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आज़ादी सैटेलाइट क्या है, जिससे जुड़ी हैं 750 लड़कियां

Written By BBC Hindi
Updated: रविवार, 7 अगस्त 2022 (09:27 IST)
दिलनवाज़ पाशा, बीबीसी संवाददाता
भारत की आज़ादी के 75 साल पूरे होने पर मोदी सरकार की ओर से देश भर में मनाए जा रहे अमृत महोत्सव के तहत रविवार को इसरो ने आज़ादीसैट नाम की एक सैटेलाइट लॉन्च किया। इस सैटेलाइट की ख़ास बात ये है कि इसे बनाने में देश भर के सरकारी स्कूलों की 750 छात्राओं ने सहयोग किया है।
 
इस सैटेलाइट को 'स्पेस किड्ज़ इंडिया' नाम की एक कंपनी ने बनाया है और इसे इसरो के स्मॉल सेटेलाइट लॉन्च व्हिकल (एसएसएलवी) से लॉन्च किया जाएगा। ये एसएसएलवी की पहली उड़ान भी होगी।
 
ये सैटेलाइट सतीश धवन स्पेस सेंटर श्रीहरिकोटा से लॉन्च होगी और इस दौरान प्रोजेक्ट का हिस्सा रहीं चार सौ से अधिक छात्राएं भी वहां मौजूद रहेंगी।
 
8 किलो की इस सैटेलाइट में 75 फेमो एक्सपेरिमेंट हैं और इसमें सेल्फ़ी कैमरा भी लगा है जो इसके अपने सोलर पैनल की तस्वीरें लेगा।
 
सपनों की उड़ान
सैटेलाइट इंडिया की सीईओ श्रीमथि केसन ने बीबीसी से कहा, "आज़ादी सैट 750 लड़कियों की भावना है। ये उनके आगे बढ़ने का ख़्वाब है। देश के अलग-अलग हिस्सों के सरकारी स्कूलों से जुड़ी छात्राओं को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया। इसका मक़सद लड़कियों में विज्ञान से जुड़ी जागरूकता फैलाना है।"
 
श्रीमथि केसन कहती हैं, "सीधे तौर पर इस प्रोजेक्ट से 750 लड़कियां जुड़ी हैं लेकिन इस प्रोजेक्ट के ज़रिए हमने लाखों बच्चों तक विज्ञान को पहुँचाया है। छोटे-छोटे ज़िलों और क़स्बों के स्कूलों को जोड़ा गया।"
 
सैटेलाइट का पेलोड डिवेलप करने का प्रोजेक्ट क़रीब छह महीनों तक चला और इस दौरान प्रोजेक्ट से जुड़ी छात्राओं को ऑनलाइन क्लास दी गईं।
 
केसन कहती हैं, "आज़ादी सैट उड़ान भर रही है। लेकिन इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी और ख़ास बात ये है कि हम विज्ञान को उन स्कूलों और बच्चों तक लेकर गए जो कहीं ना कहीं बहुत पिछड़े हैं। इस प्रोजेक्ट का असली मक़सद लड़कियों में वैज्ञानिक सोच का विकास करना है।"
 
इस प्रोजेक्ट से जुड़ी 750 में से कुल 462 लड़कियों को सैटेलाइट लॉन्च देखने के लिए श्रीहरिकोटा ले जाया जा रहा है।
 
केसन कहती हैं, "इसरो पहुँचना और अपने सैटेलाइट को लॉन्च होते हुए देखना छात्राओं के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। हम चाहते थे कि सभी छात्राओं को लाया जाए लेकिन लॉजिस्टिकल कारणों की वजह से वो संभव नहीं हो पाया।"
 
केवल लड़कियाँ ही क्यों?
इस प्रोजेक्ट में लड़कियों को शामिल करने की वजह बताते हुए श्रीमथि केसन कहती हैं, "मैं एनसीसी से जुड़ी थी, बेस्ट कैडेट रही और सेना में सीधे भर्ती हुई। लेकिन मेरी सिर्फ़ 18 साल की उम्र में शादी हो गई थी। एक लड़की के सामने जो चुनौतियां होती हैं, मैं उनसे गुज़र चुकी हूँ। मेरा सपना था कि मैं लड़कियों में जागरूकता पैदा करूं और उन्हें बड़े सपने देखना सिखाऊं। अंतरिक्ष में अपने ख़्वाब को पहुँचाने से बड़ा और क्या ही होगा। इसलिए ही हमने इस प्रोजेक्ट में सिर्फ़ लड़कियों को चुना क्योंकि हम उन्हें बड़े सपने दिखाना चाहते थे।"
 
केसन कहती हैं, "जब हम छात्राओं की ऑनलाइन क्लास ले रहे थे तब हम उन्हें सिर्फ़ विज्ञान नहीं सिखा रहे थे बल्कि ये आत्मविश्वास भी भर रहे थे कि वो कुछ भी कर सकती हैं और कहीं भी पहुँच सकती हैं। जो छात्राएं हमारे साथ जुड़ी हैं वो अब वैज्ञानिक बनने का सपना देख रही हैं।"
 
