सिंहासन बत्तीसी : इक्कीसवीं पुतली चन्द्रज्योति की कहानी

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महामंत्री के अचानक दुखी और चिन्तित होकर चले जाने पर राजा को लगा कि अवश्य ही महामंत्री को कोई कष्ट है। उन्होंने नौकर से उनके इस तरह जाने का कारण पूछा तो नौकर हिचकिचाया। जब राजा ने आदेश दिया तो वह हाथ जोड़कर बोला कि महामंत्री जी ने मुझे आपसे सच्चाई नहीं बताने को कहा था।

उन्होंने कहा था कि सच्चाई जानने के बाद राजा का ध्यान बंट जाएगा और जो यज्ञ होने वाला है उसमें व्यवधान होगा। राजा ने कहा कि महामंत्री उनके बड़े ही स्वामीभक्त सेवक हैं और उनका भी कर्तव्य है कि उनके कष्ट का हरसंभव निवारण करें।

तब नौकर ने बताया कि महामंत्री जी की एकमात्र पुत्री लम्बे समय से बीमार है। उन्होंने उसकी बीमारी एक से बढ़कर एक वैद्य को दिखाई, पर कोई भी चिकित्सा कारगर नहीं साबित हुई।

दुनिया की हर औषधि उसे दी गई, पर उसकी हालत बिगड़ती ही चली गई। अब उसकी हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वह हिलडुल नहीं सकती और मरणासन्न हो गई है।
BBC Hindi|



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