बीजेपी ने द्रौपदी मुर्मू को उतार कैसे विरोधी पार्टियों को भी मजबूर कर दिया

BBC Hindi| Last Updated: गुरुवार, 23 जून 2022 (08:22 IST)
रवि प्रकाश, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
अगले महीने होने वाला राष्ट्रपति चुनाव अपनी शुरुआत में ही रोमांचक हो गया है। केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके गठबंधन दलों ने झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर वैसे तो कई क्षेत्रीय दलों के लिए पसोपेश की स्थिति पैदा कर दी है।
 
लेकिन सबसे बड़ी दुविधा झारखंड के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन के लिए है। कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) उनकी सरकार में शामिल हैं और ये तीनों पार्टियां विपक्षी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की प्रमुख घटक हैं।
 
लिहाजा, स्वाभाविक तौर पर राष्ट्रपति चुनाव के लिए उनका समर्थन यूपीए के आधिकारिक प्रत्याशी और झारखंड की हजारीबाग लोकसभा सीट से तीन बार सांसद रहे पूर्व नौकरशाह यशवंत सिन्हा को मिलना चाहिए।
 
इसके बावजूद हेमंत सोरेन के निर्णय को लेकर देशभर की पार्टियों और राष्ट्रीय मीडिया में कौतूहल की स्थिति है, तो इसकी एक बड़ी वजह भी है। ट्विटर पर हमेशा सक्रिय रहने वाले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों को लेकर इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक कोई ट्वीट नहीं किया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं हेमंत सोरेन किसी दबाव में तो नहीं।
 
हेमंत सोरेन के सामने चुनौती
दरअसल, बीजेपी ने जिन द्रौपदी मुर्मू को अपना उम्मीदवार बनाया है, वह संथाल आदिवासी हैं। भारत की आजादी के 74 साल बाद यह पहला मौक़ा है, जब सत्ताधारी गठबंधन ने किसी आदिवासी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है।
 
अगर कोई अप्रत्याशित सियासी खिचड़ी नहीं पके, तो वोटों के अंकगणित के हिसाब से द्रौपदी मुर्मू मज़बूत स्थिति में हैं। अगर वे यह चुनाव जीत जाती हैं, तो देश को अपनी आजादी के 75 वें वर्ष में पहली दफ़ा कोई आदिवासी राष्ट्रपति मिलेगा।
 
इसको लेकर सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चाएं हो रही हैं। आदिवासियों का बहुमत इसे एक बड़े अवसर के तौर पर देख रहा है।
 
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी संथाल आदिवासी हैं और आदिवासियों के मुद्दे को लेकर काफ़ी मुखर रहते हैं।
 
उन्होंने साल 2019 में इस मुद्दे पर मुझे (बीबीसी को) दिए एक इंटरव्यू में कहा भी था कि आदिवासी नेताओं को लुटियंस के इलाक़े में वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे हक़दार हैं।
 
ऐसे में अब अगर किसी संथाली आदिवासी को लुटियन जोन के केंद्र में रायसीना हिल्स की पहाड़ियों पर बने राष्ट्रपति भवन में जाने का अवसर मिलने की संभावनाएं हैं, तो हेमंत सोरेन के पास क्या विकल्प हैं।
 
क्या उनकी पार्टी यूपीए के आधिकारिक प्रत्याशी यशवंत सिन्हा को वोट करेगी या फिर आदिवासी अस्मिता के नाम पर वे यूपीए में रहते हुए भी एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोटिंग के लिए अपनी पार्टी के लोगों को तैयार करेंगे।
 
क्योंकि, देश की सियासत में ऐसे उदाहरण हैं, जब राष्ट्रपति चुनाव में क्षेत्रीय दलों ने अपने गठबंधन से इतर वोटिंग की हो।
 
सोरेन के द्रौपदी मुर्मू से रिश्ते
यह बात और भी महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है क्योंकि द्रौपदी मुर्मू से उनके निजी रिश्ते काफ़ी मधुर रहे हैं। कई मौक़ों पर वे अपनी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ उनसे मिलते जाते रहे हैं और दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की प्रतिष्ठा का हमेशा ख्याल रखा है। हालांकि, हेमंत सोरेन ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
 
उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि यह निर्णय जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष के साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ही लेना है। जेएमएम के एक बड़े नेता ने बीबीसी से कहा कि हमारी पार्टी विपक्षी पार्टियों की बैठक में शामिल रही है।
 
