चुनावी नतीजों का इंतजार था प्रभाकरण को

नई दिल्ली (भाषा)| भाषा|
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श्रीलंका में 30 वर्ष पुराने सैन्य संघर्ष की आगे की रणनीति तय करने के लिए भारतीय चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहा था।


एक तरह से उसे उम्मीद थी कि नई दिल्ली में या तो राजग सत्ता में आएगा या तीसरा मोर्चा लेकिन दूसरी तरफ श्रीलंकाई सेना की अलग ही योजना थी।

यह बात प्रकाश में आई है कि 54 वर्षीय प्रभाकरण 16 मई के दिन का इंतजार कर रहा था। जिस दिन भारत में लोकसभा चुनाव के नतीजे सामने आने थे। वह अपने संगठन का भविष्य तय करने के लिए नतीजों का इंतजार कर रहा था लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और श्रीलंका की सेना ने उसके बचने के सभी रास्ते बंद कर दिए।

श्रीलंका सेना के सूत्रों ने कहा 16 मई तक वह (प्रभाकरण) उम्मीद कर रहा था कि कोई हस्तक्षेप करेगा और सेना को अंतिम रूप से नो फायर जोन में घुसने से रोकेगा जहाँ उसे रोक दिया गया था।


16 मई की दोपहर बाद लिट्टे को एक तरह से कांग्रेस के सत्ता में वापसी का पता चल गया था और उसने अपने कब्जे वाले इलाके में फँसे सभी नागरिकों को सुरक्षित जगह जाने देने की घोषणा की। लिट्टे का मानना था कि कांग्रेस प्रभाकरण और उसके संगठन की विरोधी थी।
श्रीलंका में तमिल सू़त्रों के अनुसार लिट्टे को उम्मीद थी कि तमिलनाडु में उसके लिए एक लोकप्रियता की लहर उमड़ेगी जहाँ आम चुनाव ईलम के मुद्दे पर लड़े गए और उसे यह भी आशा थी कि तीसरा मोर्चा या राजग सत्ता में आ सकता है।

तमिल सूत्रों ने कहा हो सकता है कि इसने (चुनावी नतीजों ने) प्रभाकरण को और संगठन के अन्य नेताओं को हताश किया हो लेकिन उनके पास कुछ और सोचने या योजना बनाने का समय नहीं था।
सूत्रों का कहना है कि लिट्टे प्रमुख ने सोचा होगा कि तीसरा मोर्चा और राजग उनके प्रति इतने विरोधी नहीं होंगे जितनी कि कांग्रेस।

तीसरे मोर्चे में शामिल अन्नाद्रमुक अध्यक्ष जयललिता ने श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर समर्थन जताया था। उन्होंने यह वादा तक किया था कि यदि उनके समर्थन वाली सरकार नई दिल्ली में आती है तो वह श्रीलंका में से अलग तमिल ईलम के निर्माण के लिए भारतीय सेना भेजेंगी।
16 मई की अपराह्न लिट्टे के अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रमुख सेल्वारासा पदमनाथन ने एक वक्तव्य जारी किया जिसमें उनके संगठन ने वस्तुत: हार स्वीकार कर ली थी और वैश्विक समुदाय से वान्नी के लोगों को बचाने के लिए कहा था।

उन्होंने कहा कि प्रभाकरण को उम्मीद नहीं थी कि श्रीलंकाई सेना इतनी जल्दी उसे और उसके साथियों को घेर लेगी। श्रीलंका की सेना को लिट्टे के समुद्री लड़ाकों के प्रमुख सुसाई की पत्नी की तरफ से सूचना मिली थी कि प्रभाकरण और उसके साथी संघर्ष क्षेत्र में ही हैं।
सूत्रों ने कहा इसने सेना को प्रोत्साहित किया जिसने विद्रोहियों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया और 16 मई को एक तरह से उन्हें वान्नी क्षेत्र में दो वर्ग किलोमीटर के दायरे में ही घेर लिया। उन्होंने किसी भी लिट्टे विद्रोही को बचने का कोई भी मौका नहीं दिया।

जैसे ही सेना को विश्वास हो गया कि इलाके में 16-17 मई की दरमियानी रात कोई भी नागरिक नहीं बचा था तो लिट्टे के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अंतिम अभियान छेड़ते हुए सैनिक बेधड़क जंगलों में घुस गए।
सूत्रों ने कहा कि नागरिक राहत मिशन ने लिट्टे के अंतिम अवशेषों के सफाए के लिहाज से सुरक्षा बलों का रास्ता साफ किया। सेना के तीन डिवीजन ने लिट्टे के अंतिम बचे गढ़ में प्रवेश किया और अपनी कार्रवाई शुरू कर दी।

अंतिम अभियान शुरू होने के बाद ही लिट्टे ने यह कहते हुए हार स्वीकार ली कि उन्होंने अपने हथियार डालने का फैसला किया है। 18 मई को तड़के दशकों पुराना संघर्ष अंतिम दिशा में पहुँच गया था जिसमें 70 हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी



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