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भारत से मैंने प्यार करना सीखा है: राशिद ख़ान

शुक्रवार, 15 जून 2018 (12:37 IST)
- सूर्यांशी पांडेय 
 
अपने देश के हालातों के कारण मजबूरी में अपना वतन छोड़ आए एक शरणार्थी से आप क्या उम्मीद करते हैं, कि वो एक दिन क्रिकेट में नामचीन खिलाड़ी बनेगा?
 
अफ़ग़ानिस्तान के खिलाड़ी राशिद ख़ान की कहानी इस सवाल का जवाब देती है। 20 सितंबर 1998 में अफ़ग़ानिस्तान के ननगरहार प्रांत के जलालाबाद में जन्में राशिद ख़ान का बचपन आतंकवाद के खौफ़ में बीता। ननगरहार प्रांत तालिबान का सक्रिय गढ़ रहा।
 
और अफ़ग़ानिस्तान टीम के राशिद ख़ान ही नहीं बल्कि कई खिलाड़ियों की कहानी शरणार्थी बनकर ही शुरू हई है। पाकिस्तान के पेशावर के पास बने शरणार्थी शिवरों में रहने वाले कई अफ़ग़ानियों ने हाथ में बल्ला और गेंद उठाने का फ़ैसला किया और फिर एक इतिहास रचने चल पड़े।
 
अफ़ग़ानिस्तानी टीम का वो 17 साल का सफ़र...
साल 2001 में 11 खिलाड़ियों को लेकर अफ़ग़ानिस्तान की एक क्रिकेट टीम बनी और 17 साल का सफ़र तयकर इस साल 14 जून को यह टीम अपना पहला टेस्ट मैच खेलने के लिए बेंगलुरू के एम। चिन्नास्वामी स्टेडियम के मैदान पर उतरी।
 
यह सफ़र आसान नहीं था। जहां अपने आपको क्रिकेट के मैदान पर टेस्ट टीम साबित करने की चुनौती थी तो वहीं अपने देश यानी अफ़ग़ानिस्तान के हालातों से भी जूझना था। लेकिन विपरीत परिस्थियों के बावजूत एक टेस्ट टीम खड़ी हुई और आईसीसी को 12वीं टेस्ट टीम के तौर पर 22 जून 2017 में अफ़ग़ानिस्तान को जगह मिली।
 
अफ़ग़ानिस्तान की टीम की ट्रेनिंग का ज़िम्मा बीसीसीआई ने उठाया और 2015 में ग्रेटर नोएडा मे स्थित शहीद विजय सिंह पाठक क्रिकेट ग्राउंड को अफ़ग़ानिस्तान का होमग्राउंड घोषित किया।
 
राशिद ख़ान, नाम तो सुना ही होगा!
इसी टीम के एक खिलाड़ी राशिद ख़ान ऐसा चमके कि आज विश्व में टी 20 के सबसे बेहतरीन गेंदबाज़ बने। यही नहीं फरवरी 2018 में टी-20 और वन डे के गेंदबाज़ों में से आईसीसी रैंकिंग में न.1 पायदान पर पहुंच गए और टी 20 में अबतक न. 1 स्थान पर जमे हुए हैं।
 
बीबीसी से ख़ास बातचीत में उन्होंने अपने खेल और व्यक्तित्व से जुड़ी कई बातों का ज़िक्र किया। 26 अक्टूबर 2015 में जिम्बावे के ख़िलाफ़ पहली बार वह वन डे का मैच खेलने उतरे थे। तो उसी साल टी 20 के मुक़ाबले में भी हिस्सा लिया।
 
राशिद ख़ान बताते हैं कि उनकी सबसे यादगार पारी आयरलैंड के ख़िलाफ़ रही थी। 10 मार्च साल 2017, ग्रेटर नोएडा में आयरलैंड के ख़िलाफ़ दूसरे टी 20 मुक़ाबले में उन्होंने 2 ओवर में 5 विकेट चटकाए थे।
 