लिहाजा, इस बारे में मीडिया के कयासों पर कुछ भी कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी। जो भी निर्णय होगा, वह हमारे नेता मिल-बैठकर आपसी सहमति से लेंगे। इसके लिए आपको इंतज़ार करना चाहिए।
 
इस बीच जेएमएम के गिरिडीह के विधायक और पार्टी के महासचिव सुदिव्य कुमार का एक ट्वीट चर्चा में है, जो उन्होंने द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी की घोषणा के तुरंत बाद किया था।
 
उन्होंने जोहार द्रौपदी मुर्मू लिखा, जिसके बाद कयास लगाए जाने लगे कि कहीं जेएमएम भी उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में तो नहीं। सुदिव्य कुमार ने इस बावत कहा कि उनकी व्यक्तिगत इच्छा है कि द्रौपदी मुर्मू देश की राष्ट्रपति बनें।
 
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमारी पार्टी पिछले तीन दशक से भी अधिक वक़्त से आदिवासी अस्मिता, उनके अधिकार और उनके मुद्दों को लेकर लड़ती रही है। अब जब किसी आदिवासी नेता को पहली बार राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया गया है, तो मेरी प्रबल इच्छा है कि हमें उनका समर्थन करना चाहिए। हालांकि, यह मेरी नितांत व्यक्तिगत राय है। इस मुद्दे पर जेएमएम जो भी निर्णय लेगा, मैं उसके साथ ही जाऊंगा। मेरा वोट उसी को मिलेगा, जिसे मेरी पार्टी समर्थन देगी।"
 
क्या कहते हैं राजनीतिक विशेषज्ञ
रांची में प्रभात खबर के स्थानीय संपादक और राजनीतिक मसलों के जानकार संजय मिश्र कहते हैं कि अगर एक या दो दिनों बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी का समर्थन कर दें, तो आश्चर्य जैसी बात नहीं होनी चाहिए। यह स्वाभाविक बात है।
 
संजय मिश्र ने बीबीसी से कहा, "राष्ट्रपति चुनावों में ऐसा पहले भी हो चुका है। आदिवासी प्राइड और सत्ता में हिस्सेदारी एक बड़ा सवाल है, जिसे आसानी से ख़ारिज नहीं कर सकते। हेमंत सोरेन इससे अलग नहीं हैं। उनकी पार्टी की नीतियां और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि आदिवासी प्राइड के इर्द-गिर्द ही रही है। ऐसे में यह संभावना बनती है कि वे देर-सबेर गठबंधन की लाइन से अलग निर्णय ले लें।"
 
क्या सरकार की सेहत पर असर पड़ेगा
इस सवाल पर संजय मिश्र कहते हैं, "ऐसा हो भी सकता है कि यूपीए प्रत्याशी के ख़िलाफ़ वोटिंग का निर्णय लेने की स्थिति में कांग्रेस उन पर दबाव बनाने की कोशिश करे। लेकिन, झारखंड में कांग्रेस की स्थिति और उसके पुराने इतिहास को देखकर इसकी आशंका फ़िलहाल नहीं दिखती। हालांकि, ये सारी बातें 2-3 दिनों में क्लियर हो जानी चाहिए।"
 
क्षेत्रीय दलों की दुविधा
राष्ट्रपति चुनाव में क्षेत्रीय दलो की दुविधा की यह कोई पहली स्थिति नहीं है। इससे पहले भी कई ऐसे वाक़ये आए हैं, जब पार्टियों ने गठबंधन प्रत्याशी को वोट न देकर उनके प्रतिद्वन्द्वी के पक्ष में वोटिंग की।
 
साल 2007
शिव सेना विपक्षी एनडीए गठबंधन का हिस्सा थी और उस वक़्त बाला साहेब ठाकरे के पास पार्टी की कमान थी। देश में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे थे और केंद्र में सत्तासीन यूपीए ने महाराष्ट्र के जलगांव की निवासी प्रतिभा पाटिल को अपना उम्मीदवार बनाया था।
 
तब शिव सेना ने महाराष्ट्र प्राइड के नाम पर यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल के पक्ष में वोटिंग की और वह देश की पहली महिला और मराठी राष्ट्रपति निर्वाचित हुईं।
 