"हमने बच्चियों के मन में विज्ञान और आत्मविश्वास का बीज डाल दिया है और हम ये विश्वास करते हैं कि एक पुल बन जाएगा जो उन्हें विकास और प्रगति से जोड़ेगा। लड़कियों के विकास के बिना देश के पूर्ण विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है।"
 
भारत आज़ादी के 75 वर्ष मना रहा है लेकिन सामाजिक और आर्थिक तौर पर अभी देश की आधी आबादी के सामने बड़ी चुनौतियां हैं।
 
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में साक्षरता दर 74 प्रतिशत है लेकिन महिलाओं की साक्षरता दर सिर्फ़ 64 प्रतिशत है।
 
भारत सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2013 में उच्च शिक्षा के मामलों में प्रति सौ पुरुषों की तुलना में 81 महिलाओं ने ही उच्च शिक्षा के लिए दाख़िला लिया।
 
वैज्ञानिक सोच पैदा करना मक़सद
श्रीमथि केसन कहती हैं कि इस प्रोजेक्ट का मक़सद छात्राओं की सोच के दायरे को बढ़ाना और विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें मौके दिखाना भी है।
 
वो कहती हैं, "बहुत सी छात्राओं के मन में ये सोच भी नहीं थी कि वो वैज्ञानिक भी बन सकती हैं। वो इंजीनियर या डॉक्टर बनने का तो सोचती हैं लेकिन वैज्ञानिक बनना उनकी सोच से बाहर था। अब हमने उनके मन में विज्ञान का बीज डाल दिया है और वो वैज्ञानिक बनने का सपना देखने लगी हैं।"
 
इस प्रोजेक्ट से देश के अलग-अलग हिस्सों के 75 सरकारी स्कूलों की छात्राओं को जोड़ा गया है। अमृतसर के मॉल रोड स्थित सरकारी कन्या स्कूल की छात्राओं का एक दल भी लांच का हिस्सा बनने के लिए श्रीहरिकोटा पहुँचा हैं।
 
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार रविंद्र सिंह रॉबिन से बात करते हुए इस दल में शामिल छात्राओं ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की। छात्राओं के इस दल ने सेटेलाइट के लिए एक चिप बनाई है जो अंतरिक्ष में प्रयोग का हिस्सा होगी। इसमें कई सेंसर लगे हैं।
 
इस दल में शामिल एलिज़ा कहती हैं, "हमें छह महीने लगे। हमने एक चिप बनाई है जो सेटेलाइट में इंस्टॉल की गई है। मन में बहुत कुछ चल रहा है। उत्साह बहुत है। एक नई जगह जा रहे हैं, जहाँ बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।"
 
इनमें से कई छात्राओं के लिए ये पहला मौक़ा है, जब वो अपने शहर से बाहर निकल रही हैं। ऐसी ही एक छात्रा ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए बीबीसी से कहा, "मैं पहली बार विमान में बैठ रही हूँ। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं फ्लाइट में बैठूंगी, लेकिन सपने सच होते हैं।"
 
वो कहती हैं, "इस प्रोजेक्ट ने मुझे सपने देखना सिखाया है। हो सकता है आगे चलकर मैं स्वयं वैज्ञानिक बन जाऊं।"
 
श्रीमथि केसन इस प्रोजेक्ट के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी शुक्रिया अदा करती हैं। वो कहती हैं, "प्रधानमंत्री जी का सबसे बड़ा सहयोग ये है कि उन्होंने इसके लॉन्च के लिए हाँ कह दिया। अब हमारा सपना है कि इस प्रोजेक्ट का हिस्सा रहीं लड़कियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का मौक़ा मिले।"
 
केसन कहती हैं, "प्रधानमंत्री ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा दिया है। हम तो बेटियों को अंतरिक्ष में ले जा रहे हैं। हमें विश्वास हैं कि ये बेटियां विज्ञान के ज़रिए देश की प्रगति यात्रा का हिस्सा होंगी।"
 
भारत में लड़कियों को कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ता है और जीवन और समाज के कई क्षेत्रों में लड़कियाँ आज भी बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं।
 
केसन कहती हैं, "मैं ये मानती हूँ कि लड़कियों को अब भी पूरी आज़ादी हासिल नहीं है लेकिन लड़कियों ने बहुत कामयाबी भी हासिल की है और बहुत बड़े बदलाव आए हैं। हम आज लड़कियों का बनाया सेटेलाइट लांच कर पा रहे हैं ये अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।"
 
केसन कहती हैं, "हमें लोगों के दिमाग़ से वो तस्वीर हटानी है जिसमें भारत की बेटी को गंदे कपड़े पहने हुए सर पर पानी का मटका लेकर चलते हुए दिखाया जाता है। हम बेटियों के हाथ में सेटेलाइट दे रहे हैं और भारत की बेटी की यही तस्वीर दुनिया को दिखाना चाहते हैं।"

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