एक बहादुर भारतीय जनरल, जिसे वीर चक्र भी नहीं मिला

Last Updated: मंगलवार, 27 सितम्बर 2016 (19:25 IST)
जनरल रणधीर सिंह बताते हैं, "जनरल साहब देखना चाह रहे थे कि कहां-कहां लैंडिंग हो सकती है। हम मेघना नदी के साथ-साथ जा रहे थे। आशुगंज ब्रिज के पास हेलीकॉप्टर पर नीचे से मीडियम मशीन गन का फ़ायर आया। पायलेट बुरी तरह से घायल हो गया। हम लोगों पर जो उसके पीछे बैठे हुए थे, उनके खून के छींटे और माँस के टुकड़े आकर गिरे, जनरल साहब के माथे पर भी एक चोट लगी।"
"लेकिन उस हेलीकॉप्टर के सह पायलेट ने स्थिति पर नियंत्रण कर लिया और विमान को अगरतला वापस लाने में सफल हो गया। जब हेलीकॉप्टर की जांच की गई तो पता चला कि उसमें गोलियों से 64 सूराख हो गए थे। पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने एक और हेलीकॉप्टर लिया और दोबारा निकल पड़े निरीक्षण पर।"
 
जनरल सगत सिंह को सबसे बड़ी वाह-वाही तब मिली जब उन्होंने चार किलोमीटर चौड़ी मेघना नदी को हेलीकॉप्टर की मदद से एयर ब्रिज़ बना कर पार किया।
 
बांग्लादेश युद्ध में जनरल सगत सिंह की कमांड में काम कर रहे लेफ़्टिनेंट जनरल ओपी कौशिक बताते हैं, "उन दिनों हमारे पास एमआई 4 हेलीकॉप्टर हुआ करते थे। उनमें उन दिनों रात में लैंड करने की काबलियत नहीं होती थी। लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा सैनिक मेघना पार कराने के लिए जनरल सगत ने लाइटेड हैलिपैड बनाने का आदेश दिया। आपको अचंभा होगा कि हमने खाली मिल्क कैन में केरोसीन तेल डाल कर रोशनी की। एमआई हेलीकॉप्टर में एक बार में आठ सैनिक बैठ सकते थे। हमने लगातार सैकड़ों फेरे लगाकर लगभग पूरी ब्रिगेड मेघना के पार उतार दी।"
 
दिलचस्प ये है कि पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल जग्गी अरोड़ा ने उन्हें मेघना नदी न पार करने के निर्देश दिए थे। जब वो मेघना नदी पार कर चुके तो उनके पास जनरल अरोड़ा का फ़ोन आया और दोनों के बीच ज़बरदस्त कहा-सुनी हुई।
 
जनरल कौशिक बताते हैं, "मैं उस समय जनरल सगत सिंह की बगल में ही बैठा हुआ था। कोलकाता से आर्मी कमांडर अरोड़ा का फ़ोन आया कि आपने मेघना नदी क्यों पार की? जनरल सगत सिंह ने कहा आपने मुझे जो काम सौंपा था मैंने उससे ज़्यादा कर दिखाया है।"
 
"इस पर अरोड़ा संतुष्ट नहीं हुए। सगत ने कहा मेरी ये ड्यूटी बनती है कि अगर मुझे किसी कदम से देश का फ़ायदा होता दिखाई देता हो तो मैं वो कदम उठा सकता हूँ। मैंने न सिर्फ़ मेघना नदी पार की है बल्कि मेरे सैनिक तो ढाका के बाहरी इलाके में भी पहुंच चुके हैं। जनरल अरोड़ा ने आदेश दिया, नहीं आप अपने आगे बढ़ चुके सैनिकों को वापस बुलवाइए। सगत सिंह ने कहा मेरा कोई सैनिक वापस नहीं लौटेगा। अगर आप इससे सहमत नहीं है तो आप दिल्ली तक ये मामला पहुंचाइए। इसके बाद सगत सिंह ने गुस्से से फ़ोन रखते हुए कहा वो मुझसे सैनिक वापस बुलाने के लिए कह रहे हैं... ओवर माई डेड बॉडी।"
 
इतना सब कुछ करने के बाद भी जनरल सगत सिंह को कोई वीरता पुरस्कार नहीं दिया गया। उन्हें सिर्फ़ भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म भूषण ही मिला। और तो और उनका प्रोमोशन भी नहीं हुआ।
 
मेजर जनरल वीके सिंह बताते हैं, "ये बहुत दुख की बात है कि 1971 की लड़ाई में जिनका प्रदर्शन सबसे अच्छा था। उन्हें कोई वीरता पुरस्कार नहीं मिला। तमाम लोगों को वीर चक्र और महावीर चक्र मिले, लेकिन सगत सिंह को नहीं मिला। दूसरे उनको प्रमोशन भी नहीं मिला। आर्मी चीफ़ न सही उनको आर्मी कमांडर तो बनाया जा सकता था। शायद इसकी वजह ये रही हो कि उनकी अपने ऊपर के अधिकारियों से अक्सर नोक-झोंक होती रहती थी।"
 
उनकी पौत्री मेघना सिंह कहती हैं, "मेरे दादाजी एक ऐसे इंसान थे जिन्हें आप भीड़ में मिस कर ही नहीं सकते। वो छह फ़ीट तीन इंच लंबे थे। भारी आवाज़ थी उनकी। बहुत ही सौम्य। उनसे कोई भी बात कर सकता था। हम लोग हॉस्टल में रहते थे। जब हम छुट्टियों में घर आते थे तो वो हमारे फ़ार्म हाउस में उगने वाले फलों आम और चीकू को हमारे लिए करीने से प्लेट में काटकर हमारा इंतज़ार करते थे। खाने की मेज़ पर टेबिल मैनर्स के वो बहुत कायल थे। जयपुर में जब पहला पित्ज़ा हट खुला तो वो ही हमें पहली बार वहां लेकर गए थे।"
जनरल सगत सिंह को भारत का सबसे निर्भीक जनरल माना जाता है। उन्होंने न सिर्फ़ कई ऑपरेशनों में जीत हासिल की बल्कि उस सबसे कहीं ज़्यादा काम किया जितना उन्हें करने के लिए दिया गया था। भारतीय सेना में उनको वही मुकाम हासिल है जो अमेरिकी सेना में जनरल पैटन और जर्मन सेना में रोमेल को हासिल था।
 
उनके साथ काम कर चुके जनरल ओपी कौशिक बताते हैं, "मैंने कई लड़ाइयां लड़ी हैं। 1962 में भारत चीन युद्ध के समय मैं कैप्टेन था। उसके बाद 1965 और 1971 के युद्ध में भी मैं था। सियाचिन और कश्मीर में भी मैं जनरल आफ़िसर कमांडिंग रह चुका हूँ। अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि मेरे विचार से भारतीय सेना का बेस्ट फ़ील्ड कमांडर जनरल सगत सिंह हुआ है।"
 
"वो डिस्ट्रीब्यूशन करने यानी लोगों को ज़िम्मेदारी देने में बहुत तेज़ थे। वो काम को डिसेंट्रिलाइज़ करते थे और अपने जूनियर्स पर पूरा भरोसा देते थे। उनमें मोटिवेट करने की भी बहुत ज़बरदस्त भावना थी। अगर कोई ग़लती हो जाती थी तो वो इसके लिए जूनियर को ज़िम्मेदार नहीं ठहराते थे बल्कि उसे खुद सुधारने की कोशिश करते थे और अक्सर उस ग़लती को अपने ऊपर ले लेते थे।"

और भी पढ़ें :