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कन्हैया कुमार: क्या संसद जाने की जल्दी में सीपीआई छोड़ कांग्रेस का थामा दामन

Written By BBC Hindi
Updated: बुधवार, 29 सितम्बर 2021 (07:57 IST)
वात्सल्य राय, बीबीसी संवाददाता
जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई) के टिकट पर बिहार की बेगूसराय लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुके कन्हैया कुमार मंगलवार को कांग्रेस में शामिल हो गए।
 
पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में दिल्ली स्थित मुख्यालय में वो कांग्रेस में शामिल हुए। गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने भी उनके साथ कांग्रेस की सदस्यता ली।
 
कन्हैया कुमार ने कहा कि वो देश को बचाने के लिए कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस ही महात्मा गांधी और भगत सिंह के सपने को बचा सकती है।
 
उन्होंने कहा, "आप अपने दुश्मन का चुनाव कीजिए, दोस्त अपने आप बन जाएंगे। हम देश की सबसे लोकतांत्रिक पार्टी में इसलिए शामिल होना चाहते हैं क्योंकि अगर कांग्रेस नहीं बची तो देश नहीं बचेगा।"
 
कन्हैया कुमार ने कहा कि कांग्रेस (महात्मा) गांधी के विचारों को लेकर आगे बढ़ेगी।
 
कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने की जानकारी बीते कुछ दिनों से अपुष्ट सूत्रों के हवाले से आ रहीं थीं। कांग्रेस से जुड़े सूत्रों ने सोमवार को बताया था कि वो मंगलवार को दोपहर बाद तीन बजे कांग्रेस में शामिल होंगे।
 
लेकिन, मंगलवार को लगभग उसी समय पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने का एलान कुछ देर बाद हो सका।
 
'विचारधारा नहीं रखती मायने'
कांग्रेस नेताओं का दावा है कि कन्हैया कुमार के शामिल होने से पार्टी मज़बूत होगी। वहीं सीपीआई ने कन्हैया कुमार पर 'मौकापरस्त' होने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि उनके पास न तो कोई 'जनाधार है और न ही उन्होंने कोई संघर्ष किया है।' ऐसे में उनको साथ लेकर कांग्रेस को कोई फ़ायदा नहीं होगा।
 
सीपीआई के सीनियर नेता अतुल कुमार अंजान ने बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से कहा कि कन्हैया कुमार 'राज्यसभा पहुंचने की जल्दी में हैं।'
 
अतुल कुमार अंजान ने कहा, "वो बहुत जल्दी में हैं संसद और राज्यसभा पहुंचने की। मैं उनको शुभकामना देता हूं कि वो कांग्रेस पार्टी में गए हैं तो उनके सारे अरमान, लोकसभा, राज्यसभा (जाने के) पूर्ण हो जाएं।"
 
अतुल कुमार अंजान ने कहा कि सीपीआई में विचारधारा अहम है लेकिन कन्हैया कुमार के लिए विचारधारा कोई मायने नहीं रखती है। वो दावा करते हैं कि कन्हैया कुमार लंबे समय से नई पार्टी की तलाश कर रहे थे।
 
वो कहते हैं, "अगर उनकी सोच में दिक्कत न होती तो कम्युनिस्ट पार्टी से कांग्रेस में क्यों जाते? इससे पहले वो जेडीयू में जा रहे थे। बड़ी चर्चा थी उनकी चार महीने पहले। वो (बिहार के मुख्यमंत्री) नीतीश कुमार जी से भी मिले थे। "
 
'सीपीआई को अंधेरे में रखा'
अतुल कुमार अंजान ये दावा भी करते हैं कि कांग्रेस में शामिल होने के फ़ैसले को लेकर उन्होंने पार्टी को अंधेरे में रखा।
 
अंजान के मुताबिक, "तीन दिन पहले इतवार के दिन वो (कन्हैया) पार्टी ऑफिस में आए थे। उससे पहले भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 4 और 5 सितंबर को थी। उस मीटिंग में वो मेरे बगल में ही आकर बैठे थे।"
 
कांग्रेस और बिहार की राजनीति पर करीबी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की राय में भी कन्हैया का कांग्रेस से जुड़ने का फ़ैसला उनकी 'महत्वाकांक्षा' को जाहिर करता है। वो मानते हैं कि इस फैसले का विचारधारा से कोई संबंध नहीं है।
 
उर्मिलेश ने कहा, " भारत में सीपीआई बहुत बुरी स्थिति में है। उसमें (रहे) एक महत्वाकांक्षी नेता जो कि नौजवान भी है, उसे लगा होगा कि राजनीति में करियर बनाना है तो किसी और पार्टी की तलाश करें और फिर वो कांग्रेस की तरफ गए।"
 
उर्मिलेश आगे कहते हैं, "अगर वो महत्वाकांक्षी न होते तो पिछली बार बेगूसराय से संसदीय चुनाव लड़ने का फ़ैसला न किया होता। ये शुद्ध रूप से विचार का मामला नहीं है। ये शुद्ध रूप से महत्वाकांक्षा का मामला है। हर आदमी को अधिकार है अपना फ़ैसला लेने का।"
 
वो मानते हैं कि उत्तर भारत में सीपीआई की कमज़ोर स्थिति की वजह से कन्हैया कुमार ने कांग्रेस के साथ जुड़ने का फ़ैसला लिया होगा।
 
'सीपीआई ने आगे बढ़ाया'
लेकिन, अतुल कुमार अंजान इस बात से सहमत नहीं हैं। वो दावा करते हैं कि कन्हैया कुमार आज जो कुछ हैं, वो पार्टी संगठन की वजह से ही हैं।
 
