कोरोनाः 'बीमारी इंसान खा ही रही है, बीमारी के बाद इंसानियत भी नहीं बचेगी' - नई लहर में बदहाल बिहार

पुनः संशोधित शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021 (08:11 IST)
सीटू तिवारी, बीबीसी हिंदी के लिए
अनिल सिंह (बदला हुआ नाम) आजकल दोहरी मार झेल रहे है। पहला तो ये कि वो है और दूसरा बिहार की चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था ने उन्हें दिक्कतों में डाल दिया है।
 
पेशे से सरकारी स्कूल में शिक्षक अनिल सिंह ने बीबीसी को बताया कि तेज़ बुख़ार और सिर दर्द की शिकायत लेकर वो 7 अप्रैल को पटना स्थित गार्डिनर रोड अस्पताल जांच के लिए पहली बार गए। लेकिन 4 घंटे तक लाइन में खड़े रहने के बावजूद उनका नंबर नहीं आया। 8 अप्रैल को उनकी जांच किसी तरह हुई लेकिन उन्हें मुंहज़ुबानी बता दिया गया कि वो कोरोना पॉज़िटिव हैं।
 
एक दिव्यांग बच्ची के पिता अनिल बताते हैं, " वो दिन है और आज 15 अप्रैल है, मुझे सरकार की तरफ़ से ना तो लिखित रिपोर्ट मिली और ना ही कोई दवाई या कोई दवाई खाने का सुझाव। बस 9264495667 और 8521305611 से फोन आते रहे कि आप कोरोना पॉज़िटिव हैं। बाद में कुछ जान पहचान के डॉक्टरों से फोन पर ही पूछकर दवाई ली।"

वो आगे बताते हैं, "मुझे स्कूल में छुट्टी के लिए आवेदन देना था, जिसके लिए मुझे लिखित रिपोर्ट चाहिए। लेकिन मुझे कहा गया कि रिपोर्ट अस्पताल आकर ले लीजिए। क्या सरकार ये उम्मीद करती है कि कोरोना मरीज़ खुद जाकर रिपोर्ट ले? बाद में मैंने 1100 रूपए ख़र्च करके लाल पैथ लैब को सैंपल दिया, जिसने मेरी रिपोर्ट मुझे ऑनलाइन भेजी। ये रिपोर्ट लगाकर अब मैंने स्कूल में छुट्टी का आवेदन दिया है।"

इंजेक्शन - गैस की कमी
60 साल की सीमा सहाय को उनके परिजन देवघर (झारखंड) से बेहतर इलाज की उम्मीद में पटना लाए थे। उनका एंटीजन टेस्ट पॉज़िटिव आया था, जबकि आरटी पीसीआर टेस्ट रिपोर्ट का इंतज़ार 14 अप्रैल की रात को हुई उनकी मौत के बाद भी जारी है।

उनके परिजन सुमित कुमार ने बीबीसी हिंदी को बताया, " सरकारी अस्पताल ने भर्ती नहीं लिया तो हम लोग प्राइवेट अस्पताल ले कर गए। वहां अस्पताल ने 6 रेमडेसिविर इंजेक्शन की जरूरत बताई थी जिसमें से दो अस्पताल में दिए लेकिन चार इंजेक्शन नहीं मिल पाए। रात 9 बजे अस्पताल प्रशासन ने वीडियो कॉल कराके मरीज से बात भी करवाई लेकिन 9 बजकर 15 मिनट पर सूचना दी कि उनकी मृत्यु हो गई।"

दयानंद कुमार के 40 वर्षीय भाई विष्णुकांत चौधरी को भी रेमडेसिविर इंजेक्शन की ज़रूरत पड़ी तो बिहार में उन्हें ये इंजेक्शन नहीं मिला। दयानंद बताते है, " हम लोगों ने दिल्ली से इंजेक्शन मंगवा तो लिया लेकिन अब भईया के बचने की संभावना बहुत कम है।"
 
