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ज्योतिष विज्ञान में सूर्य और संक्रांति का संबंध जानिए

ज्योतिष विज्ञान में सूर्य का विशेष महत्व है। सूर्य पूर्व दिशा का पुरुष, रक्त वर्ण, पित्त प्रकृति और क्रूर ग्रह है। सूर्य आत्मा, स्वभाव, आरोग्यता, राज्य और देवालय का सूचक तथा पितृ कारक है। सूर्य आत्मबल का, आत्मविश्वास का कारक है। 
 

 

सूर्य का नेत्र, कलेजा, मेरुदंड आदि पर विशेष प्रभाव पड़ता है इससे शारीरिक रोग, सिरदर्द, अपचन, क्षय, महाज्वर, अतिसार, नेत्र विकार, उदासीनता, खेद, अपमान एवं कलह आदि का विचार किया जाता है। 
 
सूर्य एक माह में अपनी राशि बदलता है। सूर्य जब भी किसी भी राशि में प्रवेश करता है तो उस दिन को राशि की संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति को सूर्य के संक्रमण काल का त्योहार भी माना जाता है। एक जगह से दूसरी जगह जाने अथवा एक-दूसरे का मिलना ही संक्रांति होती है। सूर्य जब धनु राशि से मकर पर पहुंचता है तो मकर संक्रांति मनाते हैं। 
 
पुण्यकाल में दांत मांजना, कठोर बोलना, फसल तथा वृक्ष का काटना, गाय, भैंस का दूध निकालना व मैथुन काम विषयक कार्य कदापि नहीं करना चाहिए। 
 
सूर्य पूर्व दिशा से उदित होकर 6 महीने दक्षिण दिशा की ओर से तथा 6 महीने उत्तर दिशा की ओर से होकर पश्चिम दिशा में अस्त होता है। उत्तरायण का समय देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है, वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा गया है। 
 
मकर संक्रांति के बाद माघ मास में उत्तरायण में सभी शुभ कार्य किए जाते हैं। 
 
वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ, संक्रांति विष्णुपद संज्ञक है। मिथुन, कन्या, धनु, मीन संक्रांति को षडशीति संज्ञक कहा है। मेष, तुला को विषुव संक्रांति संज्ञक तथा कर्क, मकर संक्रांति को अयन संज्ञक कहा गया है। 
 
महाभारत के युद्ध में जब भीष्म पितामह को मृत्यु शैया पर लेटना पड़ा था, तब अपनी इच्छा मृत्यु के लिए उन्होंने इसी उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी, इसलिए उत्तरायण पर्व को भीष्म पर्व भी कहते हैं। मकर संक्रांति के दिन भीष्म पितामह ने शरीर का त्याग किया था।


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