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कश्मीर: 'कबायलियों ने उन सभी को गोली मार दी जो कलमा नहीं पढ़ सके'

Updated: सोमवार, 23 अक्टूबर 2017 (11:43 IST)
- एम इलियास ख़ान (बीबीसी उर्दू, नॉर्थ-वेस्ट पाकिस्तान)
अक्टूबर की सर्द सुबहों में पाकिस्तान के गढ़ी हबीबुल्लाह शहर और कश्मीर के मुज़फ्फराबाद शहर के दरमियान पड़ने वाला डब गली का इलाका खामोशी की चादर ओढ़े हुए लगता है। इसकी सुरक्षा चौकी की दोनों तरफ़ मौजूद क़रीब दो दर्जन दुकानें भी गुमसुम सी लगती हैं। ये सुरक्षा चौकी कश्मीर और पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तूनख्वाह सूबे की सरहद का निशान है। यहां अब ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे ये कहा जा सके कि सत्तर बरस पहले कुछ पठान कबायली लड़ाकों ने इसी जगह से कश्मीर में घुसपैठ की थी। और दुनिया के सबसे लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद की नींव इसी घुसपैठ से पड़ गई।
 
कश्मीर की रियासत
लेकिन 86 वर्षीय स्थानीय निवासी मोहम्मद हसन कुरैशी को वो तूफानी दिन अच्छी तरह से याद हैं। वो कहते हैं, "पठानों के आने से हफ्ते भर पहले ये अफवाह थी कि कश्मीरी सिख मुज़फ्फराबाद पर हमले की तैयारी कर रहे हैं। कुछ दिनों बाद हमने सुना कि पठान आ रहे हैं। इस इलाके में सिखों की ठीकठाक आबादी रहती थी।"
 
अफवाहों का उड़ना स्वाभाविक ही था, क्योंकि कथित तीन जून दिन वाली योजना की घोषणा के बाद कश्मीर की रियासत उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी। इस योजना के तहत हिंदू बहुल आबादी वाले ब्रिटिश भारत का बंटवारा होना था और मुस्लिम बहुमत वाले पाकिस्तान के गठन का प्रस्ताव था।
 
कबायली लड़ाके
मुस्लिम बहुल आबादी और हिंदू राजा वाले कश्मीर की रियासत का भविष्य इन हालात में अधर में लटका हुआ लग रहा था। राज्य के पश्चिमी जिलों में मौजूद मुसलमानों ने जून में सत्ताधारी महाराजा के ख़िलाफ़ बगावत कर दी और सितंबर में दक्षिणी कश्मीर में मुस्लिम विरोधी दंगों की शुरुआत हो गई। इन सबके बीच पाकिस्तानी की तरफ़ से एक कश्मीर प्लान की बात सामने आई। ये कहा गया कि कश्मीर पर कब्जे के लिए पाकिस्तान के सहयोग से 20 हज़ार कबायली लड़ाकों की फौज तैयार की जा रही है।
 
गढ़ी हबीबुल्लाह
मोहम्मद हसन कुरैशी 21 अक्तूबर, 1947 की शाम को याद करते हैं जब वे अपने कुछ दोस्तों के साथ एक चोटी पर पहुंचे ताकि पश्चिम की तरफ़ घाटी का नज़ारा देख सकें। उन्होंने देखा कि ट्रक पर लदे पठान लड़ाके पथरीले पहाड़ी रास्तों से गढ़ी हबीबुल्ला में दाखिल हो रहे थे। 
 
वो बताते हैं, "हम सारी रात वहीं खड़े रहे। वे सुबह में आए। वे सैकड़ों की तादाद में थे। उनके हाथों में कुल्हाड़ियां, तलवारें थीं। कुछ के हाथों में बंदूक तो कुछ के हाथों में केवल लाठियां थीं। सुरक्षा चौकी पर मौजूद महाराजा के रक्षक गायब हो गए।"
 
मुज़फ्फराबाद का रास्ता
मुज़फ्फराबाद जाने के रास्ते में वे ढलान पर पांच मील आगे बढ़े होंगे कि उनकी पहली झड़प हुई। गढ़ी हबीबुल्लाह से 80 किलोमीटर की दूरी पर बट्टग्राम के गौहर रहमान दूसरे विश्व युद्ध में लड़ चुके हैं। वे उस दस्ते में शामिल थे जो डब गली के रास्ते कश्मीर में दाखिल हुआ था।
 
वो कहते हैं, "हम इस इलाके को बहुत अच्छी तरह से जानते थे। हम एक पैदल दस्ते को छोटे से रास्ते से ले गए। सीमांत इलाके के कबायली बड़ी तादाद में ट्रकों में भरकर लंबे लेकिन आसान रास्तों से आगे बढ़े।"
 
सैनिक इतिहासकार
करीब 2,000 कबायली लड़ाकों ने तड़के मुज़फ्फराबाद पर धावा बोल दिया। और कश्मीरी रियासत के तैनात सैनिक बिना कोई बाधा खड़ी किए तितर-बितर हो गए।
 
सैनिक इतिहासकारों का कहना है कि उस वक्त मुजफ्फराबाद में कश्मीरी रियासत के तकरीबन 500 सैनिक ही मौजूद थे और उनमें से कई मुसलमान सैनिकों ने हमले के वक्त पाला बदल लिया। फतह हासिल करने के बाद कबायली लड़ाकों ने वहां जमकर लूट-खसोट और आगजनी की।
महाराज के सिपाही
गौहर रहमान कहते हैं, "कबायलियों ने सरकारी हथियार लूट लिए। पूरे बाजार को जला दिया और उनका सामान लूट लिया। कबायलियों ने उन सभी को गोली मार दी जो कलमा नहीं पढ़ सके। कई गैर-मुस्लिम महिलाओं को गुलाम बना लिया गया। और बहुत से लोग पकड़े जाने से बचने के लिए नदी में कूद गए।"
 
