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भोलेनाथ भगवान शंकर की भस्म से होते हैं कई रोग दूर, पढ़कर चौंक जाएंगे

Updated: रविवार, 22 जुलाई 2018 (12:38 IST)
भगवान शंकर की प्रिय भस्मी 
 
शिव को बेहद प्रिय है विभूति 
 
भस्म, भस्मी, भभूत या विभूति के नाम से मंदिरों में जो हम आदर से मस्तक पर लगाते हैं और जुबान पर रखते हैं, भगवान आशुतोष शंकर को यह अतिप्रिय है। महाकालेश्वर की भस्मार्ति सारे विश्व में प्रसिद्ध है। बरसों पहले महाकालेश्वर में भस्मार्ति में चिता की भस्मी चढ़ाई जाती थी लेकिन वर्तमान में शुद्ध गोबर के कंडे की राख को छानकर इसे तैयार किया जाता है।

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जलते कंडे में जड़ीबूटी और कपूर-गुगल की मात्रा इतनी डाली जाती है कि यह भस्म ना सिर्फ सेहत की दृष्टि से उपयुक्त होती है बल्कि स्वाद में भी लाजवाब हो जाती है। श्रौत, स्मार्त और लौकिक ऐसे तीन प्रकार की भस्म कही जाती है। श्रुति की विधि से यज्ञ किया हो वह भस्म श्रौत है, स्मृति की विधि से यज्ञ किया हो वह स्मार्त भस्म है तथा कण्डे को जलाकर भस्म तैयार की हो वह लौकिक भस्म है। 
 
विरजा हवन की भस्म सर्वोत्कृष्ट मानी है। भस्म से विभूषित भक्त को देखकर देव-दानव भी प्रसन्न होते हैं। 
 
ब्राह्मण, क्षत्रिय मानस्तों के मंत्र से अभिमंत्रित भस्म लगाएं। 
 
वैश्य त्र्यंबक मंत्र से तथा वनवासी अघोर मंत्र से तथा सन्यासी प्रणव मंत्र से भस्म का त्रिपुण्ड लगाएं। 
 
अतिवर्णामी और योगी लोग ईशान मंत्र से भस्म लगाएं। 
 
शूद्र संकर जाति सधवा, विधवा स्त्री-बालक, ब्रह्मचारी, गृहस्थी, व्रती आदि सब भस्म धारण कर सकते हैं। 
 
भस्मधारी भक्त शिव रूप हो जाता है। पवित्र रहता है। यज्ञ, होम, जप, वैश्वदेव, देवार्चन, संध्या आदि में विभूति के द्वारा त्रिपुंड लगाने से मनुष्य पवित्र रहता है। मृत्यु को जीत लेता है। सब तीर्थों में स्नान का पुण्य फल प्राप्त कर लेता है। 
 
शिव को प्रसन्न करने के लिए गाए गए श्री शिवमहिम्न स्तोत्र में भी उन्हें चिता की भस्म लेपने वाले कहा गया है। 
 
भस्म शरीर पर रक्षा कवच का काम करती है। इसका दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व है। 
 
शैव संप्रदाय के सन्यासियों में भस्म का विशेष महत्व है। 
 
हमें शिव के सभी मंत्रों, श्लोकों और स्त्रोतों में भस्म का वर्णन पढ़ने को मिल जाता है। 
 
जैसे आदिशंकराचार्य ने शिवपंचाक्षर स्तोत्र में कहा है श्चिताभस्मालेप: सृगपि नृकरोटिपरिकर: या 'भस्मांगराकाय महेश्वराय' 
 
शिव का शरीर पर भस्म लपेटने का दार्शनिक अर्थ यही है कि यह शरीर जिस पर हम घमंड करते हैं, जिसकी सुविधा और रक्षा के लिए ना जाने क्या-क्या करते हैं एक दिन इसी इस भस्म के समान हो जाएगा। शरीर क्षणभंगुर है और आत्मा अनंत। 
 
कई सन्यासी तथा नागा साधु पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं। यह भस्म उनके शरीर की कीटाणुओं से तो रक्षा करता ही है तथा सब रोम कूपों को ढंककर ठंड और गर्मी से भी राहत दिलाती है। 
 
रोम कूपों के ढंक जाने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती इससे शीत का अहसास नहीं होता और गर्मी में शरीर की नमी बाहर नहीं होती। इससे गर्मी से रक्षा होती है। मच्छर, खटमल आदि जीव भी भस्म रमे शरीर से दूर रहते हैं।
 

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