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घर नहीं लौटना चाहते जम्मू में रह रहे रोहिंग्या मुसलमान

Updated: बुधवार, 16 अगस्त 2017 (12:58 IST)
- मोहित कंधारी (जम्मू से)
पिछले चार सालों से भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर राज्य में रह रहे 47 साल के रोहिंग्या मुसलमान कमल हुसैन अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जम्मू के बाहरी इलाके में छोटे समूहों में रह रहे कमल और उन जैसे बहुत से रोहिंग्या मुसलमानों को जब से पता चला है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को गैरकानूनी ढंग से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों को निर्वासित करने के निर्देश दिए हैं, बर्मा के इन सताए हुए मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अपना भविष्य अंधकार में दिख रहा है।
 
जम्मू में दिहाड़ी पर काम कर रहे कमल हुसैन ने बीबीसी हिंदी से कहा, 'बर्मा अभी भी जल रहा है। हम घर नहीं लौट सकते। यहां हम सुरक्षित हैं। पिछले 70 सालों में बर्मा में सरकार मुस्लिम आबादी को निशाना बना रही है और हमें जेल में डाल रही है। अगर वे हमें यहां से ले जाने का फ़ैसला करते हैं, तब भी मैं वहा नहीं लौटना चाहता।'
 
उन्होंने कहा, 'बेशक मैं मुश्किल से गुज़र-बसर कर रहा हूं मगर ख़ुश हूं कि ज़िंदा हूं और अपने बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं जुटा पा रहा हूं। मैं बर्मा जाने के लिए तैयार नहीं हूं। मैं अपने बच्चों को बर्मा में हिंसा की भेंट नहीं चढ़ाना चाहता।'
 
भारत में ग़ैर-कानूनी रूप से बसे रोहिंग्या मुसलमानों में सबसे ज्यादा आबादी जम्मू प्रांत के विभिन्न हिस्सों में रह रही है। जम्मू और कश्मीर के गृह मंत्रालय द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक जम्मू में पिछले कुछ सालों से 5700 रोहिंग्या मुसलमान रह रहे हैं। इन परिवारों के बच्चे भटिंडी और नरवाल बाला इलाके में राज्य सरकार द्वारा चलाए जाने वाले स्कूलों में पढ़ रहे हैं और कुछ मदरसों में दाख़िल हुए हैं।
पिछले 6 महीनों में बढ़ीं चिंताएं
पिछले 6 महीनों से ये परिवार बड़ी मुश्किल में रह रहे हैं। फ़रवरी 2017 में जम्मू के विभिन्न इलाकों में उन्हें चेतावनी देने के लिए 'जम्मू-छोड़ो' वाले बैनर लगाए गए थे। वे ख़ुफ़िया एजेंसियों और राज्य की राजनीतिक पार्टियों के रडार में भी आ गए, जिन्होंने उन्हें वापस भेजने की मांग उठाई थी।
 
32 साल के इमाम हुसैन बताते हैं, 'मैं घर वापस जाने के लिए तैयार हूं अगर वहां पर कानून और व्यवस्था हमारे वापस लौटने के अनुकूल हो।' उनका कहना है कि हम अपने देश में सरकार द्वारा मुस्लिमों पर होने वाले अत्याचार की खबरें सुनते रहते हैं। वह कहते हैं, 'मुझे पता चला है कि अब कोई घर लौटता है तो उसके रिश्तेदारों को जेल में डालकर प्रताड़ित किया जाता है।'
 
हुसैन ने कहा, 'यहां मैं आज़ाद हूं। मैं हर 10 दिन में मुंबई जाता हूं और 500-600 किलो मछली का ऑर्डर बुक करता हूं। मैं माल को ट्रेन में डालता हूं और रोहिंग्या मुसलमानों के लिए बनी लोकल मार्केट में मछली बेचता हूं।' उन्होंने कहा कि मैं तो बस अपना जीवन बसर कर रहा हूं और किसी सरकारी एजेंसी से मुझे कोई परेशानी नहीं है।
 
केंद्र सरकार के फैसले का जिक्र करते हुए हुसैन ने बीबीसी से कहा, 'मुझे नहीं लगता कि जम्मू में रह रहे रोहिंग्या मुसलमान वापसी के लिए तैयार हैं। अगर हमें मजबूर किया गया तो छोड़ना ही पड़ेगा मगर खुद से हम अपने घर नहीं जाना चाहते।'
'सिर पर हमेशा लटकी रहती है तलवार'
एक अन्य युवक सद्दाम हुसैन ने बताया, 'अगर सरकार हमें वापस घर भेजती है तो हम उससे मुकाबला नहीं कर सकते।' उन्होंने कहा कि बर्मा में सुरक्षा ही हमारी सबसे बड़ी चिंता है। 'मेरे माता-पिता बर्मा में ही हैं और मुझे जानकारी मिलती रहती है कि वहां मुस्लिमों को मारा जा रहा है।'
 
भटिंडी इलाके में छोटा सा स्टोर चला रहे सबीर अहमद ने बीबीसी से कहा, 'अभी तक किसी भी सरकार ने कोई ठोस फ़ैसला नहीं लिया है। मगर आप मुझसे पूछें तो मैं वापस बर्मा नहीं जाना चाहता।' सबीर ने कहा, 'मेरी जिंदगी कुत्ते से भी बदतर है। कुत्ते की भी कुछ कीमत है मगर मेरी ज़िंदगी की कीमत गली के कुत्ते से भी कम है।'
 
उन्होंने कहा, 'मैं कोई शाही जिंदगी नहीं जी रहा। बस थोड़ी सी जगह के लिए संघर्ष कर रहा हूं। मैं किराया भी दे रहा हूं, बिजली के बिल भी चुका रहा हूं। फिर भी हर वक़्त मेरे सिर पर तलवार लटकी रहती है।'
 
जम्मू में अवैध ढंग से बसे विदेशी नागरिकों के मामले पर बने मंत्रियों के समूह का नेतृत्व कर रहे उप मुख्यमंत्री डॉक्टर निर्मल सिंह ने बीबीसी को बताया, 'अभी तक हमने दो बैठकें की हैं और हालात को लेकर जानकारी इकट्ठा की है।'
 
पहली बैठक में डॉक्टर निर्मल सिंह ने प्रशासन को जम्मू और सांबा जिलों में रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशियों का पूरा डाटा जुटाने के निर्देश दिए थे। डॉक्टर निर्मल सिंह ने कहा, 'हम उनके निर्वासन से जुड़े मुद्दों को निपटाने के लिए तीसरी बैठक करने जा रहे हैं।'

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