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कार्तिक पूर्णिमा व्रत पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, महत्व और कथा

Updated: सोमवार, 27 नवंबर 2023 (09:57 IST)
kartik purnima 2023 : वर्ष 2023 में कार्तिक पूर्णिमा 27 नवंबर 2023, दिन सोमवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार हर साल कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तिथि पर कार्तिक पूर्णिमा व्रत तथा देव दीपावली पर्व मनाया जाता है। दीपावली के पंद्रह दिनों के बाद कार्तिक पूर्णिमा के दिन यह खास पर्व पड़ता है। 
 
कार्तिक पूर्णिमा पूजन के शुभ मुहूर्त: kartik purnima shubh muhurat 2023 
 
इस बार कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ- रविवार, 26 नवंबर 2023 को दोपहर 03.53 मिनट से शुरू होगा। तथा पूर्णिमा तिथि की समाप्ति- सोमवार, 27 नवंबर 2023 को दोपहर 02.45 मिनट पर होगी। उदयातिथि के हिसाब से देव दिवाली और कार्तिक पूर्णिमा व्रत 27 नवंबर सोमवार रखा जाएगा।
 
26 नवंबर 2023 के खास मुहूर्त- 
 
अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11.47 से 12.29 तक।
 
गोधूलि मुहूर्त- शाम 05.22 से 05.49 तक।
 
प्रदोष काल- 26 नवंबर शाम 5.08 से रात्रि 7.47 तक।
 
27 नवंबर 2023 : उदयातिथिनुसार शुभ मुहूर्त - 
 
अभिजीत मुहूर्त- 27 नवंबर, सोमवार सुबह 11.47 से दोपहर 12.30 तक।
 
गोधूलि मुहूर्त- 27 नवंबर, सोमवार शाम 05.21 से शा 05.49 तक।
 
सर्वार्थ सिद्धि योग- 27 नवंबर दोपहर 01.35 से अगले दिन सुबह 06.54 तक।
 
महत्व : पौराणिक मान्यतानुसार देवता अपनी दिवाली कार्तिक पूर्णिमा की रात को ही मनाते हैं। इसलिए यह सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक माना गया है। इस दिन नदी, घाट तथा तीर्थक्षेत्रों में स्नान का और अपनी क्षमतानुसार दान का अधिक महत्व माना गया है। माना जाता है कि इस दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। तथा किसी भी मंदिर, शिवालयों या नदी तट पर दीप दान करना भी विशेष महत्व कहा गया है। मान्यतानुसार इस दिन दीपदान करने से समस्त देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता हैं। 
 
पुराणों में वर्णित हैं कि भगवान शिव ने त्रिपुरारी का अवतार लेकर त्रिपुरासुर और उसके असुर भाइयों को मार दिया था। इसी वजह से इस पूर्णिमा का अन्य नाम त्रिपुरी पूर्णिमा भी है। इसलिए, देवताओं ने राक्षसों पर भगवान शिव की विजय के लिए इस दिन दीपावली मनाई थी। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव की विजय के उपलक्ष्य में, शिवभक्त गंगा घाटों पर तेल के दीपक जलाकर देव दीपावली मनाते हैं। 
 
कार्तिक पूर्णिमा के दिन लोग अपने घरों को सजाकर श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन करके उनकी विशेष कृपा प्राप्त करते हैं। तथा घर के मुख्य द्वार पर हल्दी मिश्रित जल डालकर हल्दी से स्वास्तिक बनाने की परंपरा है। माना जाता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी घर में प्रवेश करके धन-धान्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। 
 
पूजन विधि-Kartik Purnima Puja Vidhi 
 
- 27 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह उठकर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें।
 
- अगर आस-पास में गंगा नदी मौजूद है तो वहां स्नान करें। 
 
- अगर न हो तो घर के पानी गंगा जल मिलाकर स्नान करें। 
 
- सुबह के वक्त मिट्टी के दीये में घी या तिल का तेल डालकर दीपदान करें।
 
- भगवान श्री विष्णु का पूजन करें। 
 
- पूजन के समय- 'नमो स्तवन अनंताय सहस्त्र मूर्तये, सहस्त्रपादाक्षि शिरोरु बाहवे। सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते, सहस्त्रकोटि युग धारिणे नम:।।' मंत्र का जाप करें। 
 
- इस दिन घर में हवन करवाएं अथवा पूजन करें। 
 
- घी, अन्न या खाने की कोई भी वस्तु दान करें।
 
- सायंकाल के समय किसी भी मंदिर में दीपदान करें।
 
- इस दिन श्री विष्णु सहस्त्रनाम, विष्णु चालीसा का पाठ करें। 
 
मंत्र- ॐ विष्णवे नम:, ॐ नारायणाय नम:, ॐ सों सोमाय नमः, ॐ नमः शिवाय, ॐ चं चंद्रमस्यै नम: आदि का अधिक से अधिक जाप करें। 
 
कार्तिक पूर्णिमा की कथा- Kartik Poornima katha 2023
 
इस दिन की पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर नाम का एक राक्षस था। उसके तीन पुत्र थे- तारकक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली...भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया। अपने पिता की हत्या की खबर सुन तीनों पुत्र बहुत दुखी हुए। 
 
तीनों ने मिलकर ब्रह्मा जी से वरदान मांगने के लिए घोर तपस्या की। ब्रह्मा जी तीनों की तपस्या से प्रसन्न हुए और बोले कि- मांगों क्या वरदान मांगना चाहते हो। तीनों ने ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा जी ने उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने को कहा। 
 
तीनों ने मिलकर फिर सोचा और इस बार ब्रह्मा जी से तीन अलग नगरों का निर्माण करवाने के लिए कहा, जिसमें सभी बैठकर सारी पृथ्वी और आकाश में घूमा जा सके। एक हजार साल बाद जब हम मिलें और हम तीनों के नगर मिलकर एक हो जाएं, और जो देवता तीनों नगरों को एक ही बाण से नष्ट करने की क्षमता रखता हो, वही हमारी मृत्यु का कारण हो। ब्रह्मा जी ने उन्हें ये वरदान दे दिया। 
 
तीनों वरदान पाकर बहुत खुश हुए। ब्रह्मा जी के कहने पर मयदानव ने उनके लिए तीन नगरों का निर्माण किया। तारकक्ष के लिए सोने का, कमला के लिए चांदी का और विद्युन्माली के लिए लोहे का नगर बनाया गया। तीनों ने मिलकर तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया। इंद्र देवता इन तीनों राक्षसों से भयभीत हुए और भगवान शिवशंकर की शरण में गए। 
 
इंद्र की बात सुन भगवान शिव ने इन दानवों का नाश करने के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया। इस दिव्य रथ की हर एक चीज देवताओं से बनी। चंद्रमा और सूर्य से पहिये बने। इंद्र, वरुण, यम और कुबेर रथ के चाल घोड़े बने। हिमालय धनुष बने और शेषनाग प्रत्यंचा बने। भगवान शिव खुद बाण बने और बाण की नोंक बने अग्निदेव। इस दिव्य रथ पर सवार हुए खुद भगवान शिव। भगवानों से बनें इस रथ और तीनों भाइयों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। 
 
जैसे ही ये तीनों रथ एक सीध में आए, भगवान शिव ने बाण छोड़ तीनों का नाश कर दिया। यह वध कार्तिक मास की पूर्णिमा को हुआ, इसीलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा नाम से भी जाना जाने लगा। इसी वध के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी कहा जाने लगा। अत: कार्तिक पूर्णिमा के दिन इस कथा को पढ़ने का बहुत महत्व है। 

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