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भारत की वो ‘पनडुब्बी डील’ जिसपर है स्पेन से लेकर जर्मनी तक की नज़र

Written By BBC Hindi
Updated: शुक्रवार, 9 जून 2023 (07:54 IST)
अनंत प्रकाश, बीबीसी संवाददाता
जर्मन डिफेंस कंपनी टीकेएमएस ने बीते बुधवार मझगांव डॉक्स लिमिटेड के साथ छह पनडुब्बियों के प्रोजेक्ट पर बिडिंग करने के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए हैं। ये समझौता जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस के चार दिवसीय भारत दौरे पर हुआ है जिसके तहत वह और उनके साथ आया जर्मन डेलिगेशन बीते बुधवार मुंबई पहुंचा था। मझगाँव डॉक्स शिपबिल्डर्स (एमडीएल) भारतीय नौसेना के लिए जहाज समेत अन्य साजो-सामान बनाती है।
 
इस करार से पहले मंगलवार को पिस्टोरियस और भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक हुई। इसमें भारत ने जर्मनी से उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में तैयार हो रहे रक्षा औद्योगिक गलियारों में निवेश करने के लिए अपील की।
 
लेकिन इस दौरे के केंद्र में वो सबमरीन डील है जिसे हासिल करने के लिए जर्मनी समेत स्पेन और दक्षिण कोरिया की कंपनियां कोशिश कर रही हैं।
 
पिस्टोरियस ने सबमरीन डील पर क्या कहा?
भारत आने से पहले जर्मन लोक प्रसारक डॉयचे वैले को दिए इंटरव्यू में पिस्टोरियस ने भारत को पनडुब्बियां बेचने वाले संकेत दिए थे।
 
उन्होंने कहा था कि “जब मैं भारत पहुँचूंगा तब मेरे साथ जर्मनी के रक्षा उद्योग के प्रतिनिधि भी होंगे और मैं ये संकेत देना चाहूंगा कि हम इंडोनेशिया, भारत जैसे अपने भरोसेमंद सहयोगियों का सहयोग करने के लिए तैयार हैं। उदाहरण के लिए, इसमें जर्मन पनडुब्बियां की डिलिवरी भी शामिल होंगी।”
 
बता दें कि भारतीय नौसेना छह पारंपरिक पनडुब्बियां ख़रीदना चाहता है जिनकी कुल कीमत लगभग 43000 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
 
भारत पहुंचने के बाद पिस्टोरियस ने इस डील को लेकर कहा है कि “हम टीकेएमएस के लिए छह पनडुब्बियों की डील पर बात कर रहे हैं। इस मामले में अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। लेकिन मुझे लगता है कि इस डील को हासिल करने की दिशा में जर्मनी की डिफेंस इंडस्ट्री अच्छी स्थिति में है।”
 
टीकेएमएस यानी थीसनक्रुप एक जर्मन कंपनी जो नौसेनाओं के लिए जहाज, पनडुब्बियों समेत दूसरे साजो-सामान बनाती है।
 
दूसरे देशों की कंपनियां भी रेस में शामिल
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, टीकेएमएस भारतीय नौसेना के लिए इन छह पनडुब्बियों की डील जिसे ‘प्रोजेक्ट 75 इंडिया’ के लिए आवेदन कर सकता है।
 
हालांकि, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस डील को हासिल करने की रेस में लगी कंपनियों में जर्मनी की टीकेएमएस, स्पेन की नावांटिया और दक्षिण कोरिया की दाइवू शामिल हैं।
 
रूस और फ्रांस के पास एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन तकनीक नहीं होने की वजह से वे इस रेस से बाहर बताए जा रहे हैं।
 
बीते बुधवार हुए करार के बाद अब जर्मनी की टीकेएमएस भारतीय कंपनी एमडीएल के साथ मिलकर बिडिंग करने की स्थिति में आ गयी है। बिडिंग की आख़िरी तारीख़ 1 अगस्त तय की गयी है।
 
कितनी अहम है ये पनडुब्बी डील
भारतीय नौसेना के पास इस समय कुल 16 पनडुब्बियां हैं जिनमें से 15 पनडुब्बियां पारंपरिक और एक पनडुब्बी परमाणु ऊर्जा पर आधारित है। लेकिन भारत की ज़्यादातर पारंपरिक पनडुब्बियां पुरानी हो चुकी हैं।

