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सुधा मूर्ति और संभाजी भिड़े की मुलाक़ात का पूरा मामला क्या है

Written By BBC Hindi
Updated: गुरुवार, 10 नवंबर 2022 (08:06 IST)
इकबाल अहमद, बीबीसी संवाददाता
लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा मूर्ति का एक वीडियो वायरल हो रहा है। उस वीडियो में वो हिंदुत्ववादी नेता संभाजी भिड़े के पैर छूती हुई नज़र आ रही हैं।
 
क्या है पूरा मामला?
सुधा मूर्ति एक जानी मानी लेखिका हैं और उनकी कई किताबों का मराठी में अनुवाद हुआ है। सुधा मूर्ति मराठी में छपी अपनी कुछ किताबों के प्रचार के लिए सोमवार (सात नवंबर, 2022) को महाराष्ट्र के सांगली में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुई थीं।
 
वहां संभाजी भिड़े भी अपने कई समर्थकों के साथ मौजूद थे। उसी जगह उनकी मुलाक़ात संभाजी भिड़े से हुई और उसी वक़्त की तस्वीरें और एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
 
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, हाल ही में भिड़े ने एक महिला पत्रकार से इसलिए बात करने से इनकार कर दिया था क्योंकि उनके माथे पर बिंदी नहीं थी। भिड़े ने कथित तौर पर महिला पत्रकार से कहा था कि वो उनसे बात करने से पहले बिंदी लगाएं क्योंकि उनके अनुसार माथे पर बिंदी नहीं लगाने से वो महिला एक विधवा की तरह लग रही थीं।
 
राज्य महिला आयोग ने इस मामले में संभाजी भिड़े को एक नोटिस भी जारी किया था। सुधा मूर्ति की तरफ़ से इस बारे में अभी तक कोई बयान नहीं आया है।
 
आयोजक का दावा, फिर पोस्ट हटा दिया
सांगली में कार्यक्रम के आयोजक और सुधा मूर्ति की किताबों को मराठी में प्रकाशित करने वाले मेहता पब्लिशिंग हाउस की संपादकीय प्रमुख योजना यादव ने इस पूरी घटना के बारे में फ़ेसबुक पर विस्तार से लिखा था। उन्होंने दावा किया था कि स्थानीय पुलिस ने सुधा मूर्ति पर दबाव डाला था कि वो संभाजी भिड़े से मुलाक़ात कर लें।
 
योजना यादव के अनुसार, सुधा मूर्ति ने किसी से भी मिलने से इनकार कर दिया था, लेकिन भिड़े के समर्थक बिना किसी निमंत्रण के कार्यक्रम में पहुंच गए थे।
 
यादव के अनुसार, 'सभागार के बाहर बड़ी संख्या में भिड़े के समर्थकों की मौजूदगी से स्थानीय पुलिस दबाव में आ गई और हमसे भिड़े को मूर्ति से मिलने देने का अनुरोध किया, उस दौरान सुधा मूर्ति पाठकों से बातचीत कर रही थीं।'
 
योजना यादव ने लिखा कि दबाव इतना अधिक था कि नाराज़ सुधा मूर्ति को अपने पाठकों के साथ बातचीत बंद करनी पड़ी और भिड़े से मिलने के लिए वो बाहर चली गईं।
 
योजना यादव ने दावा किया कि वह नहीं जानती थीं कि भिड़े कौन हैं? इसलिए उन्होंने मुझसे उनकी उम्र पूछी। उन्होंने कहा कि वह बड़ों के सम्मान में उनके सामने झुकती हैं।
 
यादव ने यह भी लिखा था कि उन्होंने बाद में सुधा मूर्ति को आगाह किया कि भिड़े के साथ उनकी मुलाक़ात के दृश्य का इस्तेमाल प्रोपेगेंडा के लिए किया जा सकता है।
 
पुलिस का इनकार
लेकिन श्री शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान संगठन के सांगली प्रमुख हनुमंत पवार ने योजना यादव के सभी दावों को ख़ारिज कर दिया है। उन्होंने बीबीसी मराठी से बात करते हुए कहा कि कुछ साल पहले सुधा मूर्ति ने संभाजी भिड़े से मुलाक़ात करने के लिए कहा था, लेकिन किसी कारण मुलाक़ात नहीं हो सकी।
 
पवार ने कहा कि सुधा मूर्ति सोमवार को सांगली आईं तो संभाजी से उनकी मुलाक़ात हुई। पवार के अनुसार, अगर सुधा मूर्ति संभाजी से नहीं मिलना चाहतीं तो वो बग़ैर मिले भी जा सकती थीं।
 
सांगली पुलिस स्टेशन प्रमुख अभिजीत देशमुख ने बीबीसी मराठी को बताया कि सुधा मूर्ति एक जानी मानी महिला हैं इसलिए पुलिस ने उनके कार्यक्रम को देखते हुए पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती की थी।
 
अभिजीत देशमुख ने इस बात से साफ़ इनकार किया कि पुलिस ने आयोजकों या सुधा मूर्ति पर किसी तरह का दबाव बनाया कि वो संभाजी भिड़े से मिल लें। इस बीच योजना यादव ने अपना फ़ेसबुक पोस्ट डिलीट कर दिया है।
 
वायरल होने का कारण
सुधा मूर्ति और संभाजी की इस मुलाक़ात की चर्चा इसलिए जी ज़्यादा हो रही है क्योंकि संभाजी भिड़े एक हिंदू दक्षिणपंथी नेता हैं और सुधा मूर्ति टेक कंपनी इंफ़ोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की पत्नी और ब्रिटेन के मौजूदा प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की सास हैं।
 
जानी मानी समाज सेविका और लेखक ज्योति पुनियानी ने ट्वीट करके पूछा, “सुधा मूर्ति ने भीमा-कोरेगांव हिंसा के मुख्य अभियुक्त संभाजी भिड़े के साथ अपनी तस्वीर क्यों ट्वीट की?”
 
