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हिन्दी कविता : लगने लगता है तुम बैठे हो अदृश्य से मेरी साथ की सीट पर
लगने लगता है तुम्हें नहीं पसंद है गियरलेस गाड़ी चलाना तुम्हारे लिए तो गियरलेस गाड़ियां बस औरतों के लिए बनी ... -
हिन्दी कविता : क्या मैं स्त्री हूं
अलसुबह से देर रात मशीन सी भागती हूं मरे अस्तित्व के साथ आधी रात जागती हूं -
होली की कविता: वो होली कोई लौटा दो
सज गए बाजार चीनी पिचकारी से केमिकल से भरी हुई रंगीन सी क्यारी से पर इनमें टेसू वाली चमक कहां से लाऊं मैं -
नवगीत: क्यों बसंत गीत गाते हो
खो गयी कहीं है कोयलिया क्या तुमको है ये भास हुआ सूखे पोखर और पनघट -
हिन्दी कविता: सिकुड़े फुटपाथ
नाचती अट्टालिकाएँ हैं सड़क को मुँह चिढ़ाती चादरें हैं ओस की फुटपाथ अब सिकुड़े पड़े हैं -
कविता: समझाइश की विरासत
इस विरासत को तो उन्हें लेना ही पड़ता है इसी के अनुरूप सर्वस्व गढ़ना ही पड़ता है -
आखिर क्या है लुप्त होती जा रही विधा कुण्डलिया?
विधान तो प्रथम और अंतिम शब्द एक ही रखने का है पर कई कवियों ने इस नियम का पालन नहीं किया है। जैसे काका हाथरसी की अनेक ... -
आखिर क्या होती है लुप्त होती जा रही ‘घनाक्षरी विधा’
कुछ छंदों में मात्राएं गिनी जाती हैं और कुछ में वर्ण। साथ ही हर छन्द की एक विशिष्ठ लय भी होती है। किसी भी छन्द को लिखने ... -
आखिर क्या होती है लुप्त होती जा रही काव्य विधा ‘कह मुकरी’?
अमीर खुसरो ने इस विधा पर बहुत काम किया। उनकी कई कह-मुकरियां बहुत प्रसिद्ध हैं। पर समय के साथ अन्य शास्त्रीय छंदों एवं ... -
हिंदी कविता: आभासी रिश्ते
इबादत और दुआओं के न जाने न जाने कितने लफ्ज़ मिलते हैं दुनिया भर के फूल अब रोज़ मेरे फ़ोन में खिलते हैं -
स्मृति शेष : मेरी यादों में पुरुषोत्तम नारायण सिंह
मेरे ख्यालात थरथरा उठे जब सुबह उठते ही उनके देहावसान की खबर सुनी। पीएन सर.... हां, हम सब जूनियर साहित्यकार इसी नाम से ... -
एक ग्रामीण गृहिणी से उत्कर्ष सरपंच तक का सफर
जब एक अनुभवी गृहिणी किसी कार्यक्षेत्र में आती है तो हर कार्य के लिए उसका एक अलग ही नज़रिया होता है। यही बात इंदौर जिले ...
