सुप्रीम कोर्ट ने दी लालू को राहत

नई दिल्ली (भाषा)| भाषा| पुनः संशोधित बुधवार, 7 जनवरी 2009 (22:12 IST)
रेलमंत्री को बुधवार को तब बड़ी राहत मिली, जब ने उनके खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। सरकारी पद का दुरुपयोग करने और परिवार के लिए आर्थिक लाभ उठाने के आरोप संबंधी याचिका में लालू के खिलाफ केन्द्रीय जाँच ब्यूरो से जाँच कराए जाने की माँग की गई थी।


लालू के प्रतिद्वंद्वी जनता दल (यूनाइटेड) के नेता राजीव रंजनसिंह लल्लन द्वारा दायर याचिका में कहा गया था कि प्रधानमंत्री द्वारा निष्पक्ष जाँच कराए जाने के आश्वासन के बावजूद मामला रेलवे विजीलेंस के पास भेज दिया गया।

संक्षिप्त सुनवाई के बाद न्यायालय ने कहा कि वह याचिका पर कोई निर्देश नहीं दे सकती। उसने लल्लन से कहा कि वे मामले को प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष उठाएँ।

मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा आप पीएमओ के समक्ष मामले को उठाएँ। आप सतर्कता अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार कर सकते हैं। आप को क्यों लगता है कि रिपोर्ट झूठी होगी।


खंडपीठ ने जब स्पष्ट कर दिया कि वह जाँच के निर्देश देने नहीं जा रही है तो लल्लन की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ एडवोकेट राजीव धवन ने याचिका वापस लेने का फैसला किया।
खंडपीठ में न्यायमूर्ति पी. सतशिवम भी थे। खंडपीठ ने साफ कहा सीबीआई जाँच के निर्देश देने का सवाल ही नहीं है। आप किसी उचित प्राधिकार के पास जा सकते हैं।

धवन ने कहा राजग का प्रतिनिधिमंडल पिछले साल 23 अगस्त को प्रधानमंत्री से मिला और उसे आश्वासन दिया गया कि लालूप्रसाद के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
जद(यू) नेता ने कहा उन्होंने प्रधानमंत्री को अवगत करा दिया था कि मंत्री के खिलाफ उन्हीं के अधीन अधिकारी की जाँच महज आँख में धूल झोंकने वाली बात होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि लालू ने पद का दुरुपयोग कर जमीन हासिल की तथा बदले में व्यावसायिक ठेके दिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग लाभान्वित हुए, उनमें प्रसाद की बेटी तथा उनके पार्टी सहयोगी प्रेम चंद गुप्ता के परिजन भी हैं। गुप्ता कम्पनी मामलों के मंत्री हैं।
याचिका में दावा किया गया प्रसाद और उनके परिजनों ने रेलवे में नौकरियाँ देकर व्यावसायिक ठेके देकर उनके बदले जमीन हासिल की।

यह दावा भी किया गया कि नौकरी पाने वालों में चारा घोटाले के वे गवाह भी हैं, जिन्होंने अनुकूल बयान दिए। याचिका में कहा गया कि लालू ने आर्थिक लाभ के लिए एक न्यास का गठन किया तथा पद पर रहते हुए व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल हुए।



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