शेफ़ाली वैद्द ने वीडियो को ट्वीट करते हुए लिखा है, “सुधा मूर्ति भिड़े गुरुजी से मुलाक़ात के वक़्त पूरी तरह सहज दिख रही हैं। लेकिन योजना यादव फ़ेक पोस्ट में लिखती हैं कि भिड़े गुरुजी से मिलने के लिए उनपर दबाव डाला गया था। और जब उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया है तो उन्होंने अपना पोस्ट हटा दिया। मोहम्मद ज़ुबैर भी फ़ेक पोस्ट को शेयर करते हैं।”
 
एक ट्विटर यूज़र ने पूछा है, “सुधा मूर्ति क्या कर्नाटक बीजेपी में शामिल हो रही हैं? अगर ऐसा होता है तो इस धरती पर सबसे शक्तिशाली मूर्ति परिवार का हिस्सा हो जाएंगी अगर वो अब तक नहीं हैं तो।”
 
एक यूज़र ने लिखा है, “सुधा मूर्ति बच्चों के लिए एक किताब लिखेंगी जिसका नाम होगा ‘बाल भिड़े’। इसके ज़रिए वो अपने दामाद ऋषि सुनक के लिए भारत के रुढ़िवादियों का समर्थन जुटाएंगी।”
 
लेकिन एक दूसरे यूज़र ने सुधा मूर्ति और संभाजी भिड़े की तारीफ़ करते हुए ट्वीट किया है, “यह वास्तविक मानवता है। एक शक्तिशाली, सम्मानित, सफल और प्रेरणादायक व्यक्तित्व की मालकिन एक दूसरे बुज़ुर्ग, पिता-तुल्य, शक्तिशाली, प्रेरणादायक और सादा जीवान गुज़ारने वाले व्यक्ति से आशीर्वाद लेते हुए।”
 
कौन हैं संभाजी भिड़े?
सांगली ज़िले के रहने वाले 84 वर्षीय संभाजी भिड़े श्री शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान नाम के एक संगठन के संस्थापक हैं। भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के मामले में पुणे के पिंपरी पुलिस स्टेशन में उनके ख़िलाफ़ केस भी दर्ज किया गया था।
 
उनका असली नाम मनोहर है। उनका पैतृक गांव सतारा ज़िले का सबनिसवाड़ी है। सांगली में एक ज़माने में आरएसएस के बड़े कार्यकर्ता बाबाराव भिड़े थे। संभाजी उनके भतीजे हैं जो 1980 के दशक में ख़ुद आरएसएस में थे और इनकी शिक्षा एमएससी तक हुई है।
 
संभाजी भिडे ने वहां आरएसएस का संगठन स्तर पर काम शुरू किया था, लेकिन कुछ विवाद की वजह से उनका तबादला कर दिया गया। उन्होंने वह स्वीकार नहीं किया और सांगली में एक समानांतर आरएसएस का गठन किया।
 
विजयादशमी पर होने वाली आरएसएस की रैली के जवाब में संभाजी ने दुर्गा माता दौड़ शुरू की थी। बाद में जब रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू हुआ तब इनके संगठन को ज़्यादा समर्थन मिलना शुरू हुआ।
 
हिंदुत्ववादी शक्तियां जिस तरह से छत्रपति शिवाजी और छत्रपति संभाजी का इतिहास पेश करती हैं उसी तरीके से भिड़े भी पेश करते हैं। राजनीति क्षेत्र में जिन अलग-अलग समूहों के लोगों को प्रतिष्ठा चाहिए उन्होंने इस संगठन का दामन थाम लिया। भिड़े काफ़ी साधारण तरीक़े से जीवन बिताते हैं। उनके खाने और रहने का इंतज़ाम उनके कार्यकर्ताओं के ज़िम्मे रहता है। वह सफ़ेद रंग का धोती-कुर्ता पहनते हैं और चप्पल नहीं पहनते हैं।
 
सांगली ज़िले से भिडे के संगठन के दो कार्यकर्ता हर रोज़ रायगढ़ क़िले में शिवाजी की पूजा के लिए जाते हैं। शिव प्रतिष्ठान की वेबसाइट पर बताया गया है कि उनके संगठन की स्थापना 1984 में हुई है। इसमें संगठन का उद्देश्य बताया गया है कि उनका लक्ष्य हिंदुओं को शिवाजी और संभाजी के ब्लड ग्रुप का बनाना है।
 
रायगढ़ क़िले पर इन्होंने सोने का सिंहासन बनाने का संकल्प किया है जिसमें क़रीब 144 किलोग्राम सोना इस्तेमाल होगा। 2009 में इस संगठन ने दूसरे संगठनों के साथ मिलकर जोधा-अकबर फ़िल्म का विरोध किया था, जिसके बाद सांगली, सतारा, कोल्हापुर ज़िलों में काफ़ी हिंसा हुई थी।
 
2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और भिडे की मुलाक़ात रायगढ़ क़िले पर हुई थी।

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