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यूएन में पीएम मोदी और शी जिनपिंग ने कीं लगभग एक जैसी बातें

Written By BBC Hindi
Updated: मंगलवार, 22 सितम्बर 2020 (07:46 IST)
संयुक्त राष्ट्र 75 साल का हो गया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था। इसे बनाने का सबसे अहम लक्ष्य यही था कि दुनिया कहीं तीसरे युद्ध की तरफ़ बढ़े तो उसे रोकने वाला कोई हो। संयुक्त राष्ट्र 75 साल का तब हुआ है जब दुनिया कई तरह के संकट से घिरी हुई है।
 
भारत और चीन दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और दोनों देशों की सेना सरहद पर आमने-सामने हैं।
 
तनाव इतना ज़्यादा है कि दोनों तरफ़ से सीमा पर सैनिकों और हथियारों की व्यवस्था और दुरुस्त की जा रही है। लेकिन रविवार को यूएन की 75वीं वर्षगाँठ पर दोनों देशों के नेताओं शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी आम सभा की उच्चस्तरीय बैठक को संबोधित करने आए तो कई बातें एक जैसी कीं।
 
मोदी और शी जिनपिंग दोनों ने कहा कि दुनिया अब बहुध्रुवीय हो गई है और इस लिहाज से यूएन को संतुलित होने की ज़रूरत है।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र की 75वीं वर्षगाँठ के मौक़े पर यूएन जनरल एसेंबली यानी संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की उच्चस्तरीय बैठक को संबोधित किया।
 
इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी का पहले से रिकॉर्ड किया गया चार मिनट का भाषण चलाया गया। अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि बिना व्यापक सुधार के संयुक्त राष्ट्र विश्वास के संकट से जूझ रहा है।
 
प्रधानमंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को बहुमुखी बनाने की ज़रूरत है ताकि सबकी आवाज़ को जगह मिल सके। पीएम मोदी ने कहा कि इसके साथ ही यूएन को वर्तमान चुनौतियों से निपटना चाहिए।
 
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा, '75 साल पहले युद्ध की भयावहता के बाद एक नई उम्मीद जगी थी। मानव इतिहास में पहली बार कोई संस्थान पूरी दुनिया के लिए बनाया गया था। भारत यूएन चार्टर का शुरू से हिस्सा रहा है। भारत का अपना दर्शन भी 'वसुधैव कुटुंबकम' का रहा है। हम पूरी दुनिया को अपना परिवार मानते हैं। आज हम अपनी दुनिया को बेहतर पाते हैं तो यह संयुक्त राष्ट्र के कारण है। संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन में भारत की भूमिका अहम है। हालांकि अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है। टकराव के बचना, विकास को गति देना, जलवायु परिवर्तन और विषमता को कम करने काम की चुनौती कायम है। संयुक्त राष्ट्र के भीतर भी सुधार की ज़रूरत है।'
 
संयुक्त राष्ट्र की 75वीं वर्षगाँठ पर आयोजित आम सभा की उच्चस्तरीय बैठक को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी संबोधित किया है।
 
शी जिनपिंग ने अपने संबोधन में कोविड 19 के बाद यूएन की भूमिका को रेखांकित किया। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एकध्रुवीय दुनिया का विरोध किया और कहा कि कोई एक देश पूरी दुनिया का बॉस नहीं बन सकता। ज़ाहिर है कि शी जिनपिंग के निशाने पर अमेरिका था।
 
शी जिनपिंग ने कहा, 'किसी भी देश के पास यह अधिकार नहीं है कि वो वैश्विक संबंधों में अपना प्रभुत्व दिखाए। दूसरे देशों के भविष्य को नियंत्रित करे और प्रगति का सारा फ़ायदा ख़ुद ही ले। किसी भी देश को अपनी प्रगति करने का हक़ है और उसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। विकासशील देशों की भूमिका वर्तमान दुनिया में बढ़ी है इसलिए संयुक्त राष्ट्र को और संतुलित होने की ज़रूरत है। बड़े देशों को अंतरराष्ट्रीय नियमों और अपनी प्रतिबद्धताओं को लेकर संकल्पित होने की ज़रूरत है।'
 
शी जिनपिंग ने कहा, 'दोहरे मानदंड के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय नियमों से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए और न ही इनका इस्तेमाल किसी देश को नुक़सान पहुंचाने के लिए होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सहयोग को बढ़ावा दे। शीत युद्ध वाली मानसिकता से हमें कुछ नहीं हासिल होगा बल्कि चुनौतियों से साथ मिलकर लड़ना होगा। हमें टकराव की जगह संवाद लाना होगा, दादागिरी की जगह बातचीत और पारस्परिक हितों को बढ़ावा देने की ज़रूरत है। हमें बहुध्रुवीय दुनिया को स्वीकार करना होगा और बात करने से ज़्यादा करके दिखाना होगा।'
 
शी जिनपिंग ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने 75 साल के सफर में शानदार काम किया है। चीनी राष्ट्रपति ने कहा, 'पिछले 75 सालों में मानव समाज में कई बदलाव आए हैं। अंतरराष्ट्रीय हालात भी बदले हैं। इस दौर में दुनिया बहुध्रुवीय हुई है।'
 
क्या नेहरू ने यूएन की सुरक्षा परिषद में भारत के बदले चीन को सीट दे दी थी भारत यूएन सुरक्षा परिषद में सुधार की बात लंबे समय से कर रहा है। भारत का कहना है कि यूएन की 1945 की संरचना 21वीं सदी की दुनिया के लिए माकूल नहीं है।
 
भारत यूएन सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। भारत का दावा है कि उसकी इस मांग का समर्थन सुरक्षा परिषद के पाँच सदस्यों में चीन को छोड़कर फ़्रांस, ब्रिटेन, अमरीका और रूस कर रहे हैं।
 
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार मिला हुए है। आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को चीन ने वैश्विक आतंकी घोषित कराने के मामले में भारत के ख़िलाफ़ वीटो कर दिया था। ऐसे में भारत का मानना है कि यूएन सुरक्षा परिषद का विस्तार होना चाहिए।
 
संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत किया गया था और इसमें कुछ ख़ास देशों को स्थायी सदस्यता मिली थी। चार्टर में बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है। ऐसे में कोई सवाल ही नहीं उठता है कि भारत को सीट दी गई और भारत ने लेने से इनकार कर दिया। भारत की घोषित नीति है कि संयुक्त राष्ट्र में सदस्य बनने के लिए जो भी देश योग्य हैं उन सबको शामिल किया जाए।

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