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इसराइली अरब कौन हैं, कैसी है उनकी ज़िंदगी और फ़लस्तीनी पहचान

Written By BBC Hindi
Updated: सोमवार, 17 मई 2021 (20:00 IST)
इसराइल और फ़लस्तीनी क्षेत्र में पिछला सप्ताह काफ़ी हिंसक रहा। कई दिनों के संघर्ष और अशांति के बाद इसराइल ने लोड शहर में इमरजेंसी लगाने की घोषणा की थी। आरोप ये था कि इस शहर में इसराइली अरबों ने दंगे भड़काए। यह इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच बढ़ते तनाव में एक महत्वपूर्ण क्षण है, क्योंकि यह पहली बार है जब एक इसराइली सरकार ने वर्ष 1966 के बाद अपने ही देश के एक अरब समुदाय पर आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल किया है। तो आप इन इसराइली अरब लोगों के बारे में जानना चाहेंगे कि ये कौन हैं?

इसराइली अरबों का इतिहास
आपने इसराइल को यहूदियों के देश के रूप में अवश्य सुना होगा, लेकिन ये ग़ैर यहूदियों का भी देश है। इसराइल में इसराइली अरब समुदाय भी है, जिनकी विरासत तो फ़लस्तीनियों वाली है, लेकिन उनकी नागरिकता इसराइल की है।

इसराइल की आबादी 90 लाख से कुछ ज़्यादा है और इनमें से क़रीब 19 लाख लोग इसराइली अरब हैं। साल 1948 में इसराइल के गठन के बाद कई फ़लस्तीनी यहीं रह गए, जबकि क़रीब साढ़े सात लाख लोग या तो निकाल दिए गए या युद्ध के कारण पलायन को मजबूर हो गए।

जिन्होंने इसराइल छोड़ा, वे इसराइल की सीमा से लगे पश्चिमी तट और ग़ाज़ा के शरणार्थी कैंपों में रहने लगे। जो इसराइल में रह गए, वो अपने को इसराइली अरब, इसराइली फ़लस्तीनी या सिर्फ़ फ़लस्तीनी कहने लगे। इसराइली अरबों में बहुसंख्यक मुस्लिम हैं, लेकिन बाक़ी फ़लस्तीनी समाज की तरह इनमें दूसरा बड़ा समूह ईसाइयों का है।

25 जनवरी 1949 में इसराइल में पहला चुनाव हुआ था, उसी समय से इन इसराइली अरबों को मताधिकार मिला हुआ है। हालांकि उनका कहना है कि दशकों से इस देश में वे व्यवस्थागत प्रताड़ना का शिकार हैं।

एकीकरण
इसराइल में अरब और यहूदी समुदाय सार्वजनिक स्थानों पर अक्सर एक साथ कम ही दिखाई देते हैं, लेकिन कोरोना संकट के दौरान एक सकारात्मक प्रभाव ये था कि दोनों समुदायों के बीच सहयोग देखने को मिला था।

दोनों समुदायों का एकीकरण नेशनल हेल्थ केयर सिस्टम में भी देखने को मिलता है, जहां यहूदी और अरब मरीज़ों का इलाज एक अस्पताल में होता है और उन्हें एक ही डॉक्टर देखते भी हैं। इसराइल में 20 फ़ीसदी डॉक्टर्स, 25 फ़ीसदी नर्स और 50 फ़ीसदी फार्मासिस्ट इसराइली अरब हैं।

लेकिन एक साझा राष्ट्रीय पहचान, जो इसराइल के अरब और यहूदी नागरिकों को मिलाती हो, उसे ढूंढ निकालना मुश्किल है। उदाहरण के लिए इसराइली समाज में सेना केंद्रीय भूमिका निभाती है। यहूदी नागरिकों के लिए सेना में जाना अनिवार्य है। लेकिन अरबों को इसमें नहीं रखा गया है।

भेदभाव
इसराइली अरबों का कहना है कि उन्हें अपने ही देश में व्यवस्थागत प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी इसका समर्थन करते हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इसराइल अपने यहां रह रहे फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ संस्थागत भेदभाव करता है।

अप्रैल 2021 में आई ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इसराइली अधिकारी अपने देश में रह रहे फ़लस्तीनियों के साथ-साथ पश्चिमी तट और ग़ज़ा में रहने वाले फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ रंगभेद अपनाते हैं, जो मानवता के ख़िलाफ़ अपराध है।

हालांकि इसराइली विदेश मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को बेतुका और झूठ कहकर ख़ारिज कर दिया था। इसराइली अरबों का कहना है कि सरकार का उनकी स्वामित्व वाली ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने का लंबा इतिहास रहा है। वे यहूदी अधिकारियों पर राष्ट्रीय बजट में उनके साथ व्यवस्थित रूप से भेदभाव करने का आरोप भी लगाते हैं। देश में दोनों समूहों के लिए क़ानून अलग हैं।

'दूसरे दर्जे के नागरिक'
उदाहरण के लिए नागरिकों की योग्यता को लेकर इसराइली क़ानून यहूदी लोगों के पक्ष में है, जो अपने आप इसराइली पासपोर्ट हासिल कर सकते हैं, चाहे वे कहीं से आए हों। लेकिन ये स्थिति निष्कासित फ़लस्तीनियों और उनके बच्चों के लिए नहीं है। उन्हें इस अधिकार से वंचित रखा गया है।

वर्ष 2018 में इसराइली संसद ने एक विवादित 'नेशन-स्टेट लॉ' पास किया, जिसने अरबी की आधिकारिक भाषा का दर्जा ख़त्म कर दिया। पहले अरबी को हिब्रू के साथ आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल था। संसद ने राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार को यहूदियों के लिए विशिष्ट घोषित कर दिया।

एक अरब इसराइली सांसद अयमान ओदेह ने कहा कि जिस समय देश ने 'यहूदी वर्चस्व' का क़ानून पारित किया था, उन्होंने इसराइली अरबों को ये बता दिया था कि वे इस देश में हमेशा दूसरे दर्जे के नागरिक बने रहेंगे। इस बीच इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने नागरिक अधिकार सुनिश्चित करने का वादा किया था, लेकिन ये भी कहा कि ये सब बहुमत ही तय करता है।

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