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धनवान सऊदी अरब बलवान क्यों नहीं बन पा रहा?

Updated: मंगलवार, 28 अगस्त 2018 (14:06 IST)
- टीम बीबीसी हिन्दी (नई दिल्ली)
 
यमन मध्य-पूर्व का एक छोटा-सा ग़रीब देश है। इसके ख़िलाफ़ अरब के अमीर देश सालों से यु्द्ध कर रहे हैं। यमन के ख़िलाफ़ सऊदी अरब इस युद्ध का नेतृत्व कर रहा है। सऊदी के पास यमन में उसके दुश्मनों की तुलना में ज़्यादा बेहतर हथियार हैं, लेकिन हैरान करने वाली बात है कि वो इस युद्ध को जीतने के बजाय लगातार उलझता जा रहा है।
 
 
सऊदी का दक्षिणी प्रांत नजरान यमन की सीमा से लगा है। कर्नल मसूद अली अल-शवाफ़ यहां से यमन के ख़िलाफ़ ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने ब्लूमबर्ग से कहा है कि इस युद्ध के शुरू होने के बाद से ख़तरे बदल गए हैं। उन्होंने कहा कि सऊदी को जो नुक़सान उठाने पड़ रहे हैं इससे भी ये साबित होता है कि यह कोई एकतरफ़ा युद्ध नहीं है।
 
 
आख़िर ऐसा क्यों है?
सऊदी के पास पैसे की कमी नहीं है, अत्याधुनिक हथियार हैं फिर भी उसकी सेना यमन से युद्ध क्यों नहीं जीत पा रही है? सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है कि वो तेल के बेशुमार पैसे को आर्मी की ताक़त के रूप में तब्दील करे। सऊदी के बारे में कहा जाता है कि वो पैसे से सब कुछ नहीं ख़रीद सकता। इसलिए यह बात भी कही जाती है कि वो धनवान तो है पर बलवान नहीं।
 
 
कमज़ोर सेना क्यों?
मध्य-पू्र्व मामलों के विशेषज्ञ क़मर आगा कहते हैं कि सऊदी की सेना बहुत कमज़ोर है। उसे कोई ट्रेनिंग नहीं है कि अत्याधुनिक हथियारों को चला सके। वो कहते हैं कि ''इसकी एक मुख्य वजह ये भी है कि सऊदी का शाही परिवार इस बात से डरा रहता है कि आर्मी मज़बूत हुई तो तख्तापलट भी हो सकता है। इसलिए सऊदी अपनी सुरक्षा और सेना की ज़रूरतों के लिए अमेरिका और पाकिस्तान पर निर्भर रहता है।''
 
 
यमन के ख़िलाफ़ लड़ाई में सऊदी कितना खर्च कर चुका है इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। लेकिन पिछले दो सालों में सऊदी के कुल विदेशी धन में 200 अरब डॉलर की गिरावट से साफ़ है कि उसे जमकर आर्थिक नुक़सान हो रहे हैं। सऊदी अरब ने यमन में मार्च 2015 में हस्तक्षेप शुरू किया था। सऊदी के नेतृत्व वाले सैनिकों ने हवाई हमले शुरू किए थे और छोटी संख्या में ज़मीन पर भी अपने सैनिकों को भेजा था।
 
 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसी साल मार्च महीने में कहा था कि सऊदी अरब अमेरिकी हथियारों का बड़ा ख़रीदार है। पिछले साल अमेरिका ने सऊदी को हथियारों की ख़रीद पर 3.5 अरब डॉलर की छूट दी थी। यह छूट 15 अरब डॉलर के एंटी-मिसाइल सिस्टम पर थी। अगर सऊदी के पास अमेरिका के इतने अच्छे हथियार हैं तो उसकी सेना कमज़ोर क्यों है? सऊदी का शुमार दुनिया के उन देशों में है जो रक्षा पर मोटी रक़म खर्च करता है।
 
 
वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट में इराक़, ईरान और फ़ारस की खाड़ी के सैन्य और रक्षा विशेषज्ञ माइकल नाइट्स का कहना है, ''यह सच है कि ईरान सऊदी से सैन्य ताक़त के मामले में आगे है।'' वो कहते हैं, ''ईरान की सेना में आपको कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो ज़मीन पर कहता हो कि उसे सऊदी की सेना से डर लगता है। इसे यमन में सऊदी के सैन्य हमले से भी समझा जा सकता है। कई सालों से युद्ध जारी है, लेकिन सऊदी को कुछ हासिल नहीं हुआ।''
 
