एडोल्फ हिटलर

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बीसवीं सदी के सर्वाधिक चर्चित (और संभवतः सर्वाधिक घृणित) व्यक्तियों में से एक हैं एडोल्फ हिटलर। 20 अप्रैल 1889 को ऑस्ट्रिया में जन्मे हिटलर की नियति तय की उनकी व्यक्तिगत असफलताओं तथा उनके देश जर्मनी की विश्व समुदाय द्वारा अवमानना ने। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेना में भर्ती होकर हिटलर ने सम्मान पाया। 1918 में जर्मनी की पराजय के बाद 1919 में हिटलर ने सेना छोड़ दी व नेशनल सोशलिस्टिक आर्बीटर पाटी (नाजी पार्टी) का गठन कर डाला। उनकी घोषित मान्यता थी कि साम्यवादियों व यहूदियों के कारण ही जर्मनी की हार हुई। उन्होंने एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा और बेहद शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे। 1923 में तत्कालीन सरकार ने उन्हें पांच वर्ष के लिए जेल भेज दिया। जेल से रिहा होने के कुछ ही समय बाद हिटलर ने पाया कि जर्मनी भी विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की मार झेल रहा है। जनता के असंतोष का फायदा उठाकर हिटलर ने पुनः व्यापक लोकप्रियता हासिल की और 1933 में जर्मनी के चांसलर (प्रधानमंत्री के समकक्ष) बन गए। इसके बाद शुरू हुआ हिटलर का दमन चक्र। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को अवैध घोषित कर दिया व यहूदियों के नरसंहार का सिलसिला शुरू कर दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति की मृत्यु के बाद हिटलर ने स्वयं को राष्ट्रपति तथा सर्वोच्च न्यायाधीश भी घोषित कर डाला। विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य लेकर हिटलर ने पड़ोसी देशों पर आक्रमण कर दिए जिसके फलस्वरूप 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध भड़क उठा। प्रारंभिक सफलताओं के बाद हिटलर के पांव उखड़ने लगे। उनके अपने लोग उनके खिलाफ होने लगे और अंततः 30 अप्रैल 1945 को हिटलर ने आत्महत्या कर ली।

मैं एक आरामदायक जीवन के खालीपन से बच गया
जब मेरी मां का देहांत हुआ, तो एक तरह से मेरे भाग्य काफैसला हो चुका था। उनकी बीमारी के अंतिम महीनों में मैं 'अकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स' (ललित कला अकादमी) की प्रवेश परीक्षा देने हेतु विएना गया था। रेखाचित्रों का मोटा सा पैकेट लेकर चलते समय मुझे पूरा यकीन था कि मैं आसानी से परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाऊंगा। 'रिएलशूल' (माध्यमिक विद्यालय) में मैं चित्रकला का सर्वश्रेष्ठ छात्र था। उसके बाद से मैंने चित्रकला में असाधारण प्रगति की थी। अतः मैं प्रवेश परीक्षा में सफलता को निश्चित मानकर प्रसन्न तथा गौरवान्वित महसूस कर रहा था।
बस एक ही आशंका थी। मुझे लगता था कि मुझमें पेंटिंग के बजाय ड्राइंग, विशेषकर वास्तुशिल्पीय नक्शे आदि बनाने की अधिक योग्यता थी, साथ ही वास्तुशिल्प में मेरी रुचि लगातार बढ़ती जा रही थी। अपनी दो सप्ताह की प्रथम विएना यात्रा के बाद मैं और अधिक गति से इस दिशा में बढ़ने लगा। अभी मेरी उम्र सोलह की नहीं हुई थी। मैं हॉफ संग्रहालय की कला दीर्घा में रखे चित्रों के अध्ययन के उद्देश्य से गया, तो उसके भवन ने ही मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया।अलसुबह से देर रात तक मैं तमाम सार्वजनिक भवनों की सैर करता रहा। ऑपेरा तथा संसद भवन के समक्ष मैं कई-कई घंटों तक उनकी सुंदरता को निहारता खड़ा रहता। 'रिंग स्ट्रासे' ने तो मुझ पर जादुई प्रभाव डाला, मानो वह अलिफ लैला का कोई दृश्य हो।

