टताएं और चिंताएं भी नत्थी हैं जिनका ज़िक्र किए बिना बात अधूरी रहेगी। दिलचस्प बात ये है कि ये चिंताएं उन अधिकारों के संरक्षण से जुड़ी हैं, जो लद्दाख के लोगों को अनुच्छेद 370 के तहत ही मिलते थे। 370 के तहत बाहर के लोगों को यहां ज़मीन ख़रीदने की इजाज़त नहीं थी जो यहां के कारोबारी हितों का एक बड़ा 'सेफ़गार्ड' था।

अब यहां के होटल कारोबारी, दुकानदार और टैक्सी मालिक ख़ुशी तो ज़ाहिर करते हैं, पर लगे हाथ ये भी कहते हैं कि उनके कारोबारी हितों की रक्षा के लिए सरकार वैसे ही प्रावधान लाए जैसे पूर्वोत्तर भारत, हिमाचल प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में हैं। यानी 370 जैसा ही कुछ।

लेह के होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष त्सेवांग यांगजोर मानते हैं कि अगर अनुच्छेद 370 हटाए बिना लद्दाख को अलग यूटी बना दिया जाता तो यहां की बेहतरी के लिए अच्छा होता।

वो कहते हैं कि ऐसा होता तो हमारे कारोबारी हितों के लिए ज़रूर अच्छा होता। मैं कह नहीं सकता पर शायद सरकार की कुछ राजनीतिक दिक्क़तें रही होंगी।"

नमक में आटा और आटे में नमक
दोरजे नामग्याल वरिष्ठ नागरिक हैं और लेह के मुख्य बाज़ार में उनकी कपड़ों की दुकान है। वे मानते हैं कि सरकार के फ़ैसले से फ़ायदा और नुक़सान दोनों होगा।

वो कहते हैं- "फ़ायदा ये है कि यहां रोज़गार बढ़ेगा लेकिन नुक़सान ये है कि ख़र्च बढ़ेगा, किराया बढ़ेगा और आबादी बाहर से आएगी तो बाज़ार और रोज़गार की स्पर्धा बढ़ेगी।"

वह कहते हैं कि अभी ठीक से किसी को पता नहीं है कि यह फ़ैसला आगे चलकर क्या रूप लेगा। लेकिन चूंकि यूटी एक पुरानी मांग थी तो उसके पूरे होने पर लोग ख़ुश हैं लेकिन बहुत जानकारी किसी को नहीं है। अंतत: बात ज़मीन बचाने पर आ सिमटी है। यह भी साफ़ नहीं है कि उन स्वायत्त हिल काउंसिल्स का होगा, जिसने एक क़िस्म का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण किया था।

स्थानीय पत्रकार सेवांग रिंगज़िन यूटी आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं। वो कहते हैं कि यहां के लोग दशकों से यूटी की मांग कर रहे हैं लेकिन उनकी यूटी की परिकल्पना में विधानसभा की विदाई शामिल नहीं थी।

वो कहते हैं, "हिल काउंसिल मिलने के बाद तो जम्मू-कश्मीर स्टेट का ज़ुल्म ज़्यादा नहीं रह गया था। बीते 10-15 साल से 'यूटी विद विधानसभा' की मांग ही रही है।"

एक चिंता पर्यावरण को लेकर भी है। रिंगज़िन कहते हैं, "अब लद्दाख एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल बन चुका है। यहां का पर्यावरण काफ़ी नाज़ुक है जिसे लेकर लोग काफ़ी संवेदनशील हैं। ऐसा न हो कि बाहर से बड़ी आबादी के आने से कहीं लद्दाख की पहचान ख़त्म न हो जाए।"

पी. स्तोबदान इसे एक विशेष उपमा देते हैं। वो कहते हैं, "आटे में नमक मिले तो चलता है लेकिन नमक में आटा मिलेगा तो नमक का वजूद ख़त्म हो जाएगा। हमें भरोसा है कि सरकार हमें एक गर्म तवे से हटाकर, दूसरे गर्म तवे पर नहीं पटकेगी।"

विधानसभा न मिलने से लद्दाख चंडीगढ़ जैसा केंद्र शासित प्रदेश होगा, दिल्ली जैसा नहीं। हिल काउंसिल की भूमिका को लेकर अनिश्चितताओं के मद्देनज़र स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल भी हैं। लेह के रहने वाले रियाज़ अहमद केंद्र सरकार का शुक्रिया कहते हुए यह भी कहते हैं कि हिल काउंसिल्स का ताक़त बनाए रखी जाए और हो सके तो यहां विधानसभा भी दी जाए।

रियाज़ कहते हैं, "हम पांच छह महीनों के लिए दुनिया से कट जाते हैं और हमारी सीमा चीन और पाकिस्तान दोनों से मिलती है। हालात मुश्किल होते हैं और कुछ जगहों पर लोग माइनस 32 डिग्री सेल्सियस में भी रहते हैं। ये सब बातें श्रीनगर और दिल्ली में बैठकर समझना मुश्किल हो जाता है। इसलिए हमारे स्थानीय प्रतिनिधियों की हुक़ूमत ही होनी चाहिए।"

फ़ैसले से ख़ुश, अब 'आगे क्या?
केंद्र सरकार के फ़ैसले को अब क़रीब 15 दिन होने को हैं। तो शुरुआती स्वागत के साथ अब यहां 'आगे क्या' की बहसें भी हो रही हैं। कई अकादमिक, कारोबारी और दूसरे मंचों पर लोग मिलकर ये चर्चा कर रहे हैं कि वे किस तरह का यूटी चाहते हैं। उद्योगों और कंपनियों के 'फ़्री फ़्लो' को लेकर एक अनिच्छा यहां के सांस्कृतिक संगठनों और कारोबारी वर्ग में साफ़ दिखती है।

एक टैक्सी मालिक को लगता है कि जब मोबाइल एप्लीकेशन से टैक्सी देने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनियां यहां आ जाएंगी तो वह उनसे स्पर्धा नहीं कर पाएगा। एयरपोर्ट और मुख्य बाज़ार के बीच तीन किलोमीटर की दूरी का यहां के टैक्सी वाले चार सौ रुपये ले लेते हैं। दिल्ली में आप अधिकतम 100 रुपए में ये सफ़र कर सकते हैं।

लेकिन यह बात भी सही है कि अभी इन्हें चिंताओं के स्वर कहना ही सही है। ये स्वर नाराज़गी के नहीं है। कुछ अस्पष्टताओं के बावजूद लेह वासियों को यही लगता है कि उनका कोई सपना अचानक पूरा हो गया है और इसके साथ आई चिंताओं के हल के लिए भी सरकार की ओर वे उम्मीदों से देख रहे हैं।


और भी पढ़ें :