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उत्तरप्रदेश में 'बीजेपी सीएम' की घुड़दौड़

Updated: शुक्रवार, 20 जनवरी 2017 (16:33 IST)
- नितिन श्रीवास्तव
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह बस्ती ज़िले में बूथ प्रभारियों की एक बैठक ले रहे थे। जुलाई, 2016 की इस दोपहर, शाह के भाषण के बीच, कुछ कार्यकर्ताओं ने एकाएक खड़े होकर योगी आदित्यनाथ के नारे लगाने शुरू कर दिए।
'हमारा सीएम कैसा हो, आदित्यनाथ जैसा हो" के नारों से नाराज़ मंच पर मौजूद अमित शाह ने गुस्से में कहा, "भाषण जारी रखें या बंद कर दें?" बाद में इसी भाषण में अमित शाह ने कहा कि गोरखनाथ मंदिर के प्रमुख पुजारी और गोरखपुर से सांसद "योगी आदित्यनाथ का नाम उत्तर प्रदेश में ऊर्जा प्रदान करता है"। इसी मंच पर प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य भी बैठे थे जो मुस्कुराने की 'भरपूर कोशिश' कर रहे थे।
 
जहां ये क्षेत्रीय बूथ सम्मलेन जारी था उससे सिर्फ़ डेढ़ घंटे की दूरी पर भाजपा सांसद वरुण गांधी का चुनाव क्षेत्र सुल्तानपुर है। बस्ती की बैठक के महीने भर पहले इलाहाबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान शहर के कई हिस्सों में 'वरुण गांधी यानी भावी सीएम" के पोस्टर रातोंरात देखे गए थे।
 
सुल्तानपुर से ही सटा हुआ है अमेठी जहां पर पिछले लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी से हारने के बावजूद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के तूफानी दौरे होते रहे हैं। ऐसे ही एक दौरे से लौटते समय हवाई जहाज़ में मैंने उनसे 'मुख्यमंत्री' पद के बारे में पूछा। मुस्कराती हुई स्मृति का जवाब था, "दफ़्तर आओ, बात करते हैं लेकिन सवाल मंत्रालय से जुड़े ही रखना।"
 
पिछले साल में इन चारों नेताओं का नाम कभी न कभी मुख्यमंत्री पद के लिए 'उछला' है या 'उछलवाया' गया है। लेकिन पार्टी नेतृत्व अभी तक किसी के लिए 'पसीजता' नहीं दिखा है। हाल ही में एक पत्रकार ने अमित शाह से पूछा, "क्या भाजपा राजनाथ सिंह या योगी आदित्यनाथ को प्रदेश के सबसे बड़े पद के लिए प्रोजेक्ट करेगी?"
 
अमित शाह का जवाब पुराना सा था, "भाजपा के लिए कार्यकर्ता महवपूर्ण होते हैं और हमारे यहां आंतरिक लोकतंत्र आज भी ज़िंदा है।"
यूपी चुनाव के निकट आते-आते भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं ने अपने चहेते लीडरों के नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। लेकिन भाजपा को पिछले तीन दशक से कवर कर चुके पत्रकार राजीव बाजपेयी को लगता है 'दाल किसी की नहीं गलने वाली।'
 
उन्होंने कहा, "जातीय-सामाजिक समीकरणों को देखते हुए भाजपा के पास इतनी हिम्मत नहीं की किसी एक नाम की घोषणा करें। वे मोदी के नाम को पीछे रख किसी और का नाम भी नहीं बढ़ाना चाहते क्योंकि नेतृत्व को लगता है मोदी ही जिता सकते है।"
 
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र नाथ भट को लगता है कि भाजपा अपने हाल के इतिहास को दोहराने की मंशा से ऐसा कर रही है। उन्होंने कहा, "हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के पिछले चुनावों में बिना सीएम कैंडिडेट के उतरने और सफल होने का फॉर्मूला भाजपा नेतृत्व के जेहन में लगता है। वैसे भी यूपी में पार्टी के पास विकल्पों का थोड़ा अभाव दिखता है।"
 
इस बीच चार साल प्रदेश अध्यक्ष रह चुके लक्ष्मीकांत बाजपेयी इस बात से इनकार करते नहीं थकते कि यूपी में एक बड़े स्थानीय चेहरे का संकट है। उनके अनुसार, "जिनके पास नेतृत्व है वो क्या संकट में नहीं हैं। अखिलेश के यहां आपस में लड़ाई हो रही है। शीला दीक्षित के नाम की घोषणा के बाद उन्हें मंझधार में छोड़ दिया गया है और मायावती के पास कुछ नया नहीं है। हमारे पास 1000 से ज़्यादा कार्यकर्ता हैं जिनमें से नेतृत्व जिसे कहेगा वो मुख्यमंत्री बन जाएगा।"
हालांकि भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ लोग इस बात से इनकार भी नहीं करते कि पार्टी ने चुनाव की घोषणा से पूरे एक वर्ष पहले टिकट वितरण के साथ इस बात पर गौर किया था कि क्या किसी को बतौर सीएम आगे लाया जा सकता है। इनके मुताबिक़, "पार्टी ने टिकट बांटने के पहले सात आतंरिक सर्वे करवाए जिनमें से तीन की रिपोर्ट सीधे अमित शाह के पास भेजी गई। इसके बाद संघ की सूची, संगठन की सूची और जिलाध्यक्षों की लिस्ट मांगी गई।"
 
इन जानकारों के अनुसार इस लिस्ट के ज़रिए इस बात को पूरी तरह भांप भी लिया गया कि असल में कोई एक ऐसा बड़ा नाम है ही नहीं। पार्टी के कुछ लोगों के अनुसार ऐसे ही तमाम सर्वेक्षणों के ज़रिए ये भी भांप लिया गया था कि दूसरे दलों के किन नेताओं को अपने खेमे में लाया जा सकता है। इस रणनीति में अमित शाह के लिए तीन खास लोग काम कर रहे थे जिसमें ओम माथुर, सुनील बंसल और कृष्ण गोपाल थे जिन्हें प्रदेश के चुनाव प्रभारी पहले ही बना दिया गया था।
 
जानकार बताते हैं कि ओम माथुर ने शुरुआत से ही किसी सीएम कैंडिडेट को प्रोजेक्ट न करने की राय दी और फिर सबने कहा "मोदी ही हमारे फेस रहें तो बेहतर है।" लेकिन अब जब चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं पार्टी में इस बात को लेकर थोड़ी चिंता भी बढ़ रही है कि कुछ क्षेत्रीय नेता और सीएम के दावेदारों के समर्थक कहीं खेल न बिगाड़ने में लग जाएं।
 
टिकट बंटवारे को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराज़गी पहली सूची के बाद ही सामने आ चुकी थी जिसके चलते आगे की लिस्टों में देर की गई। कुछ कार्यकर्ताओं में नाराज़गी इस बात पर भी दिखी कि वितरण में नेतृत्व ने दूसरे दलों से आए नेताओं को निराश नहीं किया है।

इस सब के बीच अगर अपने-अपने नेताओं को सीएम न प्रोजेक्ट किए जाने का रोष बाहर आता गया तो पार्टी को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन जनता के समक्ष पार्टी अभी भी एकजुटता का दम भर रही है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता चंद्रमोहन द्विवेदी ने कहा, "पूरी पार्टी सामूहिक रूप से एक होकर इस चुनाव में उतर रही है और नतीजे हर भ्रम को दूर कर देंगे।"
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