रहमान ने बताया, "मुज़फ्फराबाद की सड़कें वहां हुई कत्लोगारत और बर्बादी की कहानी कह रही थीं। टूटी इमारतें, दुकानों के टूटे फर्नीचर, जला दिए सामान की राख, और लाशें। इन लाशों में कबायली लड़ाकों, महाराज के सिपाहियों और स्थानीय मर्द-औरतों के शव थे। नदी में भी तैरती हुई लाशें दिख रही थीं।"
 
झेलम के पार
ये कबायली लड़ाके मुज़फ्फराबाद में तीन दिन तक रहे। वहां से उनका इरादा 170 किलोमीटर दूर श्रीनगर की तरफ कूच करने का था। यहां से एक दस्ते ने ट्रक से झेलम पार कर निचले इलाके की तरफ कूच किया। बारामूला पहुंचने पर आगजनी और लूटपाट का एक दौर और चला।
 
गौहर रहमान के कबायलियों के उस दस्ते का हिस्सा थे जो बिना किसा बाधा के 200 किलोमीटर का फासला पैदल तय कर श्रीनगर के बाहरी इलाके तक पहुंच गए थे। उनका किसी विरोध से वास्ता नहीं पड़ा। महाराजा की सेना बिखरी हुई थी। हिंदुओं और सिखों ने अपने गांव छोड़ दिए थे। रहमान के दस्ते को रास्ते में केवल मुसलमान ही मिले।
 
कबायलियों का डर
गौहर रहमान बताते हैं, "मुस्लिम महिलाओं ने कई बार हमें खाना खाने के लिए कहा लेकिन पठान इस पेशकश पर हां कहने से हिचक रहे थे। उन्हें डर था कि कहीं इस खाने में ज़हर न हो। इसकी जगह कबायली लड़ाके उनकी बकरियां और भेड़ें छीनकर मार लेते थे। और खुद ही उसे आग पर पका लेते थे।"
 
रहमान कहते हैं, "एक रात, जलती हुई आग के कारण विमानों ने ऊपर से बम गिरा दिए। और इस हमले में कई कबायली लड़ाके मारे गए।"
 
समझौते पर दस्तखत
इन सब के बीच जम्मू और कश्मीर के महाराज ने भारत के साथ विलय की संधि पर दस्तखत कर दिए। 26 से 30 अक्टूबर के बीच भारत ने श्रीनगर में इतनी संख्या में सैनिक भेज दिए थे कि कबायली लड़ाकों से मुकाबलों किया जा सके।
 
हालांकि कबायली लड़ाके संख्या में फिर भी ज्यादा थे लेकिन उन्हें सैनिक लड़ाई के बजाय छापामार शैली में महारत हासिल थी। इस मौके पर कबायली लड़ाकों की मदद के लिए पाकिस्तान भी श्रीनगर पर हमला करना चाहता था लेकिन ब्रितानियों की संयुक्त कमान वाली सेना ने श्रीनगर पर हमला करने से इनकार कर दिया।
 
1948 का बसंत
उस वक्त तक भारत और पाकिस्तान की सेना का बंटवारा नहीं हुआ था। नवंबर के अंत तक ज्यादातर कबायली लड़ाके वापस लौटकर उरी तक आ गए थे। यहां झेलम नदी संकरी हो गई थी और मोर्चे की हिफाजत करना आसान था। जल्दी ही सर्दियां आ गईं और मुज़फ्फराबाद की ओर भारतीय सैनिकों का बढ़ना रुक गया।
 
यही वो जगह है जहां कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच बंट जाता है। 1948 के बसंत में पाकिस्तानी सैनिकों ने यहां औपचारिक रूप से मोर्चा संभाल लिया था। सर्दियों की पहली बर्फबारी होते ही गौहर रहमान अपने दूसरे कबायली साथियों के साथ गढ़ी हबीबुल्लाह लौट गए।
 
जंग की शैली
गौहर बताते हैं, "वे लूट के माल के साथ लौटे थे। कुछ पालतू जानवर लाए, कुछ हथियार और कुछ औरतों को लेकर आए।" इस हमले ने पहले से शांत और स्थिर कश्मीरी समाज को झकझोर दिया। इसने दो मुल्कों के ख़राब रिश्तों की नींव रखी।
 
सैनिक इतिहासकार मेजर (रिटायर्ड) आगा हुमायूं अमीन ने अपनी किताब 'द 1947-48 कश्मीर वॉर: द वॉर ऑफ लस्ट ऑपर्च्यूनिटीज' में लिखा है, "मेजर जनरल अकबर खान के बारे में माना गया कि उन्होंने इस कबायली हमले का षडयंत्र रचा था। सरकारी मदद से सशस्त्र नॉन-स्टेट एक्टर्स को घुसपैठ कराकर जंग लड़ने की शैली उन्हीं की देन समझी जाती है।"
 
पाकिस्तान की रणनीति
आगा हुमायूं अमीन के मुताबिक़ पाकिस्तान ने 1965 में कश्मीर में यही रणनीति अपनाई। 1988-2003 के दरमियान कश्मीर में चरमपंथ से लेकर 1999 में कारगिल में यही रणनीति अपनाई गई। अफगानिस्तान में भी ऐसे नॉन-स्टेट एक्टर्स भेजे गए।
 
लेकिन कश्मीर को आज़ाद कराने या अफगानिस्तान को सुधारने के बजाय, ये तरीका राजनीतिक प्रक्रिया की कमजोरी का कारण बन गया। इसने न केवल कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान का समाज लड़ाकू हो गया बल्कि पाकिस्तान भी इससे अछूता नहीं रहा।

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