बिहार केमिस्ट और ड्रगिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष परसन कुमार सिंह ने बीबीसी हिन्दी को बताया, " दवाइयों की डिमांड बहुत ज्यादा है। मांग के हिसाब से कंपनी की तरफ से सप्लाई कम है। रेमडेसिविर इंजेक्शन की उपलब्धता भी डिमांड के हिसाब से कम है। ऐसे में एसोसिएशन की लोगों से यहीं अपील है कि वो दवाइयों का स्टॉक नहीं करें, बल्कि अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही ख़रीदें।"
 
वहीं बिहार के बड़े अस्पतालों में से एक रूबन अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ सत्यजीत ने बीबीसी को बताया, " अबकी बार बहुत ज्यादा मरीज आ रहे है। हमारे पास अभी 132 कोविड मरीज़ हैं। ऑक्सीजन गैस की भारी कमी हम लोग झेल रहे है क्योंकि उसका इस्तेमाल मेडिकल सुविधाओं के अलावा भी अन्य जगहों पर हो रहा है। सरकार को चाहिए कि वो आईजीआईएमएस, एम्स और मेदांता जिसे सरकार ने बहुत सस्ती दर पर सरकारी ज़मीनें दी हैं, उनकी बिल्डिंग्स का इस्तेमाल करें।"
 
69 % डॉक्टर, 92 % नर्स की कमी
साफ है कि स्वास्थ्य की आधारभूत संरचना के मामले में देश में सबसे निचले पायदान पर खड़े बिहार राज्य की सरकार के लिए कोरोना महामारी से लड़ना और उस पर काबू पाना मुश्किल साबित हो रहा है। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने 12 अप्रैल को अपने एक ट्वीट में कैग रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा था, " बिहार में 69 फीसदी डॉक्टर, 92 फीसदी नर्स और 56 फीसदी शिक्षकों की कमी है।"

चिकित्सकों की कमी से इतर अगर आप सरकार का सिर्फ दवाईयों के मद पर ख़र्च देखें तो ये बहुत कम है। मई 2017 में राज्य के स्वास्थ्य संगठनों ने एक रिपोर्ट जारी करके बताया था कि सरकार दवाई के मद पर प्रति व्यक्ति प्रति साल महज़ 14 रूपए खर्च कर रही है। इसे 14 रूपए से 40 रूपए करने के लिए इन संगठनों ने अभियान भी चलाया था। वर्तमान में संगठनों का मानना है कि ये खर्च महज़ 15 रूपए हुआ है जिसे बढ़ाकर 50 रूपए करने की मांग है।
 
बिहार जन स्वास्थ्य अभियान के समन्वयक डॉ शकील कहते है, " कोविड की पहली लहर के बाद सरकार को तीन स्तरों पर तैयारी करनी चाहिए थी। पहला फिज़िकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर, दूसरा ह्यूमन रिसोर्स यानी डॉक्टर नर्स आदि की उपलब्धता और तीसरा सप्लाई चेन ऑफ मेडिसिन पर। सरकार ने इन तीनों ही स्तर पर कोई तैयारी नहीं की जबकि दूसरी के बाद कोरोना की तीसरी लहर भी आ सकती है।"
 
भयावह होते आँकड़े
आँकड़ों में देखें तो 14 अप्रैल को राज्य के स्वास्थ्य विभाग के जारी आँकड़ों के मुताबिक 24 घंटे के अंदर 4786 नए मामले जुड़े और 21 लोगों की मौत हुई। हाल के दिनों में किसी एक दिन में सबसे ज्यादा सामने आए पॉज़िटिव केस है।
 
14 अप्रैल को राज्य में 23,724 एक्टिव केस हो गए जबकि 10 अप्रैल को ये 11,998 थे। यानी महज 4 दिन के अंतराल में ये लगभग दोगुने हो गए।
 
वहीं राज्य का रिकवरी रेट लगातार घट रहा है। 14 अप्रैल को ये 91.40, 13 अप्रैल को 92।50, 12 अप्रैल को 93.48, 11 अप्रैल को 94.24 और 10 अप्रैल को ये 95.13 फीसद था। राज्य में 14 अप्रैल तक 54,64,210 लोगों ने टीका लिया था।
 