 
आर्मी पर बेशुमार खर्च करने वाला देश सऊदी
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी की सेना बहुत बड़ी है इसलिए यहां गुणवत्ता पर ज़ोर कम है। दूसरी समस्या यह है कि सऊदी की सेना आज भी पारंपरिक युद्ध के हिसाब से ही तैयार है और उसे 21वीं सदी के प्रॉक्सी वॉर का सामना करना हो तो फंस जाएगी। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार सऊदी 2015 और 2016 में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था। 2002 के बाद सऊदी के हथियार आयात में 200 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
 
 
ऐसा भी नहीं है कि सऊदी कम गुणवत्ता वाले हथियारों को ख़रीदता है। सऊदी का ज़्यादातर हथियार सौदा अमेरिका से है। यहां तक कि 2016 में अमेरिका ने अपने कुल हथियारों की बिक्री का 13 फ़ीसदी सौदा सऊदी अरब से किया। सऊदी के रॉयल एयरफ़ोर्स के पास यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून भी हैं। इसके साथ ही अमेरिकी एफ़-15 इगल्स भी हैं। ये सभी अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हैं। सऊदी का शुमार उन देशों में है जिनके पास बेहतरीन हथियार हैं।
 
 
इतना कुछ होने के बावजूद यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर सऊदी भारी नहीं पड़ पा रहा है। हूती सऊदी के ख़िलाफ़ बड़े हमले करने में कामयाब रहे हैं। यहां तक कि हूती विद्रोहियों ने सऊदी के भीतर भी हमले किए हैं। सबसे शर्मनाक तो यह है कि न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार हूती की एक बैलिस्टिक मिसाइल सऊदी की राजधानी रियाद के एयरपोर्ट पर गिरी थी। शुरू में सऊदी ने इससे इनकार किया था।
 
 
माइकल नाइट्स ने बिज़नेस इनसाइडर से कहा है, ''सऊदी ने यमन में केवल हवाई हमले का सहारा लिया है। अगर उसके पास सैन्य ताक़त है तो क्यों नहीं यमन की ज़मीन पर अपने सैनिकों को उतार रहा है।'' नाइट का कहना है कि ज़मीन पर लड़ने के लिए अनुभव और ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है जो कि सऊदी की सेना के पास है नहीं।''
 
 
वो कहते हैं, ''सऊदी की सेना के पास असाधारण ऑपरेशन का बिल्कुल अनुभव नहीं है। इसे इराक़ के उदाहरण से भी समझ सकते हैं। इराक़ में सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ जब अमेरिका ने हमला किया तो उसने कोशिश की थी कि सऊदी की सेना भी साथ दे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया था। सऊदी ने इस युद्ध में कोई योगदान नहीं दिया था।''
 
 
सऊदी अरब की थल सेना के बारे में कहा जाता है कि वो प्रशिक्षित नहीं है और ऐसे में यमन की ज़मीन पर जाकर लड़ना उसके लिए आसान नहीं है। मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में डिफेंस एंड सिक्यॉरिटी प्रोग्राम के निदेशक बिलाल साब कहते हैं, ''सऊदी इस बात को समझता है कि यमन में हूती विद्रोहियों से ज़मीन पर जाकर लड़ना आसान नहीं है। अगर सऊदी ऐसा करता है तो उसे ना भारपाई होने वाला नुक़सान उठाना होगा।''
 
 
सऊदी के पास विकल्प क्या हैं?
कई सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी को अपनी सेना का आकार छोटा करना चाहिए। इन सैन्य विशेषज्ञों में नाइट्स भी शामिल हैं। नाइट्स का कहना है कि सऊदी को सेना में गुणवत्तापूर्ण बहाली और प्रशिक्षण पर ध्यान देने की ज़रूरत है। उसे ऐसी यूनिट्स बनानी चाहिए जो पड़ोसी देशों के साथ युद्धाभ्यास करे। यमन में सऊदी की स्थिति को देख कहा जा रहा है कि मध्य-पूर्व में ईरान का प्रभाव बढ़ रहा है।
 
 
सऊदी लंबे समय से हथियार बेचने वालों का पसंदीदा देश रहा है। इस मामले में वो अमेरिका का दुलारा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने 110 अरब डॉलर के सैन्य समझौते की घोषणा की थी। 32 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान चाहते हैं कि वो अपने ही देश में हथियार बनवाएं। वो चाहते हैं कि 2030 तक सऊदी अपने ही घर में ज़रूरत के कम से कम आधा हथियार बनाए। अगर ऐसा होता है तो आने वाले समय में पता चल पाएगा कि सऊदी अरब सैन्य दृष्टिकोण से कितना मज़बूत और प्रभावी हो पाता है और यमन में कोई निर्णायक भूमिका निभा पाता है।
 

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