इसी वजह से भारतीय नौसेना ने साल 2027 तक अपनी पनडुब्बियों की संख्या बढ़ाकर 24 करने की योजना बनाई थी। भारतीय नौसेना ने साल 2007 में इस दिशा में प्रयास करना शुरू किए थे।

रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ राहुल बेदी ने बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में इस डील की अहमियत बयां की है। वे कहते हैं, “भारतीय नौसेना अपनी दीर्घकालिक योजना के तहत 2027 तक अपनी पारंपरिक पनडुब्बियों की संख्या को बढ़ाकर चौबीस तक ले जाना चाहती है। लेकिन इस समय भारतीय नौसेना के पास सोलह पनडुब्बियां हैं।
 
इनमें से दस से ज़्यादा पनडुब्बियां 25 से 28 साल पुरानी हैं। ऐसे में इन पनडुब्बियों को या तो रिटायर करना पड़ेगा या उन्हें अपग्रेड करना पड़ेगा। इस कमी को पूरा करने के लिए ही इन छह पनडुब्बियों को भारत में बनाने की योजना बनाई गयी थी।”
 
कितनी ख़ास है ये पनडुब्बी
अब तक मिली जानकारी के मुताबिक़, ये पनडुब्बी एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन सिस्टम से लैस होगी जो इन्हें लंबे वक़्त तक पानी में रहने की क्षमता देगी।
 
राहुल बेदी बताते हैं, “एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन सिस्टम एक ऐसी तकनीक है जो पारंपरिक पनडुब्बियों की पानी में रहने की समयसीमा को काफ़ी बढ़ा देती है। सामान्य रूप से पारंपरिक पनडुब्बियों को हर 24 से 48 घंटे में ऑक्सीज़न लेने के लिए पानी से बाहर आना पड़ता है जिसकी वजह से दुश्मन को उनकी मौजूदगी का पता लग सकता है। एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन सिस्टम के दम पर पनडुब्बियां लगभग सात दिन तक पानी के अंदर रह सकती हैं।”
 
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, फ्रांस और रूस इस तकनीक की वजह से इस पनडुब्बी समझौते की रेस से बाहर हो गए हैं। और अब मुक़ाबला दक्षिण कोरियाई कंपनी दाइबू और जर्मन कंपनी टीकेएमएस के बीच है।
 
लेकिन सवाल उठता है कि नौसेना महीनों तक पानी के अंदर रहने में सक्षम परमाणु ऊर्जा आधारित पनडुब्बियों में रहने की जगह पारंपरिक पनडुब्बियां क्यों हासिल करना चाहती है।
 
इसका जवाब देते हुए राहुल बेदी कहते हैं, “पारंपरिक पनडुब्बियों को उनकी तेज गति से घातक प्रहार करने की क्षमता की वजह से हंटर किलर पनडुब्बियां भी कहा जाता है। ये काफ़ी तेज गति से चलती हैं। अगर इनके सामने ऑक्सीजन लेने के लिए पानी से बाहर आने की मजबूरी न हो तो ये सात से दस दिन तक पानी में रह सकती हैं जिससे इनकी क्षमता बढ़ जाती है।”
 
“यही नहीं, इन पनडुब्बियों में पानी के अंदर से ज़मीन पर दो सौ से तीन सौ किलोमीटर स्थित लक्ष्य को भेदने की क्षमता है। इसकी वजह से इसकी मारक क्षमता काफ़ी हद तक बढ़ जाती है।”
 
कब तक आ पाएगी पहली पनडुब्बी
सवाल ये उठता है कि पनडुब्बियों को बनाने की दिशा में काम जिस गति से आगे बढ़ रहा है, उस हिसाब से भारतीय नौसेना को पहली पनडुब्बी कब तक मिल सकती है।
 
राहुल बेदी बताते हैं, “ये डील जिस रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, उस लिहाज़ से इस डील पर हस्ताक्षर अब से लगभग तीन साल बाद होने की संभावना है और पहली पनडुब्बी जल्द से जल्द 2033 तक आ पाएगी। क्योंकि ये एक बेहद जटिल प्रोजेक्ट है।”
 
भारतीय नौसेना को अगले चार सालों में पारंपरिक पनडुब्बियों की संख्या को 24 तक ले जाना था। लेकिन अब तक जिस तरह के संकेत मिले हैं, उनके मुताबिक़ नौसेना के लिए ये लक्ष्य हासिल बेहद मुश्किल है।

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