वो कहते हैं, "उनमें कोई सांगठनिक क्षमता नहीं थी। वो (छात्र संघ) अध्यक्ष बने हमारे संगठन की वजह से और उन्होंने उस संगठन को अगली दफ़ा ख़त्म कर दिया। हमारा एक भी आदमी चुनाव भी लड़ने लायक नहीं रहा।"
 
अतुल कुमार अंजान आगे कहते हैं, "हमने उन्हें लोकसभा का चुनाव बेगूसराय से लड़ाया। ये सीट हम छह बार जीते थे। पहले हम 10-15 लाख रुपये के अंदर चुनाव लड़ते थे।उन्होंने पता नहीं कहाँ से करोड़ों रुपये इकट्ठा किए। तमाम क्राउड फंडिंग की और फंडिंग के बाद चुनाव अभियान बड़ी तेज़ी से चला। परिणाम आया तो चार लाख 20 हज़ार वोट से वो हारे। ऐसी हार तो हम लोगों ने कभी देखी ही नहीं थी।"
 
कन्हैया कुमार 2019 के लोकसभा चुनाव में सीपीआई के उम्मीदवार थे। तब बेगूसराय से भारतीय जनता पार्टी नेता गिरिराज सिंह ने जीत हासिल की थी।
 
उन्होंने कहा, "कोई क्लास स्ट्रगल तो कन्हैया ने किया नहीं। वर्ग संघर्ष से तो वो आए नहीं। न उन्होंने ट्रेड यूनियन में काम किया न किसानों में काम किया न खेत मजदूरों में काम किया। लोकसभा चुनाव के छह महीने के बाद विधानसभा का चुनाव बेगूसराय में हुआ। जिस क्षेत्र के वो रहने वाले हैं बरौनी के, उसी विधानसभा सीट को हमने 54 हज़ार वोट से जीता।"
 
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश भी कहते हैं कि मीडिया में मिली 'हाइप' की वजह से कन्हैया ख़ुद को राष्ट्रीय नेता समझने लगे।
 
उन्होंने कहा, "उन्हें इतना हाइप मिला कि वो एक नेशनल फिगर जैसे बन गए। जबकि वो एक कैंपस के स्टुडेंट लीडर थे। जो एक राजनीतिक व्यवहार होता है जो काम काज होता है जनता के बीच, समाज के बीच, वो उन्होंने कभी किया नहीं था। छात्रों में भाषण से लोकप्रिय हो गए थे। छात्र संघ में जीत के बाद जितनी उनकी राजनीतिक हैसियत थी, उससे ज़्यादा उनका प्रोजेक्शन हुआ, मुझे लगता है कि उन्हें लगा कि वो बड़े नेता बन गए हैं।"
 
वहीं, अतुल कुमार अंजान कहते हैं कि कन्हैया कुमार ने 'कोई स्ट्रगल' नहीं किया और न ही पार्टी के लिए कोई ख़ास योगदान दिया।
 
उन्होंने कहा, "(कन्हैया कुमार को) एक छलांग में (आगे) बढ़ा देने से ये एक परिणाम हमको देखने को मिला है। पार्टी के लोग इस पर विचार कर रहे हैं। नेशनल काउंसिल और राष्ट्रीय कार्यकारिणी दोनों हमने उनको एक साथ दे दी। वो जहां जाते थे, उनको हम एयर टिकट देते थे। अपने तीन-चार साथियों को सिक्योरिटी के नाम पर साथ ले जाते थे।"
 
अतुल कुमार अंजान ये दावा भी करते हैं कि कन्हैया कुमार के जाने से सीपीआई को कोई झटका नहीं लगा है।
 
वो कहते हैं, "कतई चोट नहीं पहुंची है। हमारी पार्टी और मज़बूत हो गई। पार्टी के चेयरमैन रहे श्रीपाद अमृत डांगे भी एक बार पार्टी छोड़कर चले गए थे। कोई फर्क नहीं पड़ता। एक ईंट नहीं खिसकी थी।"
 
कांग्रेस को क्या हासिल?
लेकिन, क्या कांग्रेस को कन्हैया कुमार के साथ आने से कोई फ़ायदा मिलेगा, इस सवाल पर उर्मिलेश कहते हैं कि ये कांग्रेस के रणनीतिकारों की योजना से पता चलेगा कि परिणाम क्या होंगे।
 
वो कहते हैं, "2018 का चुनाव हुआ तो उन्होंने (कांग्रेस ने) राजस्थान जीता था। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी जीता। लेकिन (बाद में)मध्य प्रदेश गंवा दिया क्योंकि उन्होंने सही लोगों को सही ढंग से सरकार में नहीं लिया। इसमें कहीं न कहीं कांग्रेस पार्टी की विचारधारात्मक कमजोरी है। उसके पास नया कोई दर्शन नहीं है। नया कोई विचार नहीं है।"
 
उर्मिलेश आगे कहते हैं, " जो देश की सबसे पुरानी पार्टी है, उसमें आपको नया कंटेंट भरना पड़ेगा। राहुल गांधी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनको शायद मालूम नहीं है कि नया कंटेंट क्या होगा? तब तक कांग्रेस पार्टी (बाहर से) नेताओं को लाने से मज़बूत नहीं होगी। उसको जनाधार नया बनाना पड़ेगा। आपके पास नेता अगर आ गए और जनाधार बना ही नहीं तो आप क्या करेंगे। आप देखिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का क्या हाल है। ये बड़ा संकट है कांग्रेस का"

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