सिंहासन बत्तीसी : ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचना की कथा

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उसके ना-नुकुर करने पर घोड़े ने उसे समझाया कि वह राजा का दूत है, इसलिए उसके उपहार का उपयोग वह कर सकता है। ब्राह्मण जब राज़ी होकर बैठ गया तो वह घोड़ा पवन वेग से उसे विक्रम के दरबार ले आया।

घोड़े की सवारी के दौरान उसके मन में इच्छा जगी- 'काश! यह घोड़ा मेरा होता!'

जब विक्रम को उसने समुद्र देवता से अपनी बातचीत सविस्तार बताई और उन्हें उनके दिए हुए उपहार दिए। तब बिना कुछ कहे ही राजा विक्रमादित्य ने कहा कि पांचों रत्न तथा घोड़ा ब्राह्मण को ही प्राप्त होने चाहिए, चूंकि रास्ते में आनेवाली सारी कठिनाइयां उसने राजा की खातिर हंसकर झेलीं।

उनकी बात समुद्र देवता तक पहुंचाने के लिए उसने कठिन साधना की। ब्राह्मण रत्न और घोड़ा पाकर अति प्रसन्न हुआ।

इतना कहकर त्रिलोचना बोली, राजान, विक्रमादित्य की तरह प्रजापालक और अत्यंत दयालु राजा ना हुआ है और न होगा। अगर इस सिंहासन पर बैठने की लालसा है तो आपको भी उनके गुणों को आत्मसात करना होगा। त्रिलोचना पुन: पुतली रूप में सिंहासन पर स्थापित हो गई।

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अगले दिन बारहवीं पुतली पद्मावती ने रोका राजा भोज का रास्ता और सुनाई आकर्षक गाथा। पढ़ें अगले अंक में।



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