वह बताते हैं कि चौथा विकेट लेने के बाद वो बेहद खुश थे और उत्साह में एयरप्लेन जैसे पोज़ बनाकर भागने लगे। ऐसे उन्होंने पहली बार एयरप्लेन पोज़ के साथ विकेट चटकाने का जश्न मनाया जो अब उनका विकेट लेने के बाद 'सिग्नेचर स्टेप' बन गया है।
"मैंने भारत से प्यार करना सीखा है।"
लेकिन असल जश्न तो इस बात का है कि राशिद ख़ान के फ़ैन्स भारत में कई हैं। आईपीएल में अच्छे प्रदर्शन की बदौलत बच्चा-बच्चा अब राशिद ख़ान को पहचानता है। जब उनसे ये सवाल पूछा गया कि आप इतने समय से भारत में ट्रेनिंग ले रहे हैं तो फिर भारतीयों की ऐसी कौन सी आदत है जो आप अपने अंदर देखना चाहेंगे।
 
राशिद ख़ान ने कहा कि उन्होंने भारतीयों से प्यार करना सीखा है। उन्हे भारतीयों की ज़िंदादिली बेहद पसंद है।
 
"विराट को गूगली से चित करने में मज़ा आता है"
जब उनकी गूगली का ज़िक्र हुआ तो उन्होंने ख़ुलासा किया कि उनको विराट कोहली का विकेट लेने में सबसे ज़्यादा मज़ा आता है। निजी ज़िंदगी पर पूछे सवालों पर राशिद ख़ान ने बताया कि उनके परिवार में 7 भाई और 4 बहनें हैं।
 
उनके सातों भाई गेंदबाज़ हैं लेकिन परिवार की ज़िम्मेदारियों के चलते वह क्रिकेट में अपना करियर नहीं बना पाए लेकिन राशिद ख़ान को सहारा दिया। राशिद ख़ान बताते हैं कि उनके मां-बाप क्रिकेट के लिए प्रोत्साहित नहीं करते थे बल्कि राशिद को पढ़ाई करने पर ज़ोर डालते थे।
 
अफ़ग़ानिस्तान के हालातों को देखते हुए वह और कुछ उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने बताया कि बचपन में वह बाहर खेल ही नहीं पाते थे क्योंकि माहौल ही सक्रिय रहता था और हर कोई आतंक के साए में जीता था। लेकिन घर में जब भी समय मिलता था तो राशिद ख़ान अक्सर अपने भाइयों के साथ क्रिकेट खेला करते थे।
 
कहां से सीखी हिन्दी?
 
राशिद ख़ान का हिन्दी की भाषा पर इतनी अच्छी पकड़ होना हैरान कर रहा था। तो बीबीसी से ख़ास बातचीत में राशिद ख़ान से जब ये सवाल पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन्हें बॉलीवुड की फ़िल्में देखने का ख़ूब शौक़ है। वह आमिर ख़ान की फ़िल्में सबसे ज़्यादा देखते हैं और फ़िल्मों को देखते हुए भाषा को समझना शुरू किया।
 
कोच की कही वो बात...
 
पाकिस्तान में शरणार्थी शिविर में पहुंचने के बाद उन्होंने क्रिकेट को गंभीरता से लेना शुरू किया। पाकिस्तान में पेशावर के पास शरणार्थी शिविरों के बीच खुरासन में क्रिकेट का कैंप लगता जहां शरणार्थियों की ट्रेनिंग होती। टेनिस की बॉल से उनको क्रिकेट सिखाया जाता था जिसके बाद जो सबसे अच्छा खेलता उसको पेशावर की एकाडमी में भेजा जाता था।
 
राशिद बताते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के अंडर-19 की टीम में जैसे ही उन्होंने जगह बनाई तो अंडर-19 के कोच दौलत अहमदजई ने उनसे कहा कि ''अगर तुम अपने ऊपर तीन महीने कड़ी मेहनत करो, तो तुम उम्दा क्रिकेटर बनोगे।" 
 
राशिद ख़ान बताते हैं कि आज भी कोच की कही बात उनके कानों में गूंजती है। और शायद इसी सीख का नतीजा रहा कि अफ़ग़ानिस्तान का ये खिलाड़ी ना सिर्फ़ अपनी पहचान क्रिकेट की दुनिया में बना पाया बल्कि अफ़ग़ानिस्तान की टीम को भी क्रिकेट के नक्शे पर मजबूती से ला खड़ा किया।

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