तब बाला साहेब ठाकरे ने कहा था कि देश की आजादी के बाद पहली बार महाराष्ट्र की कोई नेता राष्ट्रपति बन सकती है, ऐसे में हम उनसे अलग कैसे रह सकते हैं।
 
हमें पहली बार किसी मराठी को राष्ट्रपति बनाने का अवसर मिला। इसलिए हमारी पार्टी ने एनडीए में रहने के बावजूद उनके पक्ष में वोट देना उचित समझा।
 
साल 2012
पश्चिम बंगाल से ताल्लुक और सभी दलों में अपनी पैठ रखने वाले प्रणब मुखर्जी को यूपीए ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। तब बीजेपी के समर्थन से बिहार के मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडी-यू) ने एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद प्रणब मुखर्जी के लिए वोटिंग की, क्योंकि नीतीश कुमार से उनके बेहतर संबंध थे।
 
तब नीतीश कुमार ने कहा था कि प्रणब मुखर्जी बेहतर उम्मीदवार हैं, लिहाजा उनकी पार्टी ने उनके पक्ष में वोट देने का निर्णय लिया है।
 
इसी चुनाव में पहले प्रणब मुखर्जी के विरोध में मुखर रहीं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बाद में प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का न केवल खुलकर समर्थन किया बल्कि उनकी पार्टी ने बंगाली अस्मिता के नाम पर प्रणब मुखर्जी के पक्ष में वोटिंग भी की।
 
तब कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग पत्रकारों से बात करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि इसके लिए उन्होंने किसी तरह की डील नहीं की है। किसी बंगाली को राष्ट्रपति बनने का मौक़ा मिल रहा है, इसलिए यूपीए का हिस्सा नहीं होने के बावजूद हमारी पार्टी उन्हें वोट करेगी।
 
ममता बनर्जी ने यह भी बताया कि उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह ने भी फ़ोन करके प्रणब मुखर्जी के समर्थन की गुज़ारिश की थी। इसलिए उन्होंने यह निर्णय लिया है। तब उनकी प्रबल विरोधी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) भी प्रणब मुखर्जी के साथ थी। इसके बावजूद वह पहली घटना थी, जब किसी सियासी मुद्दे पर टीएमसी और सीपीएम एक प्लेटफार्म पर साथ खड़ी हुई हों। तब ममता बनर्जी यूपीए से अलग हो चुकी थीं।
 
साल 2017
अब केंद्र की सत्ता एनडीए के हाथ में थी। नरेद्र मोदी साल 2014 में ही भारत के प्रधानमंत्री बन चुके थे। उनके गठबंधन ने बिहार के तत्कालीन राज्यपाल और दलित चेहरे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया।
 
उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लालू यादव की पार्टी आरजेडी और कांग्रेस के समर्थन से बिहार की सरकार चला रहे थे। लालू के बेटे तेजस्वी यादव उनके उपमुख्यमंत्री थे।
 
तब यूपीए ने लोकसभा की अध्यक्ष रह चुकीं मीरा कुमार को अपना प्रत्याशी बनाया था। इसके बावजूद नीतीश कुमार की पार्टी जेडी-यू ने मीरा कुमार की जगह रामनाथ कोविंद के पक्ष में वोटिंग की और वे चुनाव जीतकर राष्ट्रपति भी बने।
 
उनका कार्यकाल 24 जुलाई को ख़त्म हो रहा है। इसलिए देश में राष्ट्रपति के चुनाव हो रहे हैं।
 
साल 2022
इस साल हो रहा राष्ट्रपति चुनाव भी कमोबेश वैसी ही परिस्थितियां लेकर आया है। मूलतः ओड़िशा की रहने वाली झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू एनडीए की प्रत्याशी हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल (बीजेडी) एनडीए का हिस्सा नहीं है।
 
इसके बावजूद ओडिशा प्राइड के नाम पर बीजेडी ने द्रौपदी मुर्मू के समर्थन का निर्णय लिया है। नवीन पटनायक ने दलील दी है कि पहली बार कोई ओड़िया भारत की पहली नागरिक बन सकती है, तो हम उनके पक्ष में क्यों न वोट करे।
 
यह हमारे राज्य की प्रतिष्ठा का मसला है। लिहाजा, बीजेडी उनके पक्ष में वोटिंग करेगी। उनकी इस घोषणा के बाद चुनाव रोमांचक हो चुका है। अब सबकी निगाहें हेमंत सोरेन की तरफ़ हैं कि वे क्या निर्णय लेते हैं।

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