नेपाल के सौभाग्य के सिपाही 'गोरखा'

गोरखा राइफल्स फ्रंटियर फोर्स की 125वीं वर्षगाँठ पर विशेष

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यह वही एबटाबाद है जहाँ अमेरिकी सैनिकों ने अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन का काम तमाम किया था। पाँचवीं गोरखा राइफल्स ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तीन जीते थे और इस तरह यह की पहली ऐसी इकाई बनी जिसने को मिले कुल 12 विक्टोरिया क्रॉस में से तीन स्वयं जीती। विक्टोरिया क्रॉस भारत के परम वीर चक्र के समकक्ष इंग्लैंड का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान है।

वैश्विक योद्धा के रूप में मशहूर गोरखा युद्धक्षेत्र में अपनी दिलेरी और सैन्य कुशलता के लिए जाने जाते हैं। गोरखाओं से आप तीन चीजें कभी नहीं छीन सकते- उसकी खुखरी, मांदल और रक्षी (एक प्रकार का नशीला पदार्थ)। इसके साथ चेहरे पर उनकी स्थायी मुस्कुराहट भी कभी मिटने वाली नहीं होती है। यही वह चीज है जो उन्हें जाँबाज सैनिक बनाती है। गोरखा इतने साहसी, वफादार और भरोसेमंद होते हैं कि वे दुनिया के तीन देशों- इंग्लैंड, भारत और नेपाल की सेनाओं तथा सिंगापुर, हांगकांग और ब्रुनेई के पुलिस बलों में शामिल हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि वे अनेक निजी सेनाओं में भाड़े के सैनिकों के रूप में भी काम करते हैं। उल्लेखनीय है कि एक समय में क्यूबाई सेना को सोवियत साम्राज्य का गोरखा कहा जाता था। सोवियत संघ के लिए क्यूबाई सेना का वही महत्व था जो भारत, नेपाल और इंग्लैंड के लिए गोरखा सैनिकों का है।

विक्टोरिया क्रॉस पलटन : नेपाल के लिए ये भाड़े के सिपाही या सौभाग्य के सिपाही पर्यटन के बाद आय के दूसरे सबसे बड़े स्रोत हैं। सिर्फ भारतीय सेना में काम करने वाले गोरखाओं से ही नेपाल को हर साल 1000 करोड़ की आमदनी होती है। वीरता के बारे में सोचिए और सोचिए जरा दूसरी पाँचवीं गोरखा बटालियन के बारे में। भारतीय गोरखाओं को प्राप्त हुए 12 विक्टोरिया क्रॉस में से इसने तीन विक्टोरिया क्रॉस अकेले जीते, जिसके चलते इसे विक्टोरिया क्रॉस पलटन का खिताब अता किया गया था।

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- अशोक मेहता, सुरक्षा विशेषज्ञ और लेखक भारतीय सेना की सबसे सुसज्जित गोरखा बटालियन- दूसरी बटालियन फिफ्थ अल्मोड़ा में आज अपनी स्थापना की 125वीं सालगिरह मना रहा है। इस बटालियन की स्थापना में हुई थी और कांगो में संयुक्त राष्ट्र की शांति स्थापना अभियान पूरा करने के 40 वर्षों बाद यह अल्मोड़ा आई थी।
इन तीन विक्टोरिया क्रॉस में से दो तो इसने 24 घंटे के अंदर सिर्फ एक अभियान में ही हासिल किए थे। यह कार्रवाई 1944 में इंफाल के निकट मोर्टार ब्लफ में हुई थी। इसी कार्रवाई में सूबेदार नेत्र बहादुर थापा वीर गति को प्राप्त हुए थे, जिन्हें मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस दिया गया था। यह पुरस्कार नेत्र बहादुर थापा की विधवा पत्नी नामसारी थापिनी को दिया गया था, जो नेपाल के कोल्मा नामक स्थान की रहने वाली थी। नामसारी थापिनी को विक्टोरिया क्रॉस प्रदान करने के लिए तत्कालीन फिल्ड मार्शल और वायसराय विस्काउंट वेवेल काबुल नदी के किनारे नवशेरा के पोलो ग्राउंड में स्वयं पहुँचे थे। लाल रिबन से बँधा यह दुर्लभ कांस्य पदक सेवस्तापोल में रूसियों से छीने गए बंदूक से बनाया गया था। (गोरखा सिपाहियों की अद्भुत वीरता से भरे किस्से जानने के लिए पढ़े अगला पन्ना.... )



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