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने टीके का दूसरा डोज़ लेने के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘शहरी इलाकों के अलावा अब ये ग्रामीण इलाकों में भी फैल रहा है। सरकार का जोर ज्यादा जांच और टीकाकरण है। बाहर से आए लोगों की जांच की जा रही है और राज्य में स्वास्थ्य / आपदा प्रबंधन विभाग के साथ सभी विभाग समन्वय बनाकर काम कर रहे है। 17 अप्रैल को सभी दलों की बैठक बुलाई गई है जिसमें विचार विमर्श होगा।‘
 
वहीं इस पूरे मसले पर स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके कहा है, " कोविड 19 इमेरजेंसी के लिए 33।12 करोड़ की राशि उपलब्ध कराई गई है। इससे पहले भी 80 करोड़ रूपए का आवंटन कोरोना महामारी से बचाव के लिए आवश्यक सामग्री की खरीद के लिए बिहार चिकित्सा सेवा व आधारभूत संरचना को दिया जा चुका है। इसके अलावा एनएमसीएच, पीएमसीएच, पटना एम्स सहित अन्य मेडिकल कॉलेजों में बेड बढ़ाने का निर्देश दिया गया है। अनुमंडल अस्पतालों को भी कोरोना मरीजों की बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था का निर्देश दिया गया है।"
 
इस बीच सारी सरकारी तैयारी और संवेदनशीलता को धता बताने वाला एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है जिसमें एक कोरोना पॉज़िटिव भूतपूर्व सैनिक विनोद सिंह की मौत 13 अप्रैल को इलाज के इंतज़ार में हो गई। परिवार वालों के मुताबिक, उनके मरीज़ को 90 मिनट पर एम्बुलेंस में ही इंतज़ार कराया गया।
 
स्थानीय स्तर पर चल रही रिपोर्ट्स के मुताबिक जब ये मरीज़ एडमिट होने का इंतजार कर रहा था, एनएमसीएच के डॉक्टर दौरे पर आए स्वास्थ्य मंत्री के साथ थे। हालांकि एनएमसीएच अधीक्षक डॉ बिनोद कुमार सिंह ने इससे इंकार करते हुए कहा है कि अस्पताल में मरीज़ मृत लाया गया था।
 
हर आवाज़ में डर, हर चेहरा नाउम्मीद
जिन घरों मे कोविड ने अपनी दस्तक दे दी है, वो डर के साए में है। लेकिन इस वक्त हर आवाज में डर का बसेरा है और चेहरे पर नाउम्मीदी पसरी है।
 
फारबिसगंज में दवाई के काम से जुड़े कृष्णा मिश्रा फोन पर कहते है, "रोज लोग सिर्फ अपने परिजनों के मरने की सूचना देने और मदद मांगने के लिए फोन करते हैं। कहीं से कोई अच्छी खबर सुनाई नहीं देती। ऐसा लगता है जैसे मौत नाच रही है।"
 
जिन लोगों का रोजाना लाश से साबका पड़ता था, वो भी इस डर की डोर में बंधे। 64 साल के नवल किशोर शर्मा 1985 से लाश की फोटोग्राफी करते थे। मोबाइल क्रांति के बाद अब वो पटना के बांसघाट स्थित विद्दुत शवदाह गृह में दाह संस्कार में इस्तेमाल होने वाले सामान की दुकान लगाते हैं।
 
उन्होंने बीबीसी से फ़ोन पर बताया, "13 अप्रैल को यहां 35 लाश आई थी। यहां एक बिजली वाली मशीन ख़राब है तो दूसरी की भी स्थिति अच्छी नहीं है। वो भी ख़राब होती रहती है। सुबह से जो आदमी अपने परिजन को जलाने के लिए लाइन लगाता है तो पांच-छह घंटे के इंतज़ार के बाद ही उसका नंबर आता है। बाकी यहां पर लाश जलाने के नाम पर दलाल सक्रिय है और इस आपदा में भी खूब लूट मची है। बीमारी इंसान तो खा ही रही है लेकिन बीमारी जाने के बाद इंसानियत भी नहीं बचेगी।"
 

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