अब मैं दूसरी बार इस खूबसूरत शहर में था। प्रवेश परीक्षा का परिणाम जानने के लिए बेताब था, लेकिन साथ ही एक गर्वयुक्त विश्वास भी था कि मैं उत्तीर्ण हो जाऊंगा। अपनी सफलता के प्रति मैं इस हद तक आश्वस्त था कि जब मुझे बताया गया कि मैं अनुत्तीर्ण हो गया हूं तो मानो मुझ पर बिजली ही गिर पड़ी। खैर, तथ्य तो यही था कि मैं अनुत्तीर्ण हो गया था। मैं प्राचार्य से जाकर मिला और उनसे पूछा कि आखिर उन्होंने मुझे स्कूल ऑफ पेंटिंग के छात्र के रूप में क्यों स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि मैं अपने साथ जो रेखाचित्र लाया था, वे निर्विवाद रूप से यह दर्शाते थे कि मैं पेंटिंग सीखने के योग्य नहीं था, लेकिन यही रेखाचित्र इस बात का स्पष्ट संकेत देते थे कि वास्तुशिल्पीय डिजाइनिंग की प्रतिभा मुझमें है। अतः मेरे मामले में स्कूल ऑफ पेंटिंग कोई मायने नहीं रखती थी, बल्कि अकादमी का ही एक अन्य अंग स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर मेरे लिए अधिक अनुकूल था। पहले पहल तो इस बात को समझना असंभव था, क्योंकि न तो मैं कभी वास्तुशिल्प के किसी विद्यालय में गया था और न ही मैंने वास्तुशिल्पीय डिजाइनिंग का कोई प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
मैं हतोत्साहित होकर लौटा। अपने छोटे से जीवन में पहली बार उदास महसूस करने लगा। अपनी क्षमताओं के बारे में मैंने जो सुना, वह अब मुझे किसी बिजली की चमक जैसा लगा, जो उस द्विविधता को उजागर कर गई, जिससे मैं लंबे समय से पीड़ित था, लेकिन जिसके कारण मुझे अब तक ज्ञात नहीं थे।
इस सदी के आरंभ में ही विएना उन शहरों में शामिल हो चुका था जहां सामाजिक परिस्थितियां विषम हैं। चकाचौंध करती संपन्नता तथा घृणित गरीबी एक-दूसरे में गुंथी हुई थी। शहर के मध्य क्षेत्र में उस साम्राज्य का स्पंदन महसूस होता था, जिसकी जनसंख्या 5 करोड़ 20 लाख थी और जिसमें विभिन्न राष्ट्रीयताओं से बने राज्य का आकर्षण था। दरबार की चकाचौंध भव्यता समूचे साम्राज्य की दौलत तथा बुद्धि के लिए चुंबक की तरह थी। हैबस्बर्ग राजशाही द्वारा सभी कुछ अपने में और अपने लिए केंद्रीकृत कर देने की वंशानुगत नीति ने इस आकर्षण को बढ़ाया।
उन भिन्न-भिन्न राष्ट्रीयताओं की खिचड़ी को एकजुट रखने के लिए यह केंद्रीयकरण नीति आवश्यक थी। इसके फलस्वरूप शहर में उच्चाधिकारियों का असामान्य जमावड़ा हो गया था, लेकिन विएना महज राजशाही का राजनीतिक व बौद्धिक केंद्र नहीं था। वह व्यावसायिक केंद्र भी था। अतः वहां उच्च पदस्थ सैनिक अधिकारियों, शासकीय अधिकारियों, कलाकारों व वैज्ञानिकों की भीड़ से भी बढ़कर श्रमिकों की भीड़ थी। अभिजात वर्ग तथा व्यापारी वर्ग के दूसरी ओर घोर गरीबी का आलम था। 'रिंग स्ट्रासे' पर राजमहलों के समक्ष हजारों बेरोजगार घूमते थे और नीचे बेघर लोग नालों की गंदगी के बीच कहीं सिर छिपाने का प्रयास करते थे।

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