Zafar Raza sher urdu litrature | अब भी इंसान मुझमें रहता है
ग़म किसी का हो ग़म समझता हूँ,
अब भी इंसान मुझमें रहता है - ज़फ़र रज़ा
अब भी इंसान मुझमें रहता है - ज़फ़र रज़ा
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