इतिहास के झरोखे से 14वीं लोकसभा

नई दिल्ली (भाषा)| भाषा|
पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव की तिथियाँ सोमवार को घोषित हो जाने के साथ ही वर्तमान चौदहवीं लोकसभा के इतिहास बनने में कुछ ही दिन रह गए हैं, जिसमें एक क्रिकेट की टीम भर ब्लैक इलेवन को बर्खास्त करने सहित कई अनूठे रिकॉर्ड बने।


चौदहवीं लोकसभा ने अपने 11 सदस्यों को बर्खास्त करने का इतिहास रचा। इस ब्लैक इलेवन में कबूतरबाजी (मानव तस्करी) से लेकर पैसा लेकर सदन में सवाल पूछने जैसे स्तब्धकारी आरोपों से घिरे सदस्यों को सदन के बाहर का रास्ता दिखाया गया। इस दौरान पहली बार संसद में नोटों के बंडल भी लहराए गए।

कबूतरबाजी मामले में भाजपा सांसद बाबूभाई कटारा को बर्खास्त किया गया। इसके अलावा लोकसभा के दस सदस्य सदन में प्रश्नकाल को कमाई का जरिया बनाने के आरोप में पकड़े जाने पर निष्कासित किए गए। चार अन्य सदस्यों को विभिन्न मामलों में निलंबित किया गया।

वर्तमान लोकसभा में सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत सदस्यों को मिलने वाले धन का दुरुपयोग किए जाने का घोटाला भी हुआ।


चौदहवीं लोकसभा ने एक और अनूठे निष्कासन का भी नजारा किया। लोकसभा के पहले कॉमरेड अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को उनके मूल दल माकपा ने पार्टी से बर्खास्त कर दिया। वाम दलों द्वारा संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेने पर अध्यक्ष पद छोड़े जाने का पार्टी का निर्देश नहीं मानने पर माकपा ने यह कार्रवाई की।
इस लोकसभा में ही पहली बार अध्यक्ष के खिलाफ पक्षपात का आरोप लगाकर सम्पूर्ण विपक्ष ने हस्ताक्षर अभियान चलाया। और पहली बार ही किसी अध्यक्ष ने सदन में हंगामा करने वाले सदस्यों को दोबारा न जीतने का शाप दिया, हालाँकि उसे उन्होंने दूसरे ही दिन वापस भी ले लिया।

चौदहवीं लोकसभा में एक और अनूठी बात देखने की मिली जब मनमोहनसिंह कैबिनेट में वरिष्ठ सदस्य शिबू सोरेन को हत्या के मामले में मंत्री पद छोड़कर सीधे जेल की हवा खाने जाना पड़ा। इसके अलावा इसी लोकसभा के लिए निर्वाचित होने के बावजूद इसके दो सदस्यों मोहम्मद शहाबुद्दीन और पप्पू यादव का सदन की बजाय अधिकतर समय जेल में बीत़ा।

लाभ का पद विवाद के चलते अध्यक्ष सोनिया गाँधी को सदन की सदस्यता से त्याग-पत्र देकर दोबारा चुनाव जीतकर आना पड़ा।
इस दौरान सांसद से विधायक बन जाने या राज्यसभा में चले जाने के कारण लोकसभा के 43 सदस्यों ने इस्तीफा दिया। एक अन्य अनूठा रिकॉर्ड बनाते हुए वर्तमान लोकसभा के आठ सदस्य मुख्यमंत्री बने।

महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना द्वारा उत्तर भारतीयों के खिलाफ चलाई गई राजनीति के विरुद्ध जदयू ने और पृथक तेलंगाना राज्य की माँग पर टीआरएस के सभी सदस्यों ने सदन से इस्तीफा दे दिया।
पाँच साल के जीवनकाल में कुछ मित्र दल विरोधी बन गए तो कुछ विरोधी मित्र। कई दल कभी मित्र तो कभी विरोधी की अपनी भूमिका बार-बार बदलने का मजा लेते रहे। मुख्य सत्ताधारी दल कांग्रेस ने 145 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में चौदहवीं लोकसभा में प्रवेश किया और अंत में उसकी संख्या बढ़कर 153 तक जा पहुँची, वहीं 138 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी भाजपा विदाई की बेला आते आते 114 पर सिमट गई।
चौदहवीं लोकसभा ने एक और अनूठा कार्य करते हुए अपना खुद का टीवी चैनल शुरू किया, जो विश्व में अपने किस्म की अकेली मिसाल है।

चौदहवीं लोकसभा में कांग्रेस के नेतृत्व में जब संप्रग सरकार का गठन हुआ तो उस समय एक-दूसरे को फूटी आँख न सुहाने वाले बसपा और सपा दोनों ने बाहर से उसका समर्थन किया। बाद में पहले सपा फिर बसपा ने अपनी-अपनी वजह बताकर उससे समर्थन वापस ले लिया।
इस बीच लगभग 60 सीटों वाले तीसरे सबसे ताकतवर वाम मोर्चे ने संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन देकर सत्ताधारी और विपक्ष दोनों की भूमिका का भरपूर आनंद उठाया, लेकिन अमेरिका से परमाणु समझौते के विरोध में उसने जब समर्थन वापस लेकर सरकार को गिरने का खतरा पैदा कर दिया तो उसी की करीबी सपा ने एक बार फिर सरकार के समर्थन में आकर ऐसा होने से बचा लिया।
इस सफर में तेलंगाना राष्ट्र समिति और पीपुल्स डेमोक्रटिक पार्टी ने संप्रग से किनारा कर लिया तो कभी राजग में रही नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सत्ताधारी गठबंधन का दामन थाम लिया।



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