सिंहासन बत्तीसी : उन्‍नीसवीं पुतली रूपरेखा की कहानी

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विक्रम ने तब जाकर उसे अपना असली परिचय दिया तथा उसे कई स्वर्ण मुद्राएं देकर होशियारी से व्यापार करने की सलाह दी। उन्होंने उसे भरोसा दिलाया कि लग्नशीलता उसे फिर पहले वाली समृद्धि वापस दिला देगी। उससे विदा लेकर वे अपने महल लौट आए क्योंकि अब उनके पास उन तपस्वियों के विवाद का समाधान था।

कुछ समय बाद उनके दरबार में वे दोनों तपस्वी समाधान की इच्छा लिए हाजिर हुए। विक्रम ने उन्हें कहा कि मनुष्य के शरीर पर उसका मन बार-बार नियंत्रण करने की चेष्टा करता है, पर ज्ञान के बल पर विवेकशील मनुष्य मन को अपने पर हावी नहीं होने देता।

मन और ज्ञान में अन्योनाश्रय सम्बन्ध है तथा दोनों का अपना-अपना महत्व है। जो पूरी तरह अपने मन के वश में हो जाता है उसका सर्वनाश अवश्यम्भावी है। मन अगर रथ है तो ज्ञान सारथी। बिना सारथी रथ